Covid vaccination: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, कोविड-19 टीकाकरण के बाद होने वाले गंभीर प्रतिकूल प्रभावों (Serious Adverse Events) के लिए एक ‘नो-फॉल्ट’ (No-fault) मुआवजा नीति तैयार की जाए।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने उन याचिकाओं पर यह फैसला सुनाया, जिनमें दावा किया गया था कि टीकाकरण के बाद गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के कारण कुछ लोगों की जान गई है।
फैसले की मुख्य बातें
- मुआवजा नीति की आवश्यकता: कोर्ट ने केंद्र से कहा कि वह एक ऐसा ढांचा तैयार करे जिसके तहत वैक्सीन के गंभीर दुष्प्रभावों के मामलों में पीड़ितों को मुआवजा मिल सके। ‘नो-फॉल्ट’ नीति का मतलब है कि मुआवजे के लिए यह साबित करने की जरूरत नहीं होगी कि कोई विशेष गलती या लापरवाही हुई थी।
- मौजूदा निगरानी तंत्र: अदालत ने स्पष्ट किया कि टीकाकरण के बाद प्रतिकूल घटनाओं की निगरानी के लिए वर्तमान में जो वैज्ञानिक तंत्र काम कर रहा है, वह जारी रहेगा।
- विशेषज्ञ समिति की मांग खारिज: जस्टिस नाथ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि वैज्ञानिक मूल्यांकन के लिए किसी अलग कोर्ट-नियुक्त विशेषज्ञ समिति की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि मौजूदा तंत्र पर्याप्त है।
- कानूनी स्थिति: पीठ ने साफ किया कि इस नई नीति का मतलब यह नहीं माना जाएगा कि भारत सरकार या किसी अन्य प्राधिकरण ने अपनी ओर से किसी गलती या दायित्व (Liability) को स्वीकार किया है।
पृष्ठभूमि
अदालत उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिनमें से एक में आरोप लगाया गया था कि 2021 में कोविशील्ड (Covishield) वैक्सीन की पहली खुराक लेने के बाद दो महिलाओं की मौत हो गई थी। याचिका में दावा किया गया था कि टीकाकरण के बाद उन्हें गंभीर स्वास्थ्य जटिलताओं का सामना करना पड़ा।
पीड़ितों के लिए राहत
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार द्वारा बनाई जाने वाली यह नीति पीड़ितों को अन्य कानूनी उपचार (Remedies) अपनाने से नहीं रोकेगी। यदि कोई व्यक्ति कानून के तहत अन्य उपलब्ध माध्यमों से न्याय चाहता है, तो वह उसके लिए स्वतंत्र है।

