Interfaith Couples:इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सोमवार को अंतरधार्मिक जोड़ों (Interfaith Couples) के हक में एक ऐतिहासिक टिप्पणी की है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दो वयस्क व्यक्ति अपनी मर्जी से साथ रह सकते हैं और उत्तर प्रदेश का धर्मांतरण विरोधी कानून (Anti-Conversion Law) उन्हें ऐसा करने से नहीं रोक सकता।
अदालत की बड़ी बातें
- संवैधानिक अधिकार: जस्टिस विवेक कुमार सिंह ने कहा कि अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहना, चाहे उसका धर्म कुछ भी हो, संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का हिस्सा है।
- समानता का नियम: कोर्ट ने तर्क दिया, “अगर कानून दो समलैंगिक व्यक्तियों (Same-Sex) को साथ रहने की अनुमति देता है, तो दो अलग धर्मों के पुरुष और महिला के साथ रहने पर समाज या राज्य को आपत्ति क्यों होनी चाहिए?”
- धर्म बनाम वयस्क: अदालत ने साफ किया कि वह जोड़ों को ‘हिंदू-मुस्लिम’ के रूप में नहीं, बल्कि अपनी इच्छा से काम करने वाले ‘दो परिपक्व वयस्कों’ के रूप में देखती है।
UP धर्मांतरण कानून पर स्पष्टीकरण
- अदालत ने UP विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 की व्याख्या की।
- शादी और लिव-इन: अंतरधार्मिक विवाह अपने आप में इस कानून के तहत प्रतिबंधित नहीं है।
- अपराध की शर्त: कानून तब लागू होता है जब धर्मांतरण लालच, जबरदस्ती, धोखाधड़ी या दबाव में किया गया हो।
- स्वैच्छिक बदलाव: यदि कोई धर्म बदलना चाहता है, तो उसे कानून की धारा 8 और 9 की प्रक्रिया का पालन करना होगा, लेकिन लिव-इन में रहने मात्र को अपराध नहीं माना जा सकता।
पुलिस को निर्देश
यह मामला 12 ऐसे जोड़ों का था जिन्हें उनके परिजनों या तीसरे पक्ष से धमकियाँ मिल रही थीं। कोर्ट ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ता अपनी सुरक्षा के लिए पुलिस के पास जा सकते हैं। पुलिस को उनकी उम्र और आरोपों की जांच करनी होगी। यदि खतरा सही पाया जाता है, तो पुलिस को उनकी जान और आजादी की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी।
यह रहा अदालत का निष्कर्ष
हाई कोर्ट ने दोहराया कि संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध) के तहत कानून सबके लिए बराबर है। यदि एक ही धर्म के दो लोग साथ रह सकते हैं, तो अलग-अलग धर्मों के लोगों को भी वही अधिकार प्राप्त है।

