Financial irregularity: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि एक बैंक अधिकारी ‘भरोसे के पद’ (Position of Trust) पर होता है क्योंकि वह जनता के पैसे का प्रबंधन करता है।
जस्टिस पी. एस. नरसिंहा और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि भले ही बैंक को कोई सीधा वित्तीय नुकसान न हुआ हो, लेकिन नियमों की अनदेखी बैंक को जोखिम में डालती है और यह ‘कदाचार’ (Misconduct) की श्रेणी में आता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अपनी शक्तियों से बाहर जाकर लोन देना या यह सुनिश्चित न करना कि लोन का उपयोग उसी काम के लिए हो रहा है जिसके लिए वह लिया गया है, एक ‘वित्तीय अनियमितता’ है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से बैंकिंग सेक्टर में अनुशासन और जवाबदेही और मजबूत होगी। अब अधिकारियों को लोन देने के बाद यह ट्रैक करना अनिवार्य होगा कि ग्राहक उस पैसे का उपयोग कहां और कैसे कर रहा है।
अदालत की मुख्य टिप्पणियां: “सतर्कता अनिवार्य है”
- जनता का पैसा: “जब एक बैंक कर्मचारी जमाकर्ताओं या ग्राहकों के पैसे को संभालता है, तो उसे अपने कर्तव्यों के निर्वहन में अत्यधिक सतर्क रहना चाहिए, न कि लापरवाह।”
- निगरानी का उद्देश्य: लोन के अंतिम उपयोग (End Use) को सुनिश्चित करने से दो उद्देश्य पूरे होते हैं—पहला, ऋण की वसूली सुरक्षित करना और दूसरा, यह सुनिश्चित करना कि पैसा किसी गलत काम में न डाइवर्ट हो जाए।
- लापरवाही भी अपराध: “कर्तव्यों के निर्वहन में कोई भी ढिलाई, चाहे वह लापरवाही से हो या जानबूझकर, कदाचार मानी जाएगी।”
रिटायरमेंट के बाद भी सजा बरकरार
- यह मामला पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के एक पुराने आदेश से जुड़ा था, जिसमें एक बैंक कर्मचारी पर लोन वितरण में अनियमितता के आरोप थे।
- मामला: कर्मचारी 30 सितंबर 2011 को रिटायर हुआ था, लेकिन उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई जारी रही।
- सजा: जांच में दोषी पाए जाने पर उसके वेतनमान (Pay Scale) में तीन चरणों की स्थायी कटौती की सजा दी गई।
- कर्मचारी की दलील: उसने तर्क दिया कि रिटायरमेंट के बाद ऐसी सजा नहीं दी जा सकती।
- सुप्रीम कोर्ट का रुख: कोर्ट ने अपील खारिज करते हुए कहा कि यदि सेवा नियम अनुमति देते हैं, तो रिटायरमेंट के बाद भी कार्यवाही जारी रह सकती है। वेतनमान में कटौती के आधार पर उसकी पेंशन (Pension) की गणना दोबारा की जा सकती है।
नुकसान न होने का तर्क खारिज
- अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि बैंक अधिकारी यह कहकर नहीं बच सकता कि “बैंक को कोई घाटा नहीं हुआ।
- बैंक को नुकसान नहीं हुआ, सिर्फ इस आधार पर सजा पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। बैंक के पैसे को जोखिम में डालना ही अपने आप में बड़ा अपराध है।

