Wednesday, October 28, 2026
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PIL Crackdown: टेंडर में वकील का क्या काम?…जनहित याचिका के नाम पर ब्लैकमेलिंग बर्दाश्त नहीं

PIL Crackdown: सुप्रीम कोर्ट ने जनहित याचिका (PIL) के नाम पर दायर “प्रायोजित मुकदमों” (Sponsored Litigation) पर कड़ी नाराजगी जताई।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने उस याचिका पर सुनवाई की, जिसमें आंध्र प्रदेश ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन (AP TRANSCO) द्वारा जारी टेंडर की शर्तों को ‘पक्षपातपूर्ण’ बताकर चुनौती दी गई थी। अदालत ने एक वकील द्वारा AP TRANSCO के टेंडर की शर्तों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि वकीलों को व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता का मोहरा नहीं बनना चाहिए।

कोर्ट के तीखे सवाल: वकील को टेंडर की इतनी जानकारी कहाँ से?

  • जब एक प्रैक्टिसिंग वकील ने टेंडर की तकनीकी शर्तों पर सवाल उठाए, तो बेंच ने उनके ‘जनहित’ के दावे पर संदेह जताया।
  • अदालत की टिप्पणी: “आप एक वकील हैं? कोर्ट में काम करने वाले एक वकील को यह कैसे पता कि सरकारी विभाग की टेंडर प्रक्रिया में क्या हो रहा है? आपके पास इन सब कामों के लिए समय कहाँ से आता है?”
  • प्रायोजित मुकदमेबाजी: कोर्ट ने कहा कि अक्सर व्यावसायिक प्रतिद्वंद्वी (Rival Bidders) खुद सामने आने के बजाय वकीलों को मोहरा बनाकर ऐसी याचिकाएं दायर करवाते हैं।

हाईकोर्ट का पिछला फैसला

  • इससे पहले आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने भी इस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसके मुख्य कारण थे।
  • देरी से आना: याचिका तब दायर की गई जब टेंडर प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी और काम शुरू हो चुका था।
  • उद्देश्य: हाईकोर्ट ने नोट किया कि यह याचिका किसी ‘वंचित या हाशिए के समूह’ के लिए नहीं, बल्कि बड़े ठेकेदारों और कंपनियों के हितों के लिए दायर की गई प्रतीत होती है।
  • योग्यता: याचिकाकर्ता ने खुद टेंडर प्रक्रिया में भाग नहीं लिया था और न ही वह किसी भी तरह का ‘हित’ (Stake) साबित कर सका।

₹5 लाख का जुर्माना और ‘ब्लैकमेलिंग’ की चेतावनी

  • सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान एक समय ऐसा आया जब बेंच बहुत सख्त हो गई थी।
  • भारी जुर्माना: शुरुआत में कोर्ट ने याचिका को ₹5 लाख के जुर्माने के साथ खारिज करने का आदेश दिया।
  • कड़ी टिप्पणी: जब वकील ने जुर्माना हटाने की विनती की, तो बेंच ने कहा— “आपका स्पॉन्सर (प्रायोजक) भुगतान कर देगा, चिंता न करें। हम आपको याचिका वापस लेने की अनुमति नहीं देंगे, ताकि आप अलग-अलग मंचों पर जाकर ब्लैकमेलिंग जारी न रखें।”

अंत में मिली ‘माफी

  • याचिकाकर्ता के वकील द्वारा बार-बार “युवा वकील” होने और “मेहनत की कमाई” का हवाला देने पर, जस्टिस विक्रम नाथ ने मुस्कुराते हुए अपने साथी जज से पूछा, “छोड़ दें इसे?” (Should we let him go?)
  • नतीजा: कोर्ट ने अंततः दया दिखाते हुए जुर्माना हटा दिया और याचिका को “वापस लिया गया” मानकर खारिज कर दिया।

केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
याचिकाकर्ताकनिथी दीपक (एक प्रैक्टिसिंग वकील)।
प्रतिवादीआंध्र प्रदेश सरकार और AP TRANSCO।
विवादअंडरग्राउंड केबल और ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर के टेंडर।
कोर्ट का संदेशवकील व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता का हिस्सा न बनें।

PIL का असली मकसद

सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि जनहित याचिका (PIL) का उपयोग उन लोगों के लिए होना चाहिए जो खुद अदालत नहीं पहुँच सकते। इसे कॉर्पोरेट घरानों की लड़ाई या टेंडर प्रक्रिया में बाधा डालने का हथियार बनाना “न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग” है। वकीलों को ‘प्रो बोनो’ (निःशुल्क) सेवाएं गरीबों को देनी चाहिए, न कि बड़े ठेकेदारों को।

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