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Encounter case: मणिपुर की राजधानी इम्फाल की एक अदालत ने 2009 में दो नागरिकों की हत्या से जुड़े कथित फर्जी मुठभेड़ मामले में CBI की क्लोजर रिपोर्ट खारिज करते हुए बड़ा फैसला सुनाया है।
“वास्तविक मुठभेड़” थी या “फर्जी एनकाउंटर”, चलेगा मुकदमा
अदालत ने 12 सुरक्षा कर्मियों, जिनमें इम्फाल वेस्ट कमांडो यूनिट (CDO) और 39 असम राइफल्स के जवान शामिल हैं, को मुकदमे का सामना करने का आदेश दिया है।
मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (CJM) सोरोखैबम सदानंद की अदालत ने माना कि आरोपियों पर IPC की धारा 302 (हत्या) और 34 (साझा आपराधिक इरादा) के तहत मामला बनता है। अदालत ने कहा कि यह तय करने के लिए मुकदमा चलेगा कि क्या यह “वास्तविक मुठभेड़” थी या “फर्जी एनकाउंटर”। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में CBI को दोबारा जांच का आदेश दिया, जो जस्टिस हेज्डे कमीशन (2013) की रिपोर्ट पर आधारित था। उस रिपोर्ट में कहा गया था कि दोनों मौतें “जानबूझकर की गई हत्याएं” थीं, न कि मुठभेड़ में हुईं।
यह था मामला
यह घटना 4 अप्रैल 2009 की रात की है जब इम्फाल वेस्ट सीडीओ और 39 असम राइफल्स की संयुक्त टीम ने दावा किया था कि उन्होंने चुनाव कार्यालय के पास आतंकियों से मुठभेड़ की। इस दौरान नमीरकपम गोबिन और नमीरकपम नोबो नामक दो लोगों की मौत हो गई, जबकि बाकी के भाग जाने का दावा किया गया। पुलिस ने मौके से एक पिस्तौल, ग्रेनेड और कारतूस बरामद होने की बात कही थी। हालांकि, कुछ समय बाद स्थानीय संगठनों और परिवारों ने आरोप लगाया कि मुठभेड़ फर्जी थी और दोनों को बिना कारण मारा गया। इसके बाद मामला एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल एक्जीक्यूशन विक्टिम फैमिलीज एसोसिएशन मणिपुर (EEVFAM) और ह्यूमन राइट्स अलर्ट की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
CBI की रिपोर्ट पर अदालत की आपत्ति
CBI ने अगस्त 2018 में केस फिर से दर्ज किया और नवंबर 2019 में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की, जिसमें नौ साल पुरानी घटना और गवाहों की अनुपलब्धता को कारण बताया गया। लेकिन CJM सदानंद ने कहा कि जांच “एकतरफा और अपूर्ण” थी। एजेंसी ने केवल तत्कालीन ADM चित्रा देवी की मजिस्ट्रेट जांच को आधार बनाया, जबकि हेज्डे कमीशन की रिपोर्ट को पूरी तरह नज़रअंदाज़ किया। अदालत ने कहा, “यह अजीब है कि CBI ने केवल मजिस्ट्रेट जांच को माना और हेज्डे कमीशन की विपरीत रिपोर्ट पर कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया।”
दोनों मृतक नागरिक थे, आतंकी नहीं
कोर्ट ने पाया कि दोनों मृतक निर्दोष नागरिक थे। नोबो की 2001 में एक पुराने मामले में गिरफ्तारी हुई थी, लेकिन वह केस 2003 में बंद हो चुका था। अदालत ने कहा, “किसी ठोस सबूत के अभाव में यह माना जाता है कि दोनों मृतक नागरिक थे और पीड़ित हैं।”
हथियार बरामदगी पर भी संदेह
अदालत ने हथियारों की जब्ती प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। CDO कर्मियों ने खुद ही जब्ती की और सबूत पास के थाने में जमा कर दिए, जबकि ऐसा पुलिस द्वारा किया जाना चाहिए था। अदालत ने कहा कि “बिना स्वतंत्र गवाह या साक्ष्य के इसे वास्तविक बरामदगी नहीं माना जा सकता।” कोर्ट ने 12 सुरक्षा कर्मियों के खिलाफ हत्या का मुकदमा चलाने का आदेश दिया है। इन्हें 25 नवंबर 2025 को अदालत में पेश होने के लिए समन जारी किए गए हैं।
AFSPA का नहीं मिलेगा संरक्षण
CJM ने यह भी स्पष्ट किया कि आरोपी AFSPA (आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर्स एक्ट) या “ड्यूटी इम्यूनिटी” का हवाला नहीं दे सकते, क्योंकि घटना स्थल उस समय “विक्षुब्ध क्षेत्र (Disturbed Area)” घोषित नहीं था। कोर्ट ने कहा, “पुलिस को किसी नागरिक की हत्या करने का अधिकार नहीं है। चूंकि मृतक नागरिक हैं, इसलिए अभियोजन की अनुमति की आवश्यकता नहीं है।”
12 आरोपियों के खिलाफ ट्रायल का आदेश
- इम्फाल वेस्ट CDO के आरोपी: SI एच. सुखुमार, थ. सुरेश सिंह, एल. लेनिन सिंह, ई. दोस्पा सिंह, थ. थोबा मीतई, SI टी. खोगेन सिंह, SI पी. दिनेशकंता सिंह, हेड कांस्टेबल एस. किरणकुमार सिंह, सचाहांबा बारंपम और एल. इनाओबी सिंह।
- 39 असम राइफल्स से: मेजर सी. श्रीराम और राइफलमैन विपन शर्मा।
“न्याय की दिशा में ऐतिहासिक कदम”
यह आदेश मणिपुर में फर्जी मुठभेड़ों के खिलाफ चल रही लंबी लड़ाई में एक ऐतिहासिक मोड़ माना जा रहा है। 2000 से 2012 के बीच राज्य में सैकड़ों ऐसे मामले दर्ज हुए थे, जिनकी जांच सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में चली। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस फैसले को “न्याय की दिशा में मील का पत्थर” बताते हुए कहा कि इससे पीड़ित परिवारों में फिर से न्याय व्यवस्था पर भरोसा लौटा है।







