Hindu Marriage Act:आपसी एग्रीमेंट से नहीं टूट सकती शादी; J&K हाई कोर्ट ने कहा- “तलाक के लिए कोर्ट की डिक्री ज़रूरी” है।
जम्मू और कश्मीर हाई कोर्ट के जस्टिस संजय परिहार की बेंच ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए साफ किया है कि हिंदू विवाह अधिनियम (Hindu Marriage Act) के तहत हुई शादी को पति-पत्नी के बीच हुए किसी ‘निजी समझौते’ (Private Agreement) या सेटलमेंट डीड से खत्म नहीं किया जा सकता। शादी को कानूनी रूप से खत्म करने के लिए अदालत की डिक्री (Decree) या किसी पुख्ता रीति-रिवाज (Custom) का होना अनिवार्य है।
In the High Court of Jammu and Kashmir and Ladakh,
Justice Sanjay Parihar
Case no.-CRM(M)-444/2020, Crlm no.-220/2020, 1709/2020, 1710/2020,1711/2020
c/w
CRM(M) no-279/2021, Crlm no.-789/2021, 790/2021
पूरा मामला क्या था? (The Dispute)
- बहस: एक पति ने अपनी पत्नी को भरण-पोषण (Maintenance) देने से यह कहकर इनकार कर दिया कि उनके बीच एक समझौता हुआ था, जिसके तहत वे आपसी सहमति से अलग रह रहे हैं और उन्होंने अपने हक तय कर लिए हैं।
- पति का तर्क: चूँकि वे आपसी सहमति से अलग हैं, इसलिए CrPC की धारा 488(5) (अब 125(4)) के तहत पत्नी मेंटेनेंस की हकदार नहीं है।
- पत्नी का तर्क: उसने कहा कि सिर्फ एक कागज पर दस्तखत करने से शादी खत्म नहीं हो जाती और पति द्वारा अनदेखी (Neglect) किए जाने पर वह मेंटेनेंस की हकदार बनी रहती है।
कोर्ट का फैसला और कानूनी बारीकियां
- जस्टिस संजय परिहार की बेंच ने इस मामले की गहराई से समीक्षा की ।
- शादी का अंत सिर्फ कानूनी तरीके से: J&K हिंदू मैरिज एक्ट 1980 के तहत, हिंदुओं के बीच शादी को केवल कोर्ट द्वारा पारित तलाक की डिक्री से ही भंग किया जा सकता है। “महज एक सेटलमेंट डीड निष्पादित कर लेने से शादी खुद-ब-खुद खत्म नहीं हो जाती।”
- एग्रीमेंट की अहमियत (Maintenance के संदर्भ में): कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हालांकि निजी समझौता शादी को खत्म नहीं कर सकता, लेकिन मेंटेनेंस के केस में यह एक सबूत के तौर पर काम कर सकता है। यह देखने के लिए कि क्या पति-पत्नी ‘आपसी सहमति’ से अलग रह रहे हैं, एग्रीमेंट को देखा जा सकता है। अगर यह साबित हो जाए कि वे सच में मर्जी से अलग हैं, तो पत्नी मेंटेनेंस का दावा नहीं कर सकती। लेकिन, अगर पति ने पत्नी को छोड़ दिया है या वह उसकी देखभाल नहीं कर रहा, तो एग्रीमेंट होने के बावजूद पति को मेंटेनेंस देना होगा।
अदालत का मानवीय दृष्टिकोण (Final Order)
- कोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए न्याय के हित में और महिला को ‘बेसहारा’ होने से बचाने के लिए एक बीच का रास्ता निकाला।
- One-time Settlement: कोर्ट ने पति को निर्देश दिया कि वह पत्नी को 2.50 लाख रुपये की एकमुश्त (Lump sum) राशि का भुगतान करे।
- समय सीमा: यह राशि 6 महीने के भीतर देनी होगी।
- ब्याज: अगर समय पर भुगतान नहीं हुआ, तो 6% सालाना ब्याज भी देना होगा।

