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Housewife Maintenance: “घर संभालने वाली पत्नी ‘खाली’ नहीं बैठी होती”…वह श्रम करती है तब पति बाहर कमाने जाता है

Housewife Maintenance: दिल्ली हाई कोर्ट ने गुजारा भत्ता (Maintenance) के एक मामले में ‘बेरोजगार पत्नी’ को लेकर समाज की पुरानी सोच पर कड़ा प्रहार किया है।

कोर्ट ने कहा कि एक गृहिणी (Homemaker) का श्रम ही पति को बाहर काम करने के काबिल बनाता है, इसलिए उसे ‘खाली’ या ‘आलसी’ कहना गलत है।

कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां

  • अदृश्य श्रम की पहचान: जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा, “एक गृहिणी खाली नहीं बैठती; वह वह श्रम करती है जो कमाने वाले जीवनसाथी को प्रभावी ढंग से कार्य करने में सक्षम बनाता है। इस योगदान को नजरअंदाज करना अन्यायपूर्ण होगा।”
    -योग्यता बनाम रोजगार: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘कमाने की क्षमता’ होना और ‘वास्तव में कमाना’ दो अलग बातें हैं। केवल इसलिए कि पत्नी पढ़ी-लिखी है, उसे गुजारा भत्ता देने से इनकार नहीं किया जा सकता।
    -अदृश्य ढांचा: घर संभालना, बच्चों की परवरिश और पति के करियर के लिए अपनी खुशियों का त्याग करना—ये सब ‘काम’ हैं, भले ही ये बैंक स्टेटमेंट में न दिखें।

मामला क्या था?

  • साल 2012 में शादी हुई थी, लेकिन 2020 में पति ने पत्नी और उनके नाबालिग बेटे को छोड़ दिया।
  • निचली अदालत का फैसला: मजिस्ट्रेट कोर्ट ने यह कहकर अंतरिम गुजारा भत्ता देने से मना कर दिया था कि पत्नी “पढ़ी-लिखी और स्वस्थ है, लेकिन वह खुद काम नहीं करना चाहती।”
  • पति की दलील: पति ने हाई कोर्ट में तर्क दिया कि पत्नी “खाली” बैठकर मेंटेनेंस नहीं मांग सकती जब वह खुद कमाने में सक्षम है।

हाई कोर्ट का पलटवार

  • हाई कोर्ट ने पति की दलीलों को खारिज कर दिया।
  • दोहरा मापदंड: भारतीय समाज में अक्सर महिलाओं से शादी के बाद नौकरी छोड़ने की उम्मीद की जाती है, लेकिन विवाद होने पर पति उसी पत्नी को “पढ़ी-लिखी” बताकर पैसे देने से बचते हैं।
  • प्रोफेशनल गैप: अगर कोई महिला परिवार के लिए करियर छोड़ती है, तो सालों बाद वह उसी पद या सैलरी पर दोबारा नौकरी शुरू नहीं कर सकती।

फैसला और समाधान

  • ₹50,000 की मदद: कोर्ट ने महिला के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उसे ₹50,000 का गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया।
  • मुकदमेबाजी पर चिंता: कोर्ट ने कहा कि मेंटेनेंस के मामले अक्सर बहुत कड़वाहट भरे हो जाते हैं। पति अपनी आय कम बताता है और पत्नी खर्चे बढ़ाकर।
  • मध्यस्थता (Mediation) की सलाह: कोर्ट ने सुझाव दिया कि अदालती लड़ाई के बजाय ‘मीडिएशन’ एक बेहतर रास्ता है, जहाँ दोनों पक्ष बैठकर अपनी जरूरतों और क्षमताओं पर बात कर सकें।
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