RESERVATION-CREAMY LAYER: सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में व्यवस्था दी है कि OBC आरक्षण के लिए ‘क्रीमी लेयर’ (मलाईदार परत) का दर्जा केवल माता-पिता की आय के आधार पर तय नहीं किया जा सकता है।
जस्टिस पी. एस. नरसिंहा और आर. महादेवन की पीठ ने केंद्र सरकार द्वारा दायर उन अपीलों को खारिज कर दिया, जिनमें दिल्ली, मद्रास और केरल उच्च न्यायालयों के फैसलों को चुनौती दी गई थी। ये मामले सिविल सेवा परीक्षा में OBC (नॉन-क्रीमी लेयर) लाभ का दावा करने वाले उम्मीदवारों की पात्रता से जुड़े थे। अदालत ने कहा कि आरक्षण पात्रता तय करते समय निजी क्षेत्र और PSU के कर्मचारियों के साथ सरकारी कर्मचारियों से अलग व्यवहार करना “शत्रुतापूर्ण भेदभाव” (Hostile Discrimination) के समान होगा।
अदालत की मुख्य टिप्पणियां
- समानता का अधिकार: पीठ ने कहा कि निजी संस्थानों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) में कार्यरत लोगों और उनके बच्चों को सरकारी कर्मचारियों की तुलना में अलग श्रेणी में रखना भेदभावपूर्ण है।
- केवल आय आधार नहीं: अदालत ने स्पष्ट किया कि कोई उम्मीदवार क्रीमी लेयर में आता है या नहीं, इसका निर्धारण केवल आय (Income) के आधार पर नहीं हो सकता। इसके लिए माता-पिता के पद की श्रेणी (Category of Post) और उनकी सामाजिक स्थिति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
- संवैधानिक अनिवार्यता: कोर्ट ने कहा, “पिछड़े वर्गों के भीतर से क्रीमी लेयर को बाहर रखना केवल नीतिगत प्राथमिकता नहीं, बल्कि एक संवैधानिक अनिवार्यता है। यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि आरक्षण का लाभ उन लोगों तक पहुंचे जो वास्तव में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हैं।”
विवाद का मुख्य कारण: 1993 का OM और 2004 का पत्र
- सुप्रीम कोर्ट ने 1993 के एक कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum) और 2004 के स्पष्टीकरण पत्र के बीच के विरोधाभास पर गौर किया।
- 1993 का नियम: इसमें ‘आय/संपत्ति परीक्षण’ से वेतन और कृषि आय को बाहर रखा गया था।
- 2004 का पत्र: केंद्र के इस पत्र में PSU और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों की ‘वेतन आय’ को शामिल करने का निर्देश दिया गया था।
अदालत का निष्कर्ष
पीठ ने कहा कि 1993 के मेमोरेंडम और 2004 के पत्र को समग्र रूप से पढ़ने पर यह स्पष्ट है कि केवल वेतन से होने वाली आय ही ‘क्रीमी लेयर’ तय करने का पैमाना नहीं हो सकती।
आरक्षण का उद्देश्य
अदालत ने दोहराया कि क्रीमी लेयर के सिद्धांत का उद्देश्य पिछड़े वर्गों के भीतर “अपेक्षाकृत उन्नत वर्गों” (Advanced Segments) को उन लाभों को हड़पने से रोकना है, जो वास्तव में समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े लोगों के लिए बने हैं।
अगला कदम
इस फैसले के बाद, केंद्र सरकार को उन सिविल सेवा उम्मीदवारों की सेवाओं का पुन: आवंटन (Reallocate) करना होगा, जिन्हें OBC दर्जे के आधार पर योग्य पाया गया था लेकिन ‘क्रीमी लेयर’ के नियमों के कारण लाभ से वंचित रखा गया था।

