Monday, February 16, 2026
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Matrimonial disputes: वैवाहिक विवादों में व्हाट्सएप चैट और कॉल रिकॉर्डिंग अब बन सकेगा सबूत…जानें पूरा केस

Matrimonial disputes: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि व्हाट्सएप चैट और कॉल रिकॉर्डिंग सहित निजी इलेक्ट्रॉनिक संचार को वैवाहिक विवादों में सबूत के रूप में स्वीकार किया जा सकता है, बशर्ते वे अदालत के समक्ष विचाराधीन मुद्दों से संबंधित हों।

यह है मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला एक तलाक की कार्यवाही से उपजा है जिसमें पति ने अपने आरोपों को साबित करने के लिए कुछ व्हाट्सएप बातचीत और टेलीफोन कॉल रिकॉर्डिंग का सहारा लिया था। पत्नी ने तर्क दिया कि यह सामग्री उसकी सहमति के बिना प्राप्त की गई थी और इसे रिकॉर्ड पर लेना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उसके निजता के अधिकार (Right to Privacy) का उल्लंघन होगा।फैमिली कोर्ट ने पहले ही पति को इन इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को रिकॉर्ड पर रखने की अनुमति दे दी थी, जिसे पत्नी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।

हाईकोर्ट का फैसला और कानूनी आधार

  1. फैमिली कोर्ट एक्ट की धारा 14: अदालत ने फैमिली कोर्ट एक्ट, 1984 की धारा 14 के दायरे पर विचार किया। यह धारा फैमिली कोर्ट को किसी भी ऐसी सामग्री या सबूत को स्वीकार करने की शक्ति देती है जो विवाद के प्रभावी समाधान में मदद कर सके, भले ही वह ‘भारतीय साक्ष्य अधिनियम’ के तकनीकी नियमों का सख्ती से पालन न करता हो।
  2. निजता का अधिकार बनाम निष्पक्ष सुनवाई: न्यायालय ने अपने फैसले में निम्नलिखित महत्वपूर्ण बिंदु रखे। इसमें निजता का अधिकार पूर्ण (Absolute) नहीं है। न्यायिक कार्यवाही के संदर्भ में, सत्य तक पहुंचने और निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करने की आवश्यकता निजता की चिंताओं से अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है।
    वैवाहिक मामलों में, निजी बातचीत अक्सर विवाद का केंद्र होती है, इसलिए इनका साक्ष्य मूल्य (Evidentiary Value) होता है।
  3. लचीला और व्यावहारिक दृष्टिकोण: कोर्ट ने जोर दिया कि पारिवारिक अदालतों को पार्टियों के बीच न्याय करने के लिए लचीला और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। हालांकि, ऐसे साक्ष्यों की स्वीकार्यता उनकी प्रामाणिकता (Authenticity) और प्रासंगिकता (Relevance) की जांच के अधीन होगी।

निर्णय का महत्व

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह फैसला आधुनिक मुकदमेबाजी में डिजिटल संचार के महत्व को रेखांकित करता है। यह निजता के अधिकारों और प्रभावी परीक्षण की आवश्यकताओं के बीच संतुलन बनाने की दिशा में न्यायपालिका के विकसित होते दृष्टिकोण को दर्शाता है।

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