Supreme Court View
Second Complaint: सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, मूल शिकायत में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल होने के बाद उसी कथित घटना से संबंधित बाद की शिकायत में केवल एक नया अपराध जोड़ देने से बाद की शिकायत स्वीकार्य नहीं हो जाती।
केरल हाईकोर्ट के आदेश को रद्द किया
शीर्ष अदालत ने टिप्पणी में कहा, क्लोजर रिपोर्ट के बाद, उसी शिकायतकर्ता द्वारा उसी घटना में कोई नया अपराध जोड़कर दोबारा केस दर्ज कराना कानूनन मान्य नहीं है। जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने यह फैसला सुनाते हुए केरल हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने दूसरी शिकायत को खारिज करने से इनकार कर दिया था। यह दूसरी शिकायत भी उसी घटना से जुड़ी थी, जिसमें पहले ही क्लोजर रिपोर्ट दाखिल हो चुकी थी।
यह था मामला
इस केस में अपीलकर्ताओं के खिलाफ पहले एफआईआर दर्ज हुई थी, लेकिन पुलिस जांच के बाद उन्हें चार्जशीट से हटा दिया गया और क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी गई। शिकायतकर्ता ने उस समय मजिस्ट्रेट के सामने कोई विरोध याचिका नहीं दी। ट्रायल बाकी आरोपियों के खिलाफ ही चला। ढाई साल बाद वही शिकायतकर्ता फिर से एक निजी शिकायत लेकर आया और इस बार आईपीसी की धारा 308 (गंभीर चोट पहुंचाने की कोशिश) जोड़ दी। मजिस्ट्रेट ने इस पर कार्रवाई शुरू कर दी, जिसे हाईकोर्ट ने भी सही ठहराया। इसके खिलाफ अपीलकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।
सुरेंद्र कौशिक बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2013) के फैसले का जिक्र
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर किसी घटना को लेकर अलग-अलग पक्षों की अलग-अलग बातें सामने आती हैं, तो दो एफआईआर दर्ज की जा सकती हैं। लेकिन जब एक ही व्यक्ति, एक ही घटना को लेकर दोबारा शिकायत करता है, तो वह स्वीकार्य नहीं है। कोर्ट ने सुरेंद्र कौशिक बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2013) के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि उस केस में दूसरी एफआईआर अलग शिकायतकर्ता द्वारा, अलग आरोपों के साथ दर्ज की गई थी। लेकिन मौजूदा केस में ऐसा कुछ नहीं है।







