PC-PNDT Act: सुप्रीम कोर्ट ने प्री-कन्सेप्शन एंड प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्निक्स (PC-PNDT) एक्ट, 1994 की धारा 4(3)(i) में तय 35 साल की उम्र सीमा को चुनौती देने वाली 2019 की याचिका को निपटा दिया।
केंद्रीय पर्यवेक्षण बोर्ड दे अपना विचार: कोर्ट
शीर्ष कोर्ट ने कहा कि यह मुद्दा विशेषज्ञों के दायरे में आता है और पूरी पिटीशन को केंद्रीय पर्यवेक्षण बोर्ड (Central Supervisory Board) के पास “प्रतिनिधित्व” की तरह विचार के लिए भेज दिया जाए। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने आदेश में कहा, “याचिका में उठाए गए मुद्दे विशेषज्ञ निकाय द्वारा बेहतर तरीके से निपटाए जा सकते हैं…उम्र-आधारित भेदभाव साबित नहीं हुआ, लेकिन मुद्दे महत्वपूर्ण हैं। इसलिए पूरी पिटीशन को व्यापक प्रतिनिधित्व की तरह बोर्ड को भेजा जाता है।”कोर्ट ने यह भी जोड़ा, “अगर मौजूदा कानून में बदलाव की जरूरत लगती है, तो सक्षम प्राधिकरण इसे सार्वजनिक हित में विचार करे।”
यह था मामला?
PC-PNDT कानून भ्रूण के लिंग परीक्षण पर रोक लगाता है, ताकि लिंग-चयन व महिला भ्रूण हत्या रोकी जा सके। 2019 में अधिवक्ता मीरा कौर पटेल ने धारा 4(3) को चुनौती दी थी, जिसमें प्री-नेटल डायग्नॉस्टिक टेस्ट तभी संभव है जब कुछ शर्तें हों—महिला की उम्र 35 वर्ष से ज्यादा हो, दो बार गर्भपात/फीटल लॉस, टेराटोजेनिक एक्सपोज़र, फैमिली हिस्ट्री में जेनेटिक डिसऑर्डर, या बोर्ड द्वारा तय अन्य कारण।
याचिकाकर्ता की दलीलें
- 35 साल की उम्र सीमा मनमानी और असंवैधानिक, Article 14 और 21 का उल्लंघन।
- कम उम्र की महिलाओं को भी जेनेटिक असमान्यताओं का खतरा—अध्ययन का हवाला: 57.1% केस 30 साल से कम उम्र वाली महिलाओं में पाए गए।
- उम्र-आधारित भेदभाव से स्वास्थ्य और प्रजनन अधिकारों पर प्रभाव।
- “गर्भवती महिलाएं एक समरूप समूह हैं, उम्र में अंतर के आधार पर उन्हें अलग नहीं किया जा सकता।”
केंद्र की दलील: ‘35 साल से कम महिलाओं पर रोक नहीं’
ASG ऐश्वर्या भाटी ने बताया कि 35 साल से कम उम्र की महिलाएं भी टेस्ट करा सकती हैं अगर वे सेक्शन 4(3) या Form F की 23 मेडिकल इंडिकेशन में से किसी को पूरा करती हों। 35+ उम्र स्वयं में हाई-रिस्क इंडिकेटर है। प्रावधानों का उद्देश्य दुरुपयोग रोकना है, न कि पहुंच रोकना। बेंच ने पूछा कि क्या Form F में स्पष्टीकरण जोड़कर भ्रम दूर किया जा सकता है। इस पर ASG ने कहा—यह फॉर्म सिर्फ विशेषज्ञ चिकित्सक भरते हैं, इसलिए गलतफहमी की संभावना कम है।
कोर्ट का महत्वपूर्ण अवलोकन
जस्टिस बागची ने कहा, प्रजनन स्वायत्तता (reproductive autonomy) मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट के तहत है, PC-PNDT एक्ट के तहत नहीं। MTP में स्वायत्तता “ग्रेडेड” होती है—कई चरणों में सीमित या न्यायालय-निर्भर। दूसरी ओर, डायग्नोस्टिक सुविधाओं तक पहुंच नियमन के अधीन है, क्योंकि इसका सीधा संबंध लिंग परीक्षण जैसी अपराध गतिविधियों से जुड़ सकता है। असाधारण मामलों में महिलाएं उच्च न्यायालयों से राहत ले सकती हैं।
अंतिम फैसला
कोर्ट ने याचिका निपटाते हुए निर्देश दिया कि केंद्रीय पर्यवेक्षण बोर्ड पूरी पिटीशन को एक “कम्प्रीहेंसिव रिप्रेज़ेंटेशन” मानकर विशेषज्ञ स्तर पर विचार करे।

