Badhai Row: इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने किन्नर समुदाय द्वारा ‘बधाई’ (Badhai) वसूलने के लिए ‘इलाका तय’ (Territory Demarcation) करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है।
जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की बेंच ने 15 अप्रैल, 2026 को दिए अपने आदेश में स्पष्ट किया कि कानून किसी भी व्यक्ति से इस तरह पैसे वसूलने की अनुमति नहीं देता और न ही इसे कानूनी मान्यता दी जा सकती है। गोंडा जिले के एक किन्नर समूह ने याचिका दायर कर मांग की थी कि कर्नलगंज क्षेत्र में उनके लिए ‘बधाई’ वसूलने का इलाका निर्धारित किया जाए, ताकि दूसरे समूहों के साथ होने वाले खूनी संघर्ष और ‘जानलेवा हमलों’ को रोका जा सके।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी: वसूली कोई अधिकार नहीं
- हाई कोर्ट ने ‘बधाई’ प्रथा और उसे कानूनी संरक्षण देने के मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाया।
- अवैध वसूली: किसी भी व्यक्ति से उसकी इच्छा के विरुद्ध या जबरन पैसा वसूलने की अनुमति नहीं दी जा सकती। भारत के किसी भी नागरिक को केवल कानून के अनुसार टैक्स, सेस या फीस देने के लिए ही निर्देशित किया जा सकता है।
- गैंगराज का खतरा: अदालत ने चेतावनी दी कि यदि इस याचिका को स्वीकार किया जाता है, तो कई अन्य लोग या ‘गैंग’ भी इसी तरह अवैध वसूली (Extortion) को कानूनी मान्यता देने की मांग करने लगेंगे।
- BNS के तहत अपराध: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी वसूली भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत एक दंडनीय अपराध है और इसे किसी भी कानून द्वारा मंजूरी नहीं दी गई है।
याचिकाकर्ता के तर्क और ‘प्रथागत अधिकार’ (Customary Right)
- किन्नर समूह के वकील ने निम्नलिखित दलीलें पेश की थीं।
- पुरानी परंपरा: उन्होंने तर्क दिया कि वे कई वर्षों से एक परिभाषित क्षेत्र में ‘बधाई’ (शुभ अवसरों पर भेंट) एकत्र करने की परंपरा का पालन कर रहे हैं और यह उनका “प्रथागत अधिकार” है।
- हिंसा से सुरक्षा: वकील ने दलील दी कि दूसरे समूहों के हस्तक्षेप के कारण जानलेवा हमले और गंभीर चोटें आ रही हैं, इसलिए अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत उनके अधिकारों की रक्षा के लिए इलाके का सीमांकन (Demarcation) जरूरी है।
कानून का अभाव (Lack of Legal Backing)
- कोर्ट ने याचिकाकर्ता के दावों को सिरे से खारिज कर दिया।
- 2019 का अधिनियम: ‘ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019’ में भी ऐसे किसी अधिकार (पैसे वसूलने) का उल्लेख नहीं है।
- 2026 का नया बिल: कोर्ट ने यह भी नोट किया कि संसद में 2026 का एक नया बिल विचाराधीन है, जो 2019 के कानून से काफी अलग है और लिंग निर्धारण (Gender Determination) पर केंद्रित है, लेकिन वह भी इस तरह की वसूली को मान्यता नहीं देता।
- संवैधानिक मर्यादा: कोर्ट अनुच्छेद 226 के तहत बिना किसी कानूनी आधार के ऐसी गतिविधियों को वैध नहीं बना सकता।
केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)
| बिंदु | विवरण |
| क्षेत्र | कर्नलगंज, गोंडा (उत्तर प्रदेश)। |
| मांग | बधाई वसूली के लिए क्षेत्र का सीमांकन (Demarcation)। |
| कोर्ट का आदेश | याचिका खारिज; वसूली को अपराध माना। |
| कानूनी संदर्भ | भारतीय न्याय संहिता (BNS) और ट्रांसजेंडर अधिनियम। |
परंपरा बनाम कानून
इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि सदियों पुरानी परंपराएं कानून से ऊपर नहीं हो सकतीं। हालांकि ‘बधाई’ भारतीय संस्कृति का एक हिस्सा रही है, लेकिन जब यह ‘अनिवार्य वसूली’ या ‘क्षेत्रीय वर्चस्व’ (Territorial Dominance) की लड़ाई बन जाए, तो न्यायपालिका इसे मौलिक अधिकार के रूप में स्वीकार नहीं कर सकती। यह फैसला जनता को किसी भी तरह की जबरन वसूली से सुरक्षा प्रदान करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

