Meghalaya HC: मेघालय उच्च न्यायालय ने गारो हिल्स स्वायत्त जिला परिषद (GHADC) की उस अधिसूचना को खारिज कर दिया है, जिसमें चुनावी नामांकन के लिए अनुसूचित जनजाति (ST) प्रमाणपत्र को अनिवार्य बनाया गया था।
अदालत ने टिप्पणी की कि यह आदेश उचित विधायी प्रक्रियाओं की अनदेखी कर जारी किया गया था। परिषद की कार्यकारी समिति (Executive Committee) द्वारा पिछले महीने जारी इस अधिसूचना का उद्देश्य गैर-आदिवासियों को आगामी GHADC चुनाव लड़ने से रोकना था।
अदालत में दी गई दलीलें
- याचिकाकर्ता का पक्ष: एक मतदाता द्वारा दायर याचिका में तर्क दिया गया कि यह आदेश ‘असम और मेघालय स्वायत्त जिला (जिला परिषदों का गठन) नियम, 1951’ का उल्लंघन करता है।
- नियमों का उल्लंघन: वरिष्ठ वकील ने दलील दी कि नियमों में संशोधन किए बिना गैर-आदिवासी मतदाताओं और उम्मीदवारों के अधिकारों को छीना गया है। इसके लिए जिला परिषद और राज्यपाल की अनिवार्य मंजूरी (नियम 72 के तहत) भी नहीं ली गई थी।
-ऐतिहासिक संदर्भ: यह भी बताया गया कि 1952 में परिषद की स्थापना के समय से ही गैर-आदिवासी लोग चुनाव में भाग लेते रहे हैं और इसके सदस्य के रूप में अपनी सेवा दे चुके हैं।
GHADC का बचाव और कोर्ट की टिप्पणी
GHADC ने दलील दी कि जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के बीच जनजातीय हितों की रक्षा के लिए ‘कार्यकारी समिति’ ने अपनी आपातकालीन शक्तियों का उपयोग करते हुए यह कदम उठाया था। हालांकि, हाई कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए स्पष्ट किया, “कार्यकारी समिति केवल नियमों में बदलाव का प्रस्ताव दे सकती है। इसे प्रभावी होने के लिए जिला परिषद से पारित होना और राज्यपाल की मंजूरी मिलना अनिवार्य है।”
अदालत का फैसला
हाई कोर्ट ने कहा, यह अधिसूचना कानूनी जांच पर खरी नहीं उतरती, इसलिए इसे निरस्त और रद्द (Quashed) किया जाता है।
इसका क्या प्रभाव होगा?
इस फैसले के बाद अब गारो हिल्स स्वायत्त जिला परिषद के चुनावों में गैर-आदिवासी उम्मीदवार भी पूर्व की भांति नामांकन दाखिल कर सकेंगे, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया की समावेशिता बनी रहेगी।

