BLOOD DONATION: केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया कि विशेषज्ञों ने उन दिशा-निर्देशों में ढील देने के खिलाफ राय दी है, जो ट्रांसजेंडरों, समलैंगिक पुरुषों (Gay Men) और सेक्स वर्कर्स को रक्तदान करने से रोकते हैं।
केंद्र ने मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ को बताया कि पिछले साल मई में शीर्ष अदालत के निर्देश के बाद विशेषज्ञों ने इस मुद्दे पर पुनर्विचार किया है।
“1% जोखिम भी दूसरों के लिए हानिकारक”
केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने कहा, “विशेषज्ञों की राय है कि यदि इस प्रतिबंध को हटाया गया, तो यह दूसरों (रक्त प्राप्त करने वालों) के लिए हानिकारक हो सकता है।”सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने कड़ा रुख अपनाते हुए याचिकाकर्ताओं से पूछा, गरीबों की सुरक्षा: “हमें एक ठोस कारण बताएं कि हमें ऐसा निर्देश क्यों देना चाहिए? करोड़ों गरीब लोग ब्लड बैंकों पर निर्भर हैं। अगर संक्रमण की 1% संभावना भी है, तो वे इससे क्यों प्रभावित हों?” कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रक्त दान करना और उसे स्वीकार करना एक स्वैच्छिक प्रक्रिया है।
याचिकाकर्ताओं की दलीलें
- याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जयना कोठारी ने दलील दी।
- भेदभावपूर्ण नियम: 2017 के दिशा-निर्देश ट्रांसजेंडरों पर ‘पूर्ण प्रतिबंध’ लगाकर उनके साथ भेदभाव करते हैं।
- परीक्षण की प्रक्रिया: रक्तदान के बाद रक्त की वैसे भी HIV और हेपेटाइटिस जैसी जांच की जाती है, तो फिर पहले से ही प्रतिबंध क्यों?
- यौन पहचान बनाम जोखिम: याचिका में कहा गया कि यह प्रतिबंध वैज्ञानिक जोखिम के बजाय यौन पहचान (Sexual Identity) पर आधारित है, जो अपमानजनक है।
- कोविड-19 का उदाहरण: याचिका में बताया गया कि महामारी के दौरान जब परिवारों को खून की सख्त जरूरत थी, तब भी इस समुदाय के लोगों को रक्तदान करने से रोक दिया गया था।
केंद्र का वैज्ञानिक तर्क
केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में “ठोस सबूतों” का हवाला देते हुए कहा कि ट्रांसजेंडर, समलैंगिक पुरुष और महिला सेक्स वर्कर्स HIV, हेपेटाइटिस B या C संक्रमण के “उच्च जोखिम” (High-risk) वाली श्रेणी में आते हैं। नेशनल ब्लड ट्रांसफ्यूजन काउंसिल (NBTC) ने इसी आधार पर इन्हें स्थायी रूप से ‘डेफरल’ (रोक) श्रेणी में रखा है।
कोर्ट का रुख: लक्जरी लिटिगेशन
पीठ ने इस याचिका को लक्जरी लिटिगेशन (विलासिता वाली मुकदमेबाजी) करार दिया, लेकिन मामले की विस्तृत सुनवाई के लिए याचिकाओं को स्वीकार कर लिया है। कोर्ट ने पहले भी कहा था कि रक्त प्राप्त करने वाले व्यक्ति को साफ खून (Clean Blood) मिलने का पूरा भरोसा होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट अब इस पर विचार करेगा कि क्या ये दिशा-निर्देश मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं या सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए आवश्यक हैं।

