Supreme Court in view
TALAQ-E-HASAN: सुप्रीम कोर्ट ने तलाक-ए-हसन की वैधता को चुनौती देने वाली एक मुस्लिम महिला की याचिका को मध्यस्थता (Mediation) के लिए भेज दिया है।
वैवाहिक विवाद का सौहार्दपूर्ण समाधान निकालने की कोशिश
सुप्रीम अदालत ने इस वैवाहिक विवाद का सौहार्दपूर्ण समाधान निकालने के लिए शीर्ष अदालत के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस कुरियन जोसेफ को मध्यस्थ नियुक्त किया है। यह याचिका पत्रकार बेनजीर हीना द्वारा दायर की गई थी, जिनके पति ने उन्हें ‘तलाक-ए-हसन’ के जरिए तलाक देने की प्रक्रिया शुरू की थी।
तलाक-ए-हसन क्या है?
यह मुस्लिम समुदाय में तलाक का एक रूप है जिसमें:पति तीन महीने की अवधि के दौरान हर महीने एक बार ‘तलाक’ शब्द बोलकर या लिखकर वैवाहिक संबंध विच्छेद कर सकता है। यदि इस तीन महीने के दौरान पति-पत्नी के बीच सुलह (Cohabitation) नहीं होती है, तो तीसरी बार तलाक कहने पर यह औपचारिक हो जाता है। यदि पहली या दूसरी बार के बाद दोनों साथ रहने लगते हैं, तो तलाक की प्रक्रिया रद्द मानी जाती है।
कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां और निर्देश
- चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने सुनवाई के दौरान कई अहम बातें कहीं।
- तलाक की प्रक्रिया पर रोक: कोर्ट ने निर्देश दिया कि चूंकि अब मध्यस्थता की प्रक्रिया शुरू हो गई है, इसलिए पति द्वारा दिए गए पिछले ‘तलाक’ फिलहाल स्थगित (Abeyance) रहेंगे।
- मानवीय पहलू: कोर्ट ने कहा, “सवाल किसी धर्म का नहीं बल्कि व्यक्ति का है। जब दो पक्ष अलग होना चाहते हैं, तो उन्हें आपसी सम्मान बनाए रखना चाहिए।
- मध्यस्थ की नियुक्ति: जस्टिस कुरियन जोसेफ को उनके वैवाहिक विवादों को सुलझाने के विशाल अनुभव के कारण नियुक्त किया गया है। उन्हें चार सप्ताह के भीतर समाधान निकालने का प्रयास करने को कहा गया है।
- वकीलों के नोटिस पर चिंता: कोर्ट ने पहले भी इस बात पर चिंता जताई थी कि वकीलों के माध्यम से भेजे जा रहे तलाक नोटिस भविष्य में कानूनी विवाद और महिलाओं के पुनर्विवाह में ‘बहुपतित्व’ (Polyandry) जैसे आरोपों का कारण बनते हैं।
एक अन्य मामले में सख्त रुख
इसी तरह के एक अन्य मामले में, बेंच ने एक अनपढ़ महिला को उसके पति द्वारा दिए गए ‘तलाक-ए-हसन’ पर रोक लगा दी। पति ने पत्नी के सादे कागज पर हस्ताक्षर लिए थे और वह कोर्ट में पेश भी नहीं हो रहा था। कोर्ट ने कहा कि जब तक पति कोर्ट में पेश होकर वैध तलाक साबित नहीं करता, तब तक वे वैध विवाहित जोड़ा ही माने जाएंगे। संबंधित SHO को पति का पता लगाने और उसे कोर्ट में पेश करने का निर्देश दिया गया है।
पृष्ठभूमि: ट्रिपल तलाक बनाम तलाक-ए-हसन
- 2017 का फैसला: सुप्रीम कोर्ट ने ‘ट्रिपल तलाक’ (एक साथ तीन बार तलाक बोलना) को असंवैधानिक और मनमाना करार दिया था।
- वर्तमान विवाद: ‘तलाक-ए-हसन’ को चुनौती देने वाली याचिकाओं का तर्क है कि यह प्रथा भी महिलाओं के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है और कुरान के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है।






