Section 152: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि कानून बनाना संसद का “पूर्ण विशेषाधिकार” (Absolute Prerogative) है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 152 की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि संसद उस वचनबद्धता (Undertaking) से बाध्य नहीं है, जो केंद्र सरकार ने अदालत के सामने दी हो।
मामले की मुख्य बातें
- राजद्रोह (Sedition) का विवाद: याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि BNS की धारा 152 असल में पूर्ववर्ती IPC की धारा 124A (राजद्रोह) का ही दूसरा रूप है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में स्थगित कर दिया था।
- याचिकाकर्ता का तर्क: वकील ने दलील दी कि 2022 में केंद्र सरकार ने कोर्ट में वादा किया था कि वे राजद्रोह कानून की समीक्षा करेंगे, इसलिए वे इसे नए कानून (BNS) में वापस नहीं ला सकते।
- कोर्ट की टिप्पणी: पीठ ने दो टूक शब्दों में कहा, “भारत सरकार ने अदालत के सामने वचन दिया होगा, लेकिन संसद उससे बंधी नहीं है। कानून बनाना संसद का संप्रभु अधिकार है।”
ललिता कुमारी फैसले पर भी चर्चा
वकील ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 173 का हवाला देते हुए कहा कि यह पुलिस को प्रारंभिक जांच की अनुमति देती है, जो सुप्रीम कोर्ट के ‘ललिता कुमारी’ फैसले का उल्लंघन है (जिसके अनुसार संज्ञेय अपराध में FIR दर्ज करना अनिवार्य है)।
कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा:
“कभी-कभी फैसले आइवरी टावर (जमीनी हकीकत से दूर) में बैठकर दिए जाते हैं। ललिता कुमारी फैसले का बहुत दुरुपयोग हुआ है।”
अदालत ने यह भी याद दिलाया कि ललिता कुमारी फैसले में ही यह भी कहा गया है कि संज्ञेय अपराध का पता लगाने के लिए प्रारंभिक जांच की जा सकती है।
अगला कदम
अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई होली की छुट्टियों के बाद तय की है। पिछले साल भी सुप्रीम कोर्ट ने BNS की धारा 152 की वैधता पर केंद्र को नोटिस जारी किया था।

