Bombay High court
Copy paste culture: 2006 के मुंबई लोकल ट्रेन ब्लास्ट केस में बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा, इकबालिया बयानों व गवाहों के बयानों में कॉपी-पेस्ट संस्कृति मिली।
यह एक खतरनाक ट्रेंड: अदालत
21 जुलाई को अदालत ने सभी 12 आरोपियों को बरी कर दिया था। कोर्ट ने कहा कि आरोपियों के कबूलनामे अधूरे, असत्य और एक-दूसरे से कॉपी किए हुए हैं। हाईकोर्ट ने इसे एक खतरनाक ट्रेंड बताया और कहा कि यह पुलिस की जांच की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करता है।
आरोपियों के कबूलनामों का चार्ट भी शामिल किया
कोर्ट ने अपने 671 पेज के फैसले में आरोपियों के कबूलनामों की तुलना करते हुए एक चार्ट भी शामिल किया। इसमें दिखाया गया कि कैसे कई आरोपियों के बयान एक जैसे हैं। कोर्ट ने कहा कि अगर सवाल एक जैसे भी हों, तो जवाब शब्दशः एक जैसे होना असंभव है।
पहले भी जताई थी चिंता
हाईकोर्ट ने मई और जून में भी दो मामलों में गवाहों के बयानों में कॉपी-पेस्ट पाए थे। तब कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को इस पर गाइडलाइन बनाने के निर्देश दिए थे।
यह रहा अदालत का निष्कर्ष
हाईकोर्ट ने कहा कि इन बयानों की विश्वसनीयता नहीं है और इन पर अभियोजन पक्ष का भरोसा गलत था। कोर्ट ने कहा कि यह एक खतरनाक चलन है, जिसे रोकना जरूरी है।
कोर्ट ने कहा-
- दो लोग एक जैसी बात कह सकते हैं, लेकिन शब्द और क्रम एक जैसा होना संभव नहीं।
- यह दिखाता है कि बयान आरोपियों से नहीं, बल्कि किसी एक अधिकारी द्वारा तैयार किए गए हैं।
- आरोपियों ने सेशंस कोर्ट में भी कहा था कि उन्होंने कोई कबूलनामा नहीं दिया, सिर्फ दस्तावेजों पर जबरन साइन कराए गए।
2015 में ट्रायल कोर्ट ने कबूलनामों को सही माना था
2015 में ट्रायल कोर्ट ने इन कबूलनामों को सही माना था और आरोपियों की यातना, पुलिस के सामने बयान दर्ज होने जैसी आपत्तियों को खारिज कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि सिर्फ एक जैसे हिस्सों के आधार पर यह मान लेना कि बयान झूठे हैं, गलत होगा।
हाईकोर्ट ने कहा-
- ट्रायल कोर्ट ने जिन बातों को नजरअंदाज किया, वे बेहद गंभीर हैं।
- आरोपियों ने बयान वापस ले लिए थे और कहा था कि उन्हें जबरन साइन कराया गया।
- सात डीसीपी ने ये बयान दर्ज किए थे, लेकिन सभी में एक जैसी भाषा और क्रम दिखता है।





