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Law Firm: अधिवक्ता व लॉ फर्म केस लॉ का हवाला देने से पहले करें सत्यापन…हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

Law Firm: दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा, अधिवक्ता और लॉ फर्मों को अदालत में किसी भी फैसले का हवाला देने से पहले उसकी सत्यता और स्थिति की जांच करनी चाहिए।

लंबित निर्णयों पर निर्भर रहना न्यायिक प्रक्रिया को भ्रमित कर सकता है

न्यायमूर्ति पुरुषेन्द्र कुमार कौरव ने कहा, “निर्देश देने वाले और ब्रीफिंग अधिवक्ता/लॉ फर्मों से अपेक्षा की जाती है कि वे अदालत में किसी भी निर्णय का हवाला देने से पहले ईमानदारीपूर्वक उसकी जांच करें। यदि कोई निर्णय समीक्षा या अपील में लंबित है और इसकी जानकारी अदालत को नहीं दी जाती, तो यह अदालत के प्रति निष्कपटता की कमी दर्शाता है और न्यायिक प्रक्रिया को गुमराह कर सकता है।”समीक्षा या अपील में लंबित निर्णयों पर निर्भर रहना न्यायिक प्रक्रिया को भ्रमित कर सकता है।

कोई भी चूक पूरी प्रणाली पर विश्वास को कम करती

अदालत ने कहा कि वकीलों का ऐसा आचरण उस निष्पक्षता और पूर्णता के मानक से कम है, जो न्यायालय के अधिकारियों से अपेक्षित है। “न्याय प्रणाली बार और बेंच के बीच पारस्परिक विश्वास पर चलती है। हर पक्ष — वादी, वकील और अदालत — पर इसकी निष्पक्षता बनाए रखने की समान जिम्मेदारी है। कोई भी चूक पूरी प्रणाली पर विश्वास को कम करती है। यह टिप्पणी अदालत ने ReNew Wind Energy (AP2) Pvt. Ltd. द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई के दौरान की, जिसमें कंपनी ने Solar Energy Corporation of India (SECI) को उसके मासिक बिलों से एकतरफा राशि काटने से रोकने की मांग की थी।

SECI ने 2 मई 2025 को नोटिस जारी किया

SECI ने 2 मई 2025 को नोटिस जारी करते हुए कहा था कि ReNew ने 2024–25 में 946.08 MUs की न्यूनतम ऊर्जा उत्पादन आवश्यकता पूरी नहीं की और केवल 632 MUs ही उत्पन्न की। इस आधार पर उसने पावर परचेज एग्रीमेंट के अनुच्छेद 4.4.1 के तहत मुआवजा मांगा। ReNew ने तर्क दिया कि यह कमी फोर्स मेज्योर परिस्थितियों के कारण हुई और इसलिए वह जिम्मेदारी से मुक्त है। याचिका आर्बिट्रेशन एंड कंसिलिएशन एक्ट की धारा 9 के तहत दायर की गई थी। SECI ने विरोध करते हुए कहा कि विवाद का क्षेत्राधिकार केंद्रीय विद्युत विनियामक आयोग (CERC) के अधीन है, और इसलिए केवल वही इस पर निर्णय ले सकता है या इसे मध्यस्थता में भेज सकता है।

CERC तय करेगा कि मामला टैरिफ से जुड़ा है या नहीं

न्यायमूर्ति कौरव ने याचिका को अस्वीकार्य बताते हुए कहा कि CERC के पास बिजली अधिनियम की धारा 79(1)(f) के तहत ऐसे विवादों को मध्यस्थता में भेजने का विशेषाधिकार है और यह अधिकार अदालत की धारा 8 या 11 के तहत की गई कार्रवाई से ऊपर है। उन्होंने कहा कि भले ही विवाद टैरिफ से संबंधित न हो, CERC यह तय करने का अधिकार रखता है कि मामला टैरिफ से जुड़ा है या नहीं। ReNew ने इस तर्क को बल देने के लिए CERC के 2023 के एक आदेश का हवाला दिया था, लेकिन अदालत ने पाया कि उस आदेश पर समीक्षा याचिका लंबित थी।

यह रही अदालत की टिप्पणी

अदालत ने कहा, “10 अक्टूबर 2025 को निर्णय सुरक्षित करने के बाद, अदालत ने स्वयं पाया कि CERC में उसी आदेश पर समीक्षा याचिका (38/RP/2023) लंबित थी और 27 अक्टूबर 2025 को ही उसे खारिज किया गया।” हालांकि समीक्षा अब खारिज हो चुकी है, अदालत ने कहा कि उस समय याचिकाकर्ता को यह पता नहीं था कि समीक्षा स्वीकार होगी या अस्वीकृत, “यदि समीक्षा स्वीकार हो जाती, तो याचिकाकर्ता एक ऐसा आदेश उद्धृत कर रहा होता जिसे बाद में निरस्त कर दिया गया होता।”

अनुबंध में मध्यस्थता क्लॉज हो, मध्यस्थता में भेज सके

न्यायमूर्ति कौरव ने कहा कि ऐसे मामलों में पारदर्शिता और सावधानी बरतना अनिवार्य है, “अदालत यह अपेक्षा नहीं करती कि वरिष्ठ अधिवक्ता स्वयं हर निर्णय की जांच करें, परंतु यह जिम्मेदारी उन अधिवक्ताओं या फर्मों की है जो उन्हें ब्रीफ करते हैं।” अंत में अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि CERC को यह अधिकार है कि वह जनरेटिंग कंपनियों या ट्रांसमिशन लाइसेंसी से जुड़े विवादों को, जहां अनुबंध में मध्यस्थता क्लॉज हो, मध्यस्थता में भेज सके, भले ही विवाद धारा 79(1)(a)-(d) के दायरे में न आता हो।

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