Thursday, February 19, 2026
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Judgement overturn: पायजामा की डोरी तोड़ना और खींचना रेप जैसे अपराध को साबित नहीं करता…एक और विवादित फैसले पलटा गया

Judgement overturn: सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस विवादास्पद फैसले को रद्द कर दिया है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए नाबालिग बच्ची के साथ की गई बर्बरता को ‘रेप की कोशिश’ मानने से इनकार कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट की टिप्पणियों पर सख्त नाराजगी जताते हुए कहा कि यौन अपराधों के मामलों में कानूनी दलीलों के साथ-साथ ‘सहानुभूति’ (Empathy) का होना भी अनिवार्य है।

क्या था इलाहाबाद हाईकोर्ट का विवादित आदेश

यह मामला 11 साल की एक बच्ची से जुड़ा है। आरोप के मुताबिक, दो युवकों (पवन और आकाश) ने बच्ची के कपड़े फाड़ने की कोशिश की और उसे खींचकर एक पुलिया के नीचे ले जाने लगे। इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा ने मार्च 2025 में अपने आदेश में कहा था कि पायजामा की डोरी तोड़ना और खींचना यह साबित करने के लिए काफी नहीं है कि आरोपी रेप करना चाहते थे। कोर्ट ने इसे ‘रेप का प्रयास’ न मानकर केवल ‘बेअदबी’ (Section 354-B) और ‘यौन उत्पीड़न’ की श्रेणी में डाल दिया था।

सुप्रीम कोर्ट की फटकार: “यह सिर्फ तैयारी नहीं, अपराध की कोशिश है”

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने 10 फरवरी 2026 को दिए अपने फैसले में हाईकोर्ट के तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, हम हाईकोर्ट के इस निष्कर्ष से सहमत नहीं हो सकते कि ये आरोप केवल अपराध की ‘तैयारी’ थे, ‘प्रयास’ नहीं। अगर अदालतें पीड़ितों की संवेदनशीलता के प्रति लापरवाह रहेंगी, तो ‘पूर्ण न्याय’ कभी नहीं हो सकता।

जजों के लिए बनेंगे नए ‘सेंसिटिविटी गाइडलइंस’

  • सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेते हुए अब न्यायपालिका में बड़े सुधार के निर्देश दिए हैं।
  • विशेषज्ञ समिति का गठन: भोपाल स्थित नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी (NJA) को एक विशेषज्ञ समिति बनाने का निर्देश दिया गया है।
  • तीन महीने में रिपोर्ट: यह समिति तीन महीने के भीतर रिपोर्ट देगी कि जजों और न्यायिक प्रक्रिया को यौन अपराधों के प्रति अधिक संवेदनशील और मानवीय कैसे बनाया जाए।
  • सरल और क्षेत्रीय भाषा: कोर्ट ने जोर दिया कि ये दिशा-निर्देश देश की भाषाई विविधता को ध्यान में रखते हुए सरल भाषा में होने चाहिए, ताकि आम जनता भी इन्हें समझ सके।

फैसले का सार: ‘न्याय में करुणा जरूरी’

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानूनी प्रक्रिया से लेकर अंतिम फैसले तक, न्याय प्रणाली में करुणा, मानवता और समझ झलकनी चाहिए। अदालत ने माना कि जजों के नजरिए और अदालती प्रक्रियाओं में सुधार की तत्काल आवश्यकता है ताकि पीड़ितों को न्याय पाने में और अधिक प्रताड़ना न झेलनी पड़े।

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