Courtroom scene inside the Delhi High Court. AI IMAGE
Principle of double innocence: दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला देते हुए लूट के मामले में 2014 का बरी करने का आदेश बरकरार रखा है।
निचली अदालत ने 2014 में दिया था फैसला
दिल्ली हाईकोर्ट ने लूट के एक मामले में निचली अदालत द्वारा आरोपी को बरी किए जाने के 2014 के फैसले को बरकरार रखा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक निचली अदालत का फैसला पूरी तरह से गलत या तर्कहीन न हो, हाईकोर्ट उसमें दखल नहीं दे सकता।
मामला क्या था?
यह मामला 2014 का है, जिसमें एक व्यक्ति पर लूट का आरोप लगा था। सबूतों के अभाव में सेशंस कोर्ट ने उसे बरी कर दिया था। पुलिस ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसे अब हाईकोर्ट ने भी सही ठहराया है।
डबल प्रिजम्प्शन ऑफ इनोसेंस पर बहस
जस्टिस मनोज कुमार ओहरी ने अभियोजन पक्ष (पुलिस) की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें नवंबर 2014 के सेशंस कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान ‘डबल प्रिजम्प्शन ऑफ इनोसेंस’ (दोषी न होने की दोहरी धारणा) के सिद्धांत पर जोर दिया।
यह है ‘डबल इनोसेंस’ का सिद्धांत?
- अदालत ने समझाया कि ‘दोषी न होने की दोहरी धारणा’ दो स्तरों पर काम करती है।
- पहला स्तर: आपराधिक कानून का मूल सिद्धांत है कि जब तक किसी व्यक्ति का दोष साबित न हो जाए, उसे निर्दोष ही माना जाएगा।
- दूसरा स्तर: जब एक बार निचली अदालत आरोपी को बरी कर देती है, तो उसकी निर्दोषता की यह धारणा और भी मजबूत (Reinforced) हो जाती है।
कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां
- दखल की गुंजाइश कम: कोर्ट ने कहा, “यह स्थापित कानून है कि बरी किए जाने के खिलाफ अपील पर सुनवाई करते समय ऊपरी अदालत को तब तक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, जब तक कि निचली अदालत का निष्कर्ष पूरी तरह से अनुचित न पाया जाए।”
- पुलिस की थ्योरी में दम नहीं: हाईकोर्ट ने निचली अदालत के इस विचार से सहमति जताई कि दिल्ली पुलिस आरोपी के खिलाफ संदेह से परे दोष साबित करने में विफल रही है।
- तार्किक फैसला: जस्टिस ओहरी ने 17 दिसंबर के अपने आदेश में कहा कि ट्रायल कोर्ट का फैसला सबूतों पर आधारित और पूरी तरह से तार्किक है।







