Thursday, October 1, 2026
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POCSO Act: POCSO केस निपटाने में दिल्ली देश में दूसरे नंबर पर; साल भर में आए 1006 मामले, निपटाए 1792

POCSO Act: बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों (POCSO) के निपटारा करने के मामलों में दिल्ली की अदालतों ने बड़ी कामयाबी हासिल की है।

डिस्पोजल रेट’ (मामलों के निपटारे की दर) 178 प्रतिशत

साल 2025 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली में नए दर्ज मामलों की तुलना में पुराने मामलों को निपटाने की रफ्तार कहीं ज्यादा रही है। दिल्ली का ‘डिस्पोजल रेट’ (मामलों के निपटारे की दर) 178 प्रतिशत रहा, जो पूरे देश में छत्तीसगढ़ के बाद दूसरे स्थान पर है।’इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन’ की रिपोर्ट ‘पेंडेंसी टू प्रोटेक्शन’ के अनुसार, दिल्ली की अदालतों में साल 2025 में 1,006 नए केस दर्ज हुए, जबकि इस दौरान 1,792 मामलों का फैसला सुनाया गया। इसका मतलब है कि अदालतों ने न केवल नए केस सुने, बल्कि पिछले सालों के लंबित (बैकलॉग) मामलों को भी तेजी से खत्म किया है।

देश ‘टिपिंग पॉइंट’ पर: पहली बार नए केस से ज्यादा निपटारे

  • रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत अब उस स्थिति (टिपिंग पॉइंट) पर पहुंच गया है, जहां सिस्टम केवल केस मैनेज नहीं कर रहा, बल्कि पेंडेंसी को कम कर रहा है।
  • राष्ट्रीय औसत: देशभर में 80,320 नए केस आए और 87,754 निपटाए गए (दर 109%)।
  • राज्यों का हाल: 24 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में निपटारे की दर 100% से अधिक रही।

चिंता की बात: दिल्ली में 54% केस 6 से 10 साल पुराने

  • भले ही निपटारे की रफ्तार बढ़ी है, लेकिन रिपोर्ट ने कुछ गंभीर कमियों की ओर भी इशारा किया है।
  • पुराना बैकलॉग: दिल्ली में अभी भी लंबित मामलों में से 54 प्रतिशत ऐसे हैं जो 6 से 10 साल पुराने हैं।
  • देरी का असर: बच्चों के मामलों में देरी से सर्वाइवर का मानसिक आघात (Trauma) बढ़ जाता है।
  • दोषसिद्धि दर: राज्यों के बीच कनविक्शन रेट (दोषसिद्धि दर) में बड़ा अंतर और पुराने मामलों का अटका होना अभी भी बड़ी चुनौती है।

1977 करोड़ में खत्म हो सकता है पूरा बैकलॉग

रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि अगर देश में 600 नई ई-पोक्सो (e-POCSO) कोर्ट बनाई जाएं, तो अगले 4 साल में सारा बैकलॉग खत्म हो सकता है। इसके लिए करीब 1,977 करोड़ रुपये के खर्च का अनुमान है, जिसे ‘निर्भया फंड’ से इस्तेमाल किया जा सकता है।

“जब सिस्टम दर्ज मामलों से अधिक का निपटारा करने लगता है, तो यह बदलाव की असली शुरुआत होती है। अब समय आ गया है कि हम बच्चों को समय पर न्याय दिलाना एक मानक (Norm) बना दें।”
— पुरुजीत प्रहराज, डायरेक्टर (इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन)

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