Organ Donation: मद्रास हाई कोर्ट ने अंग दान (Organ Donation) से जुड़े एक मामले में चिकित्सा शिक्षा निदेशालय (DME) को कड़ी नसीहत दी है।
कोर्ट ने कहा कि अंग दान करने वाले हर व्यक्ति को संदेह या ‘संदेहवाद’ (Scepticism) की नजर से देखना सही नहीं है।
मामला क्या था?
- एक मरीज ‘स्टेज 5 क्रॉनिक किडनी रोग’ से जूझ रहा था। उसे अंग दान करने के लिए उसके ममी के पति के भाई (मौसा के भाई) आगे आए थे।
- अथॉरिटी का इनकार: चिकित्सा शिक्षा निदेशालय (DME) की अधिकार समिति ने इस दान को अनुमति देने से मना कर दिया था, क्योंकि डोनर मरीज का ‘करीबी रिश्तेदार’ (Immediate relative) नहीं था।
- कोर्ट का हस्तक्षेप: मरीज और डोनर ने इस फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
जस्टिस पी. टी. आशा ने अपने आदेश में कहा
- निस्वार्थ भावना: “यह नहीं भूलना चाहिए कि समाज में कुछ दयालु व्यक्ति ऐसे भी हैं जो किसी परिवार के सदस्य या दोस्त को नया जीवन देने के लिए निस्वार्थ भाव से अंग दान करना चाहते हैं।”
- गणितीय पैमाना गलत: गैर-रिश्तेदारों के बीच होने वाले अंग दान को ‘गणितीय तराजू’ पर तौलना या हर मामले को शक की नजर से देखना व्यावहारिक (Unpragmatic) नहीं है।
- जीवन बचाना सर्वोपरि: कोर्ट ने कहा कि एक इंसान की जान बचाना सबसे महत्वपूर्ण है और अथॉरिटी का इनकार पूरी तरह से मनमाना और निराधार था।
अदालत का आदेश
हाई कोर्ट ने अधिकार समिति (Authorisation Committee) को निर्देश दिया है कि मरीज और डोनर के आवेदन को स्वीकार किया जाए। कानून के अनुसार अंग प्रत्यारोपण (Transplant) की अनुमति 3 सप्ताह के भीतर प्रदान की जाए।
निष्कर्ष
यह फैसला उन परिवारों के लिए एक बड़ी राहत है जहाँ ‘करीबी रिश्तेदारों’ में डोनर नहीं मिल पाते और दूर के रिश्तेदार या दोस्त मदद के लिए आगे आते हैं।

