Friday, September 18, 2026
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BNS vs Section 377: डेढ़ साल हो गए, गैर-सहमति वाले ‘Unnatural Sex’ पर केंद्र का फैसला कहा है?

BNS vs Section 377: दिल्ली हाई कोर्ट ने एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए कहा, डेढ़ साल हो गए, गैर-सहमति वाले ‘Unnatural Sex’ पर केंद्र का फैसला कहा है?

दरअसल, उस जनहित याचिका (PIL) को दोबारा सुनवाई के लिए बहाल (Restore) कर दिया है, जिसमें नए कानून भारतीय न्याय संहिता (BNS) में ‘अप्राकृतिक यौन संबंध’ (Unnatural Sex) से जुड़े दंडात्मक प्रावधानों को शामिल करने की मांग की गई है। कोर्ट ने इस बात पर नाराजगी जताई कि डेढ़ साल बीत जाने के बाद भी केंद्र सरकार ने इस गंभीर मुद्दे पर कोई फैसला नहीं लिया है।

विवाद की जड़: BNS में क्या छूटा?

  • जब 1 जुलाई 2024 को IPC की जगह BNS लागू हुआ, तो उसमें पुरानी धारा 377 (Section 377) के बराबर का कोई प्रावधान नहीं रखा गया। याचिकाकर्ता गंतव्य गुलाटी ने कई तर्क दिए।
  • कानूनी शून्य (Legal Void): धारा 377 गैर-सहमति वाले अप्राकृतिक यौन संबंधों, नाबालिगों के साथ कुकृत्य और पशुगमन (Bestiality) को दंडित करती थी।
  • LGBTQ+ समुदाय पर असर: इसकी अनुपस्थिति से विशेष रूप से LGBTQ समुदाय के पास उनके साथ होने वाली ज्यादतियों के खिलाफ कोई क्रिमिनल रेमेडी (कानूनी उपचार) नहीं बचा है।
  • सुरक्षा का अभाव: सुप्रीम कोर्ट ने 377 के तहत केवल ‘आपसी सहमति’ वाले संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया था, लेकिन ‘गैर-सहमति’ (Non-consensual) वाले कृत्य अभी भी अपराध होने चाहिए थे।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी: “फैसला कहीं नजर नहीं आ रहा”

चीफ जस्टिस डी. के. उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की बेंच ने कहा, अगस्त 2024 में हमने केंद्र को 6 महीने के भीतर फैसला लेने का निर्देश दिया था। डेढ़ साल का समय पर्याप्त होता है, लेकिन आपका फैसला कहीं नजर नहीं आ रहा (Nowhere in sight)। इसलिए हम इस याचिका को फिर से सुनवाई के लिए बहाल कर रहे हैं।

केंद्र सरकार का पक्ष

सरकारी वकील ने दलील दी कि यह एक “संवेदनशील मुद्दा” है और इसके लिए विभिन्न स्टेकहोल्डर्स (हितधारकों) से सुझाव मांगे गए हैं। एक “नया दृष्टिकोण” (Fresh View) लेने में थोड़ा समय लगेगा।

अब आगे क्या?

शपथ पत्र (Affidavit): कोर्ट ने केंद्र से 4 हफ्ते के भीतर यह बताने को कहा है कि अगस्त 2024 के आदेश के बाद से अब तक क्या-क्या कदम उठाए गए हैं।

यह था Section 377?

  • IPC 377: “प्रकृति की व्यवस्था के विरुद्ध” (Against the order of nature) किसी भी पुरुष, महिला या जानवर के साथ शारीरिक संबंध बनाने को अपराध मानता था।
  • 2018 का बदलाव: सुप्रीम कोर्ट ने वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बने संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था, लेकिन गैर-सहमति वाले कृत्यों के लिए इसे बरकरार रखा था।
  • BNS की स्थिति: वर्तमान में BNS में पुरुषों या ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के साथ होने वाले गैर-सहमति वाले यौन कृत्यों के लिए स्पष्ट प्रावधानों की कमी है।
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