Excise policy case: दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डी. के. उपाध्याय ने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया की मांग को ठुकरा दिया है।
दरअसल, सीबीआई (CBI) की याचिका को जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की अदालत से किसी अन्य जज के पास ट्रांसफर करने का अनुरोध किया गया था। इस झटके के बाद आम आदमी पार्टी के नेताओं ने अब सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। चीफ जस्टिस ने स्पष्ट किया कि जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ‘रोस्टर’ के अनुसार ही मामले की सुनवाई कर रही हैं और प्रशासनिक आधार पर इस केस को ट्रांसफर करने का कोई ठोस कारण नहीं है।
विवाद की जड़: “निष्पक्ष सुनवाई की आशंका”
- अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया ने 11 मार्च को चीफ जस्टिस को एक आवेदन (Representation) दिया था।
- पूर्वाग्रह का आरोप: केजरीवाल ने दावा किया कि उन्हें “गंभीर और वास्तविक आशंका” है कि इस बेंच के सामने सुनवाई निष्पक्ष नहीं होगी।
- पुराने फैसलों का हवाला: याचिका में कहा गया कि जस्टिस शर्मा ने पहले भी केजरीवाल, सिसोदिया, संजय सिंह और के. कविता की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई की थी, लेकिन एक बार भी राहत नहीं दी।
- सुप्रीम कोर्ट के आदेश: AAP नेताओं ने तर्क दिया कि जस्टिस शर्मा द्वारा दिए गए तीन फैसलों को पहले ही सुप्रीम कोर्ट रद्द कर चुका है।
क्यों नाराज हैं AAP नेता?
- ट्रायल कोर्ट का फैसला: 27 फरवरी को निचली अदालत ने केजरीवाल और सिसोदिया को इस मामले में बरी (Discharge) कर दिया था और सीबीआई की जांच की कड़ी आलोचना की थी।
- हाई कोर्ट का स्टे: जब सीबीआई ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी, तो जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने पहली ही सुनवाई में निचली अदालत की टिप्पणियों को ‘प्रथम दृष्टया त्रुटिपूर्ण’ (Erroneous) बताते हुए उन पर रोक लगा दी। केजरीवाल का कहना है कि दूसरे पक्ष को सुने बिना ऐसी टिप्पणी करना गलत है।
अदालत का रुख
चीफ जस्टिस उपाध्याय ने स्पष्ट किया कि यदि किसी जज को मामले से अलग (Recusal) होना है, तो इसका निर्णय संबंधित जज को स्वयं लेना होता है, चीफ जस्टिस प्रशासनिक स्तर पर ऐसा आदेश नहीं दे सकते।
अगला कदम
सीबीआई की याचिका पर सोमवार को जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की बेंच में सुनवाई होनी है। इस बीच, सुप्रीम कोर्ट में दाखिल केजरीवाल और सिसोदिया की याचिका पर सबकी नजरें टिकी हैं।
मामले का फ्लैशबैक
27 फरवरी को ट्रायल कोर्ट ने सीबीआई के केस को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा था कि यह न्यायिक जांच के सामने टिकने में असमर्थ है। कोर्ट ने जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की सिफारिश भी की थी, जिस पर बाद में हाई कोर्ट ने रोक लगा दी थी।

