Supreme Court
SC/ST quota: सुप्रीम कोर्ट ने राज्य बार काउंसिलों में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के वकीलों के लिए आरक्षण की मांग करने वाली जनहित याचिका (PIL) पर विचार करने से मना कर दिया।
बेंच ने याचिका को ‘समयपूर्व’ बताया
अदालत ने याचिकाकर्ताओं को फटकार लगाते हुए कहा कि जब चुनावी प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, तब ऐसी मांग लेकर आना सही नहीं है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की बेंच ने याचिकाकर्ताओं की दलीलों पर तीखी प्रतिक्रिया दी। बेंच ने याचिका को ‘समयपूर्व’ बताते हुए खारिज नहीं किया, बल्कि याचिकाकर्ताओं को उचित प्रक्रिया का पालन करने की सलाह दी
CJI की सख्त टिप्पणी- ‘सिर्फ महिलाओं को मिली राहत देखकर आ गए’
- देरी से आना: कोर्ट ने कहा कि बार काउंसिल 1961 से अस्तित्व में है, लेकिन आपने अब तक कुछ नहीं किया। अब जब चुनाव शुरू हो गए हैं, तो आप राहत मांग रहे हैं।
- महिलाओं से तुलना: जब याचिकाकर्ताओं ने महिलाओं के लिए हाल ही में अनिवार्य किए गए प्रतिनिधित्व का हवाला दिया, तो CJI ने कहा, “महिलाएं पिछले दो साल से संघर्ष कर रही थीं, तब जाकर उन्हें सफलता मिली। आप बस इसलिए आ गए क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के लिए कुछ किया है। आप चाहते हैं कि सब कुछ प्लेट में सजाकर मिल जाए।”
- आरक्षण बनाम प्रतिनिधित्व: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि महिलाओं को ‘आरक्षण’ नहीं, बल्कि ‘प्रतिनिधित्व’ दिया गया है।
अगले चुनाव के लिए दिया रास्ता
- अथॉरिटी के पास जाएं: कोर्ट ने कहा कि पहले आप बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) और अन्य सक्षम अधिकारियों के पास अपना पक्ष रखें।
- अगली बार विचार: CJI ने कहा, “इस चुनाव के लिए बहुत देर हो चुकी है, लेकिन आप अगले चुनाव के लिए हमारे पास आ सकते हैं।”
- स्वतंत्रता: अदालत ने याचिकाकर्ताओं को छूट दी कि वे सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेशों का हवाला देते हुए अधिकारियों को ज्ञापन सौंपें। कोर्ट ने उम्मीद जताई कि सक्षम अधिकारी इस पर उचित विचार करेंगे।
यह था महिलाओं से जुड़ा पिछला आदेश
दिसंबर 2025 में, सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए राज्य बार काउंसिलों में महिला वकीलों के लिए 30 प्रतिशत प्रतिनिधित्व को अनिवार्य कर दिया था। अदालत ने यह भी कहा था कि यदि चुनाव के जरिए यह कोटा पूरा नहीं होता है, तो ‘को-ऑप्शन’ (मनोनयन) के जरिए कमी को पूरा किया जाए।







