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Summoning Advocates: वकीलों को मनमाने तरीके से समन…याचिका न सुनना ‘अंतर्निहित शक्तियों का परित्याग’

Summoning Advocates: सुप्रीम कोर्ट ने जांच एजेंसियों द्वारा वकीलों को मनमाने ढंग से समन करने के खिलाफ दायर स्वत: संज्ञान लेतेम हुए मामले में शुक्रवार को अहम फैसला सुनाया।

वकील की याचिका न सुनना एक स्पष्ट परित्याग

सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी करते हुए गुजरात हाईकोर्ट की भूमिका पर भी नाराजगी जताई। कहा, संवैधानिक अदालत होकर भी और इस दौरान गुजरात हाईकोर्ट की भूमिका पर सख्त नाराजगी जताई। मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई, जस्टिस के. विनोद चंद्रन और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने कहा कि हाईकोर्ट, संवैधानिक न्यायालय होने के बावजूद, जब एक वकील की याचिका सुनने से इनकार करता है, तो यह उसके अंतर्निहित अधिकारों का “स्पष्ट परित्याग” (abdication of inherent powers) है।

वकील को समन भेजने से जुड़ा मामला

मामला गुजरात पुलिस द्वारा एक वकील को समन भेजने से जुड़ा था, जो एक आरोपी का प्रतिनिधित्व कर रहा था। वकील ने इसे चुनौती दी, लेकिन गुजरात हाईकोर्ट ने सुनवाई से इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में वकीलों के डिजिटल उपकरणों, दस्तावेजों और मुवक्किल से जुड़ी सूचनाओं की सुरक्षा और प्रस्तुतिकरण से जुड़ी दिशा-निर्देश भी जारी किए हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने इसे “कानून के मूल सिद्धांतों के विपरीत” करार दिया और कहा—

“हम हैरान हैं कि एक संवैधानिक अदालत होकर भी हाईकोर्ट ने बीएनएसएस की धारा 528 के तहत अपने अधिकारों का उपयोग करने से इनकार कर दिया। यह निर्णय त्रुटिपूर्ण और गैरकानूनी है।” किसी वकील को केवल इसलिए समन नहीं किया जा सकता कि वह अपने मुवक्किल की ओर से पैरवी कर रहा है। ऐसा समन केवल तभी वैध होगा, जब वह ‘भारतीय साक्ष्य अधिनियम’ (Bharatiya Sakshya Adhiniyam) की धारा 132 के अपवादों में आता हो।

जस्टिस के. विनोद चंद्रन ने अपने निर्णय में प्रसिद्ध पंक्ति का उल्लेख करते हुए लिखा —

“The first thing we do, let’s kill all the lawyers.” शेक्सपीयर के Henry VI के संवाद का संदर्भ में है कि वकीलों को समाप्त करना, असल में सत्ता के केंद्रीकरण और अधिनायकवाद की दिशा में पहला कदम है। वकील स्वतंत्रता और न्याय के प्रहरी हैं, और जांच एजेंसियों द्वारा उन्हें डराना या समन भेजना मूल अधिकारों और निष्पक्ष सुनवाई के सिद्धांतों का उल्लंघन है।

IN THE SUPREME COURT OF INDIA
ORIGINAL APPELLATE JURISDICTION
Suo Motu Writ Petition (Criminal) No.2 of 2025
IN RE: Summoning Advocates who give legal opinion or represent parties during investigation of cases and related issues. with
Writ Petition (Civil) No. 632 of 2025 and Special Leave Petition (Criminal) No. 9334 of 2025

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