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Hate Speech: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि ‘गुस्ताख-ए-नबी की एक सजा, सर तन से जुदा’ जैसा नारा भारत की संप्रभुता, एकता और कानून व्यवस्था को सीधी चुनौती है।
ऐसे नारे इस्लाम के मूल सिद्धांतों के भी खिलाफ
इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल ने यह टिप्पणी एक जमानत याचिका खारिज करते हुए की। कहा, ऐसे नारे यह लोगों को हथियारबंद विद्रोह के लिए उकसाता है और इस पर भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 152 के तहत कार्रवाई बनती है। उन्होंने कहा कि यह नारा इस्लाम के मूल सिद्धांतों के भी खिलाफ है।
यह है मामला
मामला 26 मई को बरेली के बिहारिपुर इलाके में नारेबाजी से जुड़ा है। इस दौरान झड़प में कई पुलिसकर्मी घायल हुए थे। कुछ सरकारी व निजी वाहन क्षतिग्रस्त हो गए थे। कोर्ट ने कहा कि केस डायरी में पर्याप्त सबूत हैं कि आरोपी गैरकानूनी भीड़ का हिस्सा था, जिसने न सिर्फ आपत्तिजनक नारे लगाए, बल्कि पुलिसकर्मियों को चोट पहुंचाई और संपत्ति को नुकसान पहुंचाया। कोर्ट ने कहा- यह राज्य के खिलाफ अपराध है। आरोपी को मौके से गिरफ्तार किया गया था, इसलिए उसे जमानत देने का कोई आधार नहीं है।
जब तक उकसाएं नहीं, अपराध नहीं
हाईकोर्ट ने कहा कि हर धर्म में नारे या उद्घोष होते हैं, जो ईश्वर या गुरु के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए होते हैं। जैसे मुस्लिम समुदाय में ‘नारा-ए-तकबीर’ के बाद ‘अल्लाहु अकबर’ कहा जाता है, जो ईश्वर की महानता को दर्शाता है। इसी तरह सिख धर्म में ‘जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल’ और हिंदू धर्म में ‘जय श्रीराम’ या ‘हर हर महादेव’ जैसे नारे श्रद्धा और खुशी के मौके पर बोले जाते हैं। कोर्ट ने कहा कि जब तक ऐसे नारे किसी अन्य धर्म के लोगों को डराने या उकसाने के लिए नहीं बोले जाते, तब तक वे अपराध नहीं माने जाते।
किसी धार्मिक ग्रंथ में नहीं ऐसा नारा
हाईकोर्ट ने कहा कि सर तन से जुदा नारे का कोई उल्लेख कुरान या किसी इस्लामी धार्मिक ग्रंथ में नहीं है, फिर भी कई मुस्लिम लोग इसे बिना सही मतलब समझे इस्तेमाल कर रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि पैगंबर मोहम्मद की दया और करुणा के कई उदाहरण हैं, लेकिन इस नारे का इस्तेमाल हिंसा भड़काने के लिए किया जा रहा है, जो इस्लाम के सिद्धांतों के भी खिलाफ है।





