Delhi’s Excise Policy: राउज एवेन्यू कोर्ट के विशेष सीबीआई जज(पीसी एक्ट) जितेंद्र सिंह की अदालत ने चर्चित आबकारी नीति घोटाला में पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, भारत राष्ट्र समिति (BRS) नेता के. कविता और 20 अन्य को आरोपमुक्त (Discharge) कर दिया है।
विशेष न्यायाधीश जितेन्द्र सिंह ने सीबीआई की चार्जशीट पर संज्ञान लेने से इनकार करते हुए कहा, आबकारी नीति में आरोपियों का कोई “व्यापक साजिश या आपराधिक इरादा” नहीं पाया गया।
कोर्ट के फैसले की 5 बड़ी बातें
- सबूतों का अभाव: अदालत ने कहा कि सीबीआई का मामला केवल अनुमानों पर आधारित था और न्यायिक जांच में टिक नहीं सका।
- केजरीवाल पर टिप्पणी: जज ने कहा कि बिना किसी सबूत के पूर्व मुख्यमंत्री को फंसाया गया, जो कानून के शासन के खिलाफ है।
- सिसोदिया को राहत: मनीष सिसोदिया के खिलाफ रिकॉर्ड पर ऐसी कोई सामग्री नहीं मिली जो उनकी संलिप्तता दिखाए, न ही उनसे कोई रिकवरी हुई।
- सरकारी गवाहों पर सवाल: कोर्ट ने जांच एजेंसी द्वारा आरोपियों को माफी देकर सरकारी गवाह बनाने और उनके बयानों से जांच की कमियों को भरने के तरीके की कड़ी आलोचना की।
चार्जशीट आंतरिक अंतर्विरोधों से भरी है, जो साजिश के सिद्धांत की जड़ पर ही प्रहार करती है।
विशेष न्यायाधीश जितेन्द्र सिंह
“कट्टर ईमानदार”: फैसले के बाद केजरीवाल भावुक
क्लीन चिट मिलने की खबर सुनते ही अरविंद केजरीवाल भावुक हो गए। उन्होंने इसे स्वतंत्र भारत के इतिहास की “सबसे बड़ी राजनीतिक साजिश” करार दिया। कहा, अदालत ने साबित कर दिया है कि केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और AAP ‘कट्टर ईमानदार’ हैं। बता दें कि इस मामले में केजरीवाल 6 महीने और सिसोदिया लगभग 2 साल जेल में रहे थे।
बरी हुए अन्य प्रमुख नाम
अदालत ने कुल 23 लोगों को क्लीन चिट दी है, जिनमें प्रमुख हैं: विजय नायर (AAP संचार प्रभारी), अभिषेक बोइनपल्ली और अरुण रामचंद्र पिल्लई, समीर महेंद्रू और अमनदीप सिंह ढाल, दुर्गेश पाठक (AAP विधायक),
CBI का अगला कदम: दिल्ली हाईकोर्ट में अपील
सीबीआई ने इस फैसले पर असहमति जताते हुए तुरंत दिल्ली हाईकोर्ट में अपील करने की घोषणा की है। एजेंसी के प्रवक्ता के अनुसार, जांच के कई पहलुओं को या तो नजरअंदाज किया गया है या उन पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया है।
आबकारी नीति घोटाला को लेकर जानें पारा वाइज कोर्ट की टिप्पणी
- साजिश के दावों का पूरी तरह से खंडन (Para 1077-1080)
- अदालत ने कहा कि सीबीआई जिस “बड़ी साजिश” की बात कर रही है, वह केवल कल्पनाओं और अनुमानों (conjecture and surmise) पर आधारित है।
- कोई प्रथम दृष्टया मामला नहीं: अदालत ने स्पष्ट किया कि 300 गवाहों और भारी दस्तावेजों की जांच के बाद भी आरोपियों के खिलाफ “गंभीर संदेह” का स्तर भी नहीं मिला।
- नीति निर्माण में कोई गड़बड़ी नहीं: दस्तावेज़ साबित करते हैं कि आबकारी नीति (DEP-21/22) एक परामर्श प्रक्रिया का परिणाम थी। यहाँ तक कि उपराज्यपाल (LG) के सुझावों को भी इसमें शामिल किया गया था।
- जांच प्रक्रिया पर सख्त टिप्पणी (Para 1083, 1100)
- अदालत ने सीबीआई की कार्यप्रणाली को “मनमाना” और “अन्यायपूर्ण” बताया।
- चुनिंदा जांच: आरोप लगाया गया कि सीबीआई ने अलग-अलग टुकड़ों को जोड़कर एक काल्पनिक साजिश रचने की कोशिश की ताकि गोवा विधानसभा चुनाव जैसे बाहरी मुद्दों से इसे जोड़ा जा सके।
- न्यायिक मौन का त्याग: न्यायाधीश ने कहा कि जहाँ राज्य की शक्ति का दुरुपयोग हो, वहाँ अदालत का चुप रहना अपने कर्तव्य का त्याग करने जैसा होगा।
- सरकारी गवाह (Approver) के बयानों का दुरुपयोग (Para 1089-1094)
- अदालत ने सरकारी गवाह दिनेश अरोड़ा के बयानों को बार-बार (लगभग 1.5 साल तक) दर्ज करने पर गहरी चिंता जताई।
- अनुचित तरीका: एक बार जब किसी आरोपी को ‘माफी’ (Pardon) मिल जाती है, तो उसके बयान बार-बार दर्ज करना जांच की कमियों को भरने या नए लोगों को फंसाने की कोशिश जैसा लगता है।
- संजय सिंह का संदर्भ: अदालत ने हैरानी जताई कि मुख्य चार्जशीट में संजय सिंह का नाम न होने के बावजूद, बाद के बयानों में जबरन नए आरोप जोड़े गए।
- ‘साउथ ग्रुप’ जैसे क्षेत्रीय लेबल पर आपत्ति (Para 1114-1116)
- अदालत ने सीबीआई द्वारा आरोपियों के एक समूह के लिए “साउथ ग्रुप” (South Group) शब्द के उपयोग को “मनमाना और अनुचित” बताया।
- क्षेत्रीय भेदभाव: कोर्ट ने कहा कि किसी की क्षेत्रीय पहचान के आधार पर उसे लेबल करना संवैधानिक समानता के खिलाफ है। अदालत ने अमेरिकी अदालत के एक फैसले (United States v. Cabrera) का उदाहरण देते हुए कहा कि “अपराध इस आधार पर तय होना चाहिए कि व्यक्ति ने क्या किया, न कि इस आधार पर कि वह कौन है।”
- पूर्वाग्रह का जोखिम: इस तरह की लेबलिंग से निष्पक्ष न्याय की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है और यह देश की एकता और अखंडता के संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है।
- दस्तावेजों को छिपाना (Segregation of Documents) (Para 1106-1110)
- अदालत ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण कानूनी मुद्दे पर ध्यान दिलाया—जांच एजेंसी द्वारा उन दस्तावेजों को अदालत से दूर रखना जो आरोपियों के पक्ष में हो सकते हैं (Unrelied Documents)।
- सच की खोज: जांच का उद्देश्य केवल दोषी ठहराना नहीं, बल्कि सच खोजना है। यदि कोई दस्तावेज आरोपी की निर्दोषता साबित कर सकता है, तो उसे केवल “गैर-भरोसेमंद” सूची में डालकर छिपाया नहीं जा सकता।
- ‘साक्ष्य छिपाने’ पर प्रहार (दस्तावेजों का वर्गीकरण)
- अदालत ने सीबीआई की उस कार्यप्रणाली की आलोचना की है जहाँ वह आरोपियों के पक्ष में जाने वाले सबूतों को “गैर-भरोसेमंद” (Unrelied Documents) बताकर कोर्ट से दूर रखती है।
- सत्य की खोज: जांच का उद्देश्य केवल सजा दिलाना नहीं, बल्कि सत्य का पता लगाना है। यदि राज्य को कोई ऐसा सबूत मिलता है जो आरोपी को निर्दोष साबित कर सकता है, तो उसे छिपाना ‘अनुच्छेद 21’ (निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार) का उल्लंघन है।
- पारदर्शिता की मांग: कोर्ट ने आदेश दिया कि भविष्य में यदि जांच एजेंसी किसी दस्तावेज को “गैर-भरोसेमंद” मानती है, तो उसे इसका स्पष्ट कारण दर्ज करना होगा।
- अंतरराष्ट्रीय उदाहरण: ‘कैबरेरा’ (Cabrera) केस का संदर्भ
- अदालत ने अपनी बात को पुख्ता करने के लिए अमेरिकी अदालत के एक प्रसिद्ध मामले (United States v. Cabrera) का हवाला दिया।
- क्या था कैबरेरा केस? वहाँ अभियोजन पक्ष ने आरोपियों को बार-बार “डोमिनिकन ड्रग डीलर” कहा था। अदालत ने उस सजा को केवल इसलिए रद्द कर दिया क्योंकि राष्ट्रीयता या जातीयता का इस्तेमाल आरोपियों के खिलाफ पूर्वाग्रह पैदा करने के लिए किया गया था।
- मुख्य सिद्धांत: आपराधिक मुकदमों का आधार यह होना चाहिए कि आरोपी ने क्या किया, न कि यह कि आरोपी कौन है।
- अदालत का संदेश: अपराध का निर्धारण साक्ष्यों द्वारा सिद्ध किए गए आचरण पर होना चाहिए, न कि इस बात पर कि आरोपी कहाँ से आता है।
- जांच एजेंसियों को चेतावनी: भाषा की मर्यादा (Para 1123)
- अदालत ने कहा कि चार्जशीट और जांच के वृत्तांत (narrative) लिखते समय एजेंसियों को भाषा के चयन में अत्यधिक सावधानी, संयम और तटस्थता बरतनी चाहिए।
- भेदभावपूर्ण शब्दावली से बचें: अभियुक्तों का विवरण निष्पक्ष और साक्ष्य-आधारित होना चाहिए। क्षेत्रीय या पहचान-आधारित श्रेणियों (जैसे “साउथ ग्रुप”) का उपयोग अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध) और अनुच्छेद 21 (निष्पक्ष प्रक्रिया) के खिलाफ है।
- संवैधानिक आदेश: यदि किसी शब्दावली का अपराध से कोई तार्किक संबंध नहीं है, तो उसे केवल अपमानित करने या पूर्वाग्रह पैदा करने के लिए उपयोग नहीं किया जाना चाहिए।
- PMLA और ‘प्रेडिकेट ऑफेंस’ (Predicate Offence) का पेच (Para 1124-1127)
- अदालत ने एक बहुत ही गंभीर विसंगति (Anomaly) की ओर इशारा किया है जो वर्तमान कानूनी व्यवस्था में देखी जा रही है।
- बुनियाद के बिना इमारत: मनी लॉन्ड्रिंग (PMLA) का मामला हमेशा एक ‘प्रेडिकेट ऑफेंस’ (जैसे भ्रष्टाचार या धोखाधड़ी का मुख्य मामला) पर टिका होता है।
-चिंताजनक स्थिति: कोर्ट ने देखा कि अक्सर प्रवर्तन निदेशालय (ED) मनी लॉन्ड्रिंग का मामला शुरू कर देता है और आरोपियों को जेल भेज देता है, जबकि मुख्य अपराध (CBI वाला मामला) की जांच अभी चल ही रही होती है। - अजीबोगरीब उदाहरण: कोर्ट ने ऐसे मामलों का ज़िक्र किया जहाँ मनी लॉन्ड्रिंग केस में अंतिम बहस चल रही है, जबकि मुख्य केस में अभी यह भी तय नहीं हुआ है कि कोई अपराध हुआ भी है या नहीं।
- ‘विजय मदनलाल चौधरी’ फैसले का हवाला (Para 1126)
- अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले (Vijay Madanlal Choudhary v. Union of India) को दोहराया:
- नियम: यदि मुख्य अपराध (Predicate Offence) खत्म हो जाता है (बरी होने या डिस्चार्ज होने के कारण), तो मनी लॉन्ड्रिंग का मामला अपने आप खत्म हो जाएगा।
- निष्कर्ष: मनी लॉन्ड्रिंग कोई स्वतंत्र अपराध नहीं है; यह मुख्य अपराध की नींव पर खड़ा है। यदि नींव (Foundation) ढह गई, तो इमारत (Superstructure) गिरनी ही होगी।
- व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अनुच्छेद 21 (Para 1128)
- अदालत ने बहुत ही भावुक लेकिन कानूनी रूप से सशक्त टिप्पणी की है।
- दंडात्मक प्रक्रिया: बिना परीक्षण (trial) के अनिश्चित काल तक जेल में रखना जांच प्रक्रिया को ‘सजा’ (punitive) में बदल देता है।
- अपूरणीय क्षति: एक बार छीनी गई आजादी को बाद में मिलने वाली ‘बंरी’ (Acquittal) से वापस नहीं लाया जा सकता। समय के नुकसान की भरपाई कोई भी कानून नहीं कर सकता।
- शक्ति और सुरक्षा के बीच संतुलन (Para 1129-1130)
- अदालत ने स्वीकार किया कि विधायिका ने मनी लॉन्ड्रिंग जैसे गंभीर अपराधों से निपटने के लिए ED को गिरफ्तारी और संपत्ति कुर्क करने जैसी व्यापक शक्तियाँ दी हैं।
- अधिकार बनाम कर्तव्य: कोर्ट ने कहा कि कानून का उद्देश्य वैध है, लेकिन सांवधानिक सुरक्षा उपायों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। गिरफ्तारी और लंबी कैद अपवाद (exception) होनी चाहिए, नियम (rule) नहीं।
- घोड़े के आगे गाड़ी (Cart before the horse): कोर्ट ने चेतावनी दी कि मुख्य अपराध (Predicate Offence) साबित होने से पहले ही गिरफ्तारी और जमानत की कठिन शर्तें लागू करना “कारण से पहले परिणाम” देने जैसा है।
- मनीष सिसोदिया केस और लंबी जेल पर टिप्पणी (Para 1131-1132)
- अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के मनीष सिसोदिया बनाम दिल्ली राज्य मामले का हवाला दिया।
- बिना मुकदमे कैद: बिना ट्रायल शुरू हुए अनिश्चित काल तक जेल में रखना जमानत देने के लिए एक महत्वपूर्ण आधार है।
- दंडात्मक हिरासत: मुकदमे से पहले की हिरासत (Pre-trial detention) खुद में एक सजा नहीं बननी चाहिए। PMLA की वैधता तभी बनी रहेगी जब इसका इस्तेमाल निष्पक्ष और आनुपातिक (proportionate) हो।
- संवैधानिक आदेश: व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करना कोई “विधायी कृपा” नहीं, बल्कि एक “संवैधानिक आदेश” है।
- न्याय के शाश्वत आदर्श (Para 1133)
- फैसले के समापन पर न्यायाधीश ने दो महान उद्धरणों का उपयोग किया है जो न्यायपालिका के प्रति उनके दृष्टिकोण को दर्शाते हैं।
- मार्टिन लूथर किंग जूनियर: “कहीं भी होने वाला अन्याय, हर जगह के न्याय के लिए खतरा है।”
- लैटिन सूत्र (Fiat justitia ruat caelum): “चाहे आकाश गिर जाए, लेकिन न्याय होना चाहिए।”
- अदालत ने स्पष्ट किया कि न्याय का काम किसी सुविधाजनक परिणाम को सुरक्षित करना या किसी खास नैरेटिव (कथा) का समर्थन करना नहीं है, बल्कि कानून के शासन (Rule of Law) को बनाए रखना है।
- IN THE COURT OF SH. JITENDRA SINGH, SPECIAL JUDGE
(PC ACT) (CBI)-23,(MPs/ MLAs CASES) ROUSE AVENUE COURT COMPLEX: NEW DELHI
CBI Case No. 56/2022- CBI Vs. KULDEEP SINGH AND OTHERS
CNR No. DLCT11-000733-2022, FIR No. RC0032022A0053, PS CBI, ACB, New Delhi
In the matter of: Central Bureau of Investigation, CGO Complex, Lodhi Road, New Delhi-110003.
Versus
Kuldeep Singh, Narender Singh, Vijay Nair, Abhishek Boinpally, Arun Ramchandra Pillai, Mootha Goutam, Sameer Mahendru, Manish Sisodia, Amandeep Singh Dhall,,Arjun Pandey, Butchibabu Gorantla, Rajesh Joshi, Damodar Prasad Sharma
CBI Vs. Kuldeep Singh, Prince Kumar,Arvind Kumar Singh, Chanpreet Singh Rayat, Kavitha Kalvakuntla @ K. Kavitha, Arvind Kejriwal, Durgesh Pathak, Amit Arora, Vinod Chauhan, Ashish Chand Mathur, Sarath Chandra Reddy

