Calcutta High Court
JOB COMPASSIONATE: कलकत्ता हाई कोर्ट ने पिता की मौत के 15 साल बाद करुणामूलक आधार पर नौकरी देने की मांग को खारिज कर दिया।
वैकेंसी को सुरक्षित रखकर इंतजार नहीं किया जा सकता
एक उम्मीदवार की याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा, बहुलता (वैकेंसी) को सुरक्षित रखकर यह इंतजार नहीं किया जा सकता कि मृतक कर्मचारी का वारिस बालिग होकर नौकरी मांगे। याचिकाकर्ता सैयद शाहिनूर जमां के वकील ने अदालत को बताया कि उनके पिता, जो मुर्शिदाबाद जिले के एक सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालय में असिस्टेंट हेडमास्टर थे, 2010 में ड्यूटी पर ही निधन हो गया था, और उस समय याचिकाकर्ता मात्र आठ साल का था। जमां ने जून 2025 में करुणामूलक नौकरी के लिए आवेदन किया।
जस्टिस अमृता सिन्हा ने कहा
“मृतक कर्मचारी के वारिस के बालिग होने के बाद उसके लिए वैकेंसी आरक्षित रखने का कोई प्रावधान नहीं है।”
याचिकाकर्ता का दावा
याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि उसकी मां ने पिता की मौत के बाद स्कूल प्राधिकरणों के पास करुणामूलक नौकरी की मांग की थी, लेकिन जिला विद्यालय निरीक्षक, मुर्शिदाबाद ने उस पर कोई कार्रवाई नहीं की। हालांकि अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता इस बात का कोई दस्तावेज पेश नहीं कर सका कि उस समय ऐसा कोई आवेदन किया गया था। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि वयस्क होने के बाद उसने स्कूल प्राधिकरणों को करुणामूलक नियुक्ति के लिए आवेदन दिया था, जो जिला विद्यालय निरीक्षक के कार्यालय में लंबित है। उसने आग्रह किया कि डीआईओएस को उसके आवेदन पर निर्णय लेने के निर्देश दिए जाएँ।
अदालत ने कहा कि करुणामूलक नियुक्ति को लेकर कानून स्पष्ट
जिस व्यक्ति को कर्मचारी की मृत्यु के दिन आवेदन का कोई अधिकार नहीं था, वह बाद में बालिग होने पर भी ऐसा अधिकार नहीं पा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि करुणामूलक नियुक्ति नियमित भर्ती की प्रक्रिया नहीं है; यह केवल उस तत्काल आर्थिक संकट को दूर करने के लिए दी जाती है, जो परिवार को कमाने वाले सदस्य की अचानक मौत से पैदा होता है। अदालत ने कहा कि 2010 में मौत होने और 2025 में आवेदन किए जाने की स्थिति में अब किसी तरह की राहत नहीं दी जा सकती। अदालत ने टिप्पणी की, “इतने विलंब के बाद मृतक के वारिस पर दया दिखाने का कोई अवसर नहीं है,”और याचिका को खारिज कर दिया।





