Allahabad High Court
Tribunal Case: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा, वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण अधिनियम के तहत बने ट्राइब्यूनल को संपत्ति के मालिकाना हक से जुड़े विवादों की सुनवाई का अधिकार नहीं है।
इशाक नाम के व्यक्ति की याचिका खारिज की
यह फैसला हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने इशाक नाम के व्यक्ति की याचिका खारिज करते हुए दिया। बेंच में जस्टिस अरिंदम सिन्हा और जस्टिस वाईके श्रीवास्तव शामिल थे। कोर्ट ने कहा कि अधिनियम के तहत बने ट्राइब्यूनल सिर्फ उन मामलों की सुनवाई कर सकते हैं, जो बच्चों या ऐसे रिश्तेदारों से जुड़े हों, जो संपत्ति के वारिस हो सकते हैं। खासकर जब मामला किसी तीसरे पक्ष से जुड़ा हो। ऐसे विवादों की सुनवाई केवल सिविल कोर्ट में ही हो सकती है।
यह था याचिकाकर्ता का दावा
याचिकाकर्ता इशाक ने उत्तर प्रदेश माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण नियम, 2014 के नियम 21 के तहत अपनी जान और संपत्ति की सुरक्षा की मांग की थी। उसने दावा किया कि वह अपनी निजी संपत्ति पर गेट बनाना चाहता था, लेकिन निजी प्रतिवादियों ने उसे धमकाया। याचिकाकर्ता की ओर से यह तर्क दिया गया कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम और नियम उन्हें न केवल बच्चों से, बल्कि तीसरे पक्ष से भी सुरक्षा प्रदान करते हैं।
वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के दायरे में संपत्ति नहीं
कोर्ट ने कहा कि यह अधिनियम भारत में टूटते संयुक्त परिवारों के कारण उपेक्षित हो रहे वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा के लिए लाया गया था। अधिनियम की धारा 4 के तहत कोई भी वरिष्ठ नागरिक जो खुद का भरण-पोषण नहीं कर सकता, वह सहायता मांग सकता है। धारा 5 के तहत वह ट्राइब्यूनल में आवेदन दे सकता है, जो अधिनियम की धारा 7 के तहत गठित होता है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता की संपत्ति पर गेट बनाने में पड़ोसी द्वारा की गई रुकावट वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के दायरे में नहीं आती और इसमें कोई कानूनी अधिकार का उल्लंघन नहीं हुआ है। कोर्ट ने 16 जुलाई को हुई सुनवाई में यह याचिका खारिज कर दी।





