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CONTRACTUAL TEACHERS: यूपी के अनुदेशकों की ऐतिहासिक जीत…17,000 वेतन दें, बेगार नहीं करा सकते

CONTRACTUAL TEACHERS: उत्तर प्रदेश के उच्च प्राथमिक विद्यालयों में कार्यरत हजारों संविदा शिक्षकों (अनुदेशकों) की ऐतिहासिक जीत हुई है।

सुप्रीम कोर्ट ने दिया आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए आदेश दिया है कि ये शिक्षक ₹17,000 प्रति माह मानदेय के हकदार हैं। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि 10 साल से लगातार काम कर रहे इन शिक्षकों को अब ‘स्थायी’ माना जाएगा।

अदालत की सख्त टिप्पणी: “यह बेगार और शोषण है”

  • जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस पी.बी. वराले की बेंच ने यूपी सरकार की अपील खारिज करते हुए तीखी टिप्पणी की।
  • अनुच्छेद 23 का उल्लंघन: कोर्ट ने कहा कि इन शिक्षकों का मानदेय हमेशा के लिए ₹7,000 पर स्थिर रखना एक तरह की ‘जबरन मजदूरी’ (Forced Labour) या ‘बेगार’ है, जिस पर संविधान के अनुच्छेद 23 के तहत सख्त पाबंदी है।
  • स्थायी नियुक्ति: कोर्ट ने माना कि 11 महीने के कॉन्ट्रैक्ट पर नियुक्त होने के बावजूद जो शिक्षक 10 साल से सेवा दे रहे हैं, वे अब संविदा कर्मचारी नहीं रहे। उनके पद अब स्थायी (Substantive) माने जाएंगे।

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य निर्देश

  • वेतन वृद्धि: 1 अप्रैल, 2026 से सभी अनुदेशकों को ₹17,000 प्रति माह मानदेय देना शुरू करें।
  • एरियर का भुगतान: साल 2017-18 से अब तक का बकाया (Arrears) अगले 6 महीने के भीतर शिक्षकों को दिया जाए।
  • समय पर समीक्षा: मानदेय को स्थिर नहीं रखा जा सकता। हर तीन साल में इसकी समीक्षा कर इसमें बढ़ोतरी की जानी चाहिए।
  • पे एंड रिकवर: राज्य सरकार मानदेय का भुगतान करे और बाद में केंद्र सरकार से उसका हिस्सा वसूल ले।

“शिक्षक भगवान समान, उनका सम्मान जरूरी”

अदालत ने शिक्षकों की महिमा का गुणगान करते हुए कहा, “शिक्षक केवल एक प्रशिक्षक नहीं, बल्कि एक दैवीय माध्यम है जो ‘भारत भाग्य विधाता’ (अगली पीढ़ी) का चरित्र निर्माण करता है। यदि राष्ट्र की नींव मजबूत रखनी है, तो हमें अपने शिक्षकों को उचित मुआवजा और सम्मान देना ही होगा।”

मामले का बैकग्राउंड

  • 2013: सर्व शिक्षा अभियान के तहत ₹7,000 मानदेय पर अंशकालिक अनुदेशकों की भर्ती शुरू हुई।
  • विवाद: सालों तक काम करने के बाद भी वेतन नहीं बढ़ा, जबकि अन्य खर्च और काम का बोझ बढ़ता गया।
  • इलाहाबाद हाई कोर्ट: सिंगल जज ने ₹17,000 देने का आदेश दिया था, लेकिन डिवीजन बेंच ने इसे केवल एक साल (2017-18) तक सीमित कर दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने इसे स्थायी रूप से लागू कर दिया है।
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