Monday, February 16, 2026
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Magisterial Power: मजिस्ट्रेट FIR दर्ज कराने का निर्देश दे सकता है…सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

Magisterial Power: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, मजिस्ट्रेट को यह अधिकार है कि वह पुलिस को धारा 156(3) सीआरपीसी (अब BNSS की धारा 175(3)) के तहत FIR दर्ज करने का निर्देश दे सके।

खंडपीठ ने कर्नाटक हाईकोर्ट का आदेश निरस्त कर दिया

न्यायमूर्ति पंकज मित्तल और अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की खंडपीठ ने कर्नाटक हाईकोर्ट का वह आदेश निरस्त कर दिया, जिसमें मजिस्ट्रेट के निर्देश पर दर्ज FIR को रद्द कर दिया गया था। यदि किसी शिकायत में ऐसे तथ्य हों जो संज्ञेय अपराध (cognizable offence) को दर्शाते हों, तो मजिस्ट्रेट निर्देश दे सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब शिकायत में संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है, तो मजिस्ट्रेट को FIR दर्ज कराने का निर्देश देने का पूरा अधिकार है, “इस चरण पर मजिस्ट्रेट को केवल यह देखना होता है कि क्या शिकायत में अपराध का खुलासा होता है, न कि आरोप सही हैं या नहीं।”

शिकायत में क्या था मामला

शिकायतकर्ता ने पुलिस में यह आरोप लगाया था कि एक फर्जी रेंट एग्रीमेंट बनाकर हाईकोर्ट को गुमराह किया गया। पुलिस की निष्क्रियता के बाद शिकायतकर्ता ने न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम श्रेणी (JMFC) का दरवाजा खटखटाया। जांच के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि E-स्टाम्प पेपर नकली था, जिसके बाद JMFC ने 18 जनवरी 2018 को धारा 156(3) के तहत पुलिस को FIR दर्ज करने का निर्देश दिया। इस पर पुलिस ने धोखाधड़ी (धारा 420), जालसाजी (धारा 468, 471) और साजिश (धारा 120B IPC) के तहत मामला दर्ज किया। लेकिन हाईकोर्ट ने FIR और JMFC के आदेश — दोनों को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि मजिस्ट्रेट ने प्रक्रिया का पालन नहीं किया और कोई प्राथमिक साक्ष्य नहीं था।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट को फटकार लगाई

हाईकोर्ट के इस निर्णय को पलटते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “हाईकोर्ट ने जांच की प्रारंभिक अवस्था में हस्तक्षेप कर दिया, जबकि शिकायत में अपराध का स्पष्ट खुलासा था।” न्यायमूर्ति अमानुल्लाह ने अपने फैसले में लिखा, “JMFC का आदेश 18.01.2018 पूरी तरह उचित था। उपलब्ध सामग्री से यह स्पष्ट था कि पुलिस द्वारा विस्तृत जांच की आवश्यकता है। इसलिए मजिस्ट्रेट का मामला जांच के लिए भेजना न्यायसंगत था।”

अदालत ने पुराने फैसले का हवाला दिया

अदालत ने Madhao बनाम महाराष्ट्र राज्य (2013) 5 SCC 615 का हवाला देते हुए कहा कि “यदि शिकायत पढ़ने से यह पता चलता है कि उसमें संज्ञेय अपराध का उल्लेख है, तो मजिस्ट्रेट को मामला पुलिस के पास भेजने का पूरा अधिकार है, ताकि न्याय के हित में समय की बचत हो और पुलिस अपनी जिम्मेदारी निभा सके।”

FIR बहाल, जांच के आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के 24 जुलाई 2019 और 18 नवंबर 2021 के आदेशों को निरस्त करते हुए कहा, “FIR क्राइम नंबर 12/2018, खड़े बाज़ार पुलिस स्टेशन को बहाल किया जाता है। पुलिस को कानून के अनुसार जल्द जांच पूरी करने का निर्देश दिया जाता है।” अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि निजी पक्षकार अपने बचाव से संबंधित साक्ष्य पुलिस जांच या अदालत में प्रस्तुत करने के लिए स्वतंत्र हैं।

IN THE SUPREME COURT OF INDIA
CRIMINAL APPELLATE JURISDICTION
CRIMINAL APPEAL NO. OF 2025
[@ SPECIAL LEAVE PETITION (CRIMINAL) NO.11336 OF 2022]
SADIQ B. HANCHINMANI VERSUS THE STATE OF KARNATAKA & ORS
WITH
CRIMINAL APPEAL NO. OF 2025
[@ SPECIAL LEAVE PETITION (CRIMINAL) NO. _ OF 2025]
[@DIARY NO.39619 OF 2022]
SADIQ B. HANCHINMANI VERSUS THE STATE OF KARNATAKA & ORS

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