Questionable Action: राउज एवेन्यू की विशेष सीबीआई अदालत ने प्रवर्तन निदेशालय यानि ईडी के कामकाज के तौर तरीके पर भी प्रहार किया। उनके PMLA और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर प्रहार करते हुए काेर्ट ने उनपर गंभीर टिप्पणी की।
यह रही जजमेंट में की गई टिप्पणी
- “उल्टा कानून”: आधार के बिना सजा (Para 1-3)
कोर्ट ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि ED (प्रवर्तन निदेशालय) मुख्य अपराध (जैसे भ्रष्टाचार का CBI केस) के न्यायिक परीक्षण से पहले ही आरोपियों को गिरफ्तार कर लेती है।
विसंगति: मनी लॉन्ड्रिंग का मामला ‘प्रेडिकेट ऑफेंस’ (Predicate Offence) पर निर्भर होता है। यदि मुख्य केस ही साबित न हो, तो मनी लॉन्ड्रिंग का केस खुद-ब-खुद खत्म हो जाता है।
कोर्ट का तर्क: बिना यह जाने कि क्या कोई वास्तविक अपराध हुआ भी है, किसी को जेल में डालना “कानूनी योजना का विचलित रूप” (Disturbing Inversion) है।
- PMLA की ‘कठिन शर्तें’ और लंबी जेल
जज ने उल्लेख किया कि PMLA के तहत जमानत की शर्तें इतनी सख्त हैं कि आरोपी को मुकदमे से पहले ही लंबे समय तक जेल में रहना पड़ता है।
दंडात्मक प्रक्रिया: कोर्ट ने कहा कि जब तक मुख्य अपराध की जांच अधूरी है, तब तक लंबी कैद एक जांच प्रक्रिया नहीं बल्कि “सजा” (Punitive Process) बन जाती है।
अनुच्छेद 21 का उल्लंघन: स्वतंत्रता का हनन केवल कानूनी रूप में नहीं, बल्कि सार (Substance) में भी उचित और तर्कसंगत होना चाहिए।
- “घोड़े के आगे गाड़ी” (Cart before the Horse)
न्यायालय ने एक “अजीब स्थिति” का जिक्र किया कि एक तरफ ED का मनी लॉन्ड्रिंग केस अंतिम चरण (Charge Arguments) पर पहुँच गया है। दूसरी तरफ, CBI के मुख्य केस में अभी यह भी तय नहीं हुआ है कि कोई अपराध हुआ भी है या नहीं। यह स्थिति कानूनी रूप से अस्थिर है क्योंकि PMLA का अस्तित्व ही मुख्य अपराध के टिके रहने पर निर्भर है।
अदालत का सुझाव: शक्ति और स्वतंत्रता में संतुलन
अदालत ने स्वीकार किया कि मनी लॉन्ड्रिंग एक अंतरराष्ट्रीय और गुप्त अपराध है, जिससे निपटने के लिए ED को व्यापक शक्तियां दी गई हैं। लेकिन वैधानिक शक्तियां (Statutory Powers) कितनी भी व्यापक क्यों न हों, वे अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) से ऊपर नहीं हो सकतीं। कोर्ट ने कहा कि जांच के दौरान ‘संपत्ति की कुर्की’ (Attachment) उचित हो सकती है, लेकिन ‘गिरफ्तारी’ और ‘कठिन जमानत शर्तें’ तब तक नहीं होनी चाहिए जब तक मुख्य अपराध स्पष्ट न हो जाए। जांच एजेंसी की शक्ति और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन कोई ‘विधायी कृपा’ नहीं, बल्कि एक संवैधानिक आदेश है।

