Paternity leave: सुप्रीम कोर्ट ने पितृत्व (Parenthood) की पारंपरिक परिभाषा को विस्तार दिया।
शीर्ष कोर्ट ने केंद्र सरकार से पितृत्व अवकाश (Paternity Leave) को एक सामाजिक सुरक्षा लाभ के रूप में मान्यता देने के लिए कानून बनाने का आग्रह किया है। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि बच्चे का पालन-पोषण केवल एक व्यक्ति का कार्य नहीं है, बल्कि यह माता और पिता की साझा जिम्मेदारी है। जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने यह टिप्पणी उस ऐतिहासिक फैसले के दौरान की, जिसमें उन्होंने गोद लेने वाली माताओं के लिए ‘3 महीने के बच्चे’ की अनिवार्य शर्त को खत्म कर दिया था।
अदालत की मुख्य दलीलें: क्यों जरूरी है पिता का साथ?
- साझा जिम्मेदारी: कोर्ट ने कहा, “पितृत्व एक एकाकी कार्य नहीं है। हालांकि माँ की भूमिका केंद्रीय है, लेकिन पिता की समान रूप से महत्वपूर्ण भूमिका को नजरअंदाज करना अन्यायपूर्ण होगा।”
- जेंडर रूढ़ियों का अंत: पीठ ने जोर देकर कहा कि पितृत्व अवकाश का प्रावधान समाज में तय जेंडर भूमिकाओं (Gendered Roles) को तोड़ने में मदद करता है। यह पिताओं को सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रोत्साहित करता है और कार्यस्थल व परिवार में लैंगिक समानता को बढ़ावा देता है।
- शुरुआती बंधन (Early Bonding): कोर्ट के अनुसार, बच्चे के जीवन के शुरुआती महीने उसके भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। पिता की उपस्थिति बच्चे में सुरक्षा की भावना पैदा करती है।
“वीकेंड पर समय बिताना पर्याप्त नहीं”
अदालत ने नौकरी की मजबूरियों के कारण पिता की अनुपस्थिति पर गहरी चिंता जताई। पिता की अनुपस्थिति को अक्सर इस उम्मीद के साथ तर्कसंगत ठहराया जाता है कि वे ‘वीकेंड’ पर समर्पित समय देकर इसकी भरपाई कर लेंगे। लेकिन उस बच्चे के लिए, जिसे शुरुआती क्षणों में पिता की आवाज़ सुनने और उसकी गर्माहट महसूस करने की ज़रूरत थी, यह अनुपस्थिति केवल यादों का मामला नहीं है। यह उसके भावनात्मक सुरक्षा की नींव को प्रभावित करता है।
सरकार को सुझाव
- सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कई चीजों के लिए आग्रह किया।
- कानूनी प्रावधान: पितृत्व अवकाश को सामाजिक सुरक्षा लाभ के रूप में कानून में शामिल किया जाए।
- अवधि का निर्धारण: इस छुट्टी की अवधि ऐसी हो जो माता-पिता और बच्चे, दोनों की जरूरतों के प्रति संवेदनशील हो।
- मां को समर्थन: पिता को छुट्टी मिलने से वे माँ का साथ दे सकेंगे और घर की जिम्मेदारियों को साझा कर सकेंगे, जिससे मां पर से बोझ कम होगा।
वर्तमान स्थिति
वर्तमान में भारत में निजी क्षेत्र में पितृत्व अवकाश पूरी तरह से कंपनी की मर्जी पर निर्भर है। केंद्र सरकार के कर्मचारियों को केवल 15 दिन का पितृत्व अवकाश मिलता है। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी भविष्य में एक व्यापक राष्ट्रीय कानून का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।

