Typographical Error: इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक व्यक्ति की पेट्रोल पंप डीलरशिप को केवल एक टाइपिंग मिस्टेक (Typographical Error) की वजह से रद्द किए जाने पर कड़ी नाराजगी जताई है।
हाईकोर्ट के जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की डिवीजन बेंच ने राघवेंद्र अवस्थी की याचिका पर सुनवाई करते हुए भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) को जोरदार फटकार लगाई है। कोर्ट ने भारत पेट्रोलियम (BPCL) के आदेश को “अन्यायपूर्ण” बताते हुए रद्द कर दिया और डीलरशिप बहाल करने का निर्देश दिया।
विवाद क्या था? (MDR vs ODR का फेर)
- मामला: राघवेंद्र अवस्थी को 2020 में हरदोई जिले में पेट्रोल पंप लगाने के लिए ‘लेटर ऑफ इंटेंट’ (LOI) जारी किया गया था।
- रद्दीकरण (Cancellation): जनवरी 2022 में BPCL ने अचानक यह आवंटन रद्द कर दिया। कारण यह दिया गया कि विज्ञापन में सड़क का नाम MDR (Major District Road) लिखा था, जबकि वह वास्तव में ODR (Other District Road) थी।
- निवेश: इस दौरान अवस्थी ने अपनी पूरी जमा-पूंजी और संसाधन इस पंप को शुरू करने में लगा दिए थे।
कोर्ट का कड़ा रुख: टेक्निकल आधार पर मनमानी नहीं
- हाई कोर्ट ने BPCL के तर्क को “कानून के विपरीत” पाया और निम्नलिखित टिप्पणियां कीं।
- लिपिकीय त्रुटि (Clerical Mistake): कोर्ट ने नोट किया कि यह केवल एक टाइपिंग की गलती थी। इससे पेट्रोल पंप के स्थान (Location) को लेकर कोई भ्रम पैदा नहीं हुआ था।
- अवसर की समानता: विज्ञापन में इस छोटी सी गलती से किसी अन्य आवेदक का हक नहीं मारा गया, और न ही इसमें कोई बड़ा जनहित प्रभावित हो रहा था।
- वैध अपेक्षा (Legitimate Expectation): जब कंपनी ने आश्वासन (LOI) दिया और व्यक्ति ने उस पर भरोसा करके लाखों का निवेश कर दिया, तो उस अधिकार को तकनीकी आधार पर मनमाने ढंग से खत्म नहीं किया जा सकता।
अनफेयर करार दिया गया आदेश
- अदालत ने 29 जनवरी, 2022 के रद्दीकरण आदेश को खारिज कर दिया।
- BPCL तुरंत राघवेंद्र अवस्थी का LOI बहाल करे।
- आवंटन की आगे की प्रक्रिया को बिना किसी देरी के पूरा किया जाए।
भविष्य के लिए नजीर
यह फैसला उन सभी सरकारी और अर्ध-सरकारी संस्थानों के लिए एक चेतावनी है जो छोटी-छोटी तकनीकी खामियों का बहाना बनाकर नागरिकों के अधिकारों का हनन करते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि “अक्षर की गलती” न्याय के आड़े नहीं आनी चाहिए।
निष्कर्ष: छोटे से अक्षर की बड़ी जीत
राघवेंद्र अवस्थी के लिए यह ‘M’ और ‘O’ के बीच की लड़ाई थी, जिसमें जीत ‘न्याय’ की हुई। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यह सुनिश्चित किया कि किसी व्यक्ति की मेहनत और निवेश केवल एक ‘टाइपो’ की भेंट न चढ़ जाए।

