कानूनी विवाद की पृष्ठभूमि और अब तक का घटनाक्रम
- मई 2025 का लैंडमार्क फैसला:जस्टिस अभय एस. ओक की अध्यक्षता वाली पीठ ने 16 मई 2025 को कर्नाटक उच्च न्यायालय के 2011 के उस फैसले को पलट दिया था जिसने इस्कॉन मुंबई के पक्ष में निर्णय दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि Karnataka Societies Registration Act, 1960 के तहत पंजीकृत इस्कॉन बेंगलुरु एक अलग और स्वतंत्र कानूनी इकाई है, न कि मुंबई संस्था की केवल एक ‘शाखा’ (Branch)।
- नवंबर 2025 का स्प्लिट वर्डिक्ट (Split Verdict):मई 2025 के फैसले के खिलाफ इस्कॉन मुंबई द्वारा दायर समीक्षा याचिकाओं पर नवंबर 2025 में दो जजों की पीठ (जस्टिस जे. के. माहेश्वरी और जस्टिस ए. जी. मसीह) ने विभाजित फैसला सुनाया:
- जस्टिस जे. के. माहेश्वरी: उन्होंने पुनर्विचार याचिका स्वीकार करते हुए खुले कोर्ट में पुनर्विचार की अनुमति दी थी।
- जस्टिस ए. जी. मसीह: उन्होंने याचिका खारिज करते हुए कहा था कि मई 2025 का फैसला पूरी तरह सही था और रिव्यू को अपील की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
- जस्टिस मनोज मिश्रा का हटना (Recusal):स्प्लिट वर्डिक्ट के बाद मामला मुख्य न्यायाधीश के समक्ष भेजा गया था। जिसके बाद इसे जस्टिस मनोज मिश्रा वाली पीठ के सामने सूचीबद्ध किया गया था। अब जस्टिस मिश्रा के हटने के बाद, मुख्य न्यायाधीश (CJI) इस मामले की सुनवाई के लिए एक नई पीठ (संभवतः 3-न्यायाधीशों की बड़ी पीठ) का गठन करेंगे।
नई दिल्ली: इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शियसनेस (ISKCON) के दो प्रमुख धड़ों—इस्कॉन मुंबई और इस्कॉन बेंगलुरु—के बीच बेंगलुरु स्थित ऐतिहासिक ‘हरे कृष्णा मंदिर’ (Hare Krishna Temple Complex) के स्वामित्व, स्वायत्त विधिक अस्तित्व (Independent Legal Entity), तथा सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम के तहत शाखा बनाम स्वतंत्र संस्था के दो दशक पुराने कानूनी विवाद में एक नया प्रक्रियागत मोड़ आ गया है।
यह विवाद सर्वोच्च न्यायालय के 16 मई 2025 के उस ऐतिहासिक निर्णय से उपजा है, जिसमें कर्नाटक उच्च न्यायालय के 2011 के फैसले को पलटते हुए इस्कॉन बेंगलुरु को एक स्वतंत्र विधिक निकाय और हरे कृष्णा मंदिर का वास्तविक स्वामी घोषित किया गया था। इस्कॉन मुंबई द्वारा दायर पुनर्विचार याचिकाओं पर नवंबर 2025 में दो-जजों की पीठ ने खंडित फैसला (Split Verdict) सुनाया था, जिसके बाद मामला नई पीठ के गठन के लिए मुख्य न्यायाधीश को भेजा गया था। अब जस्टिस मनोज मिश्रा के हटने से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को इस मामले के निस्तारण हेतु पुनः नई पीठ का गठन करना होगा। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा ने इस मामले में दाखिल पुनर्विचार याचिकाओं (Review Petitions) की सुनवाई से बिना कारण बताए स्वयं को अलग (Recusal) कर लिया है।
न्यायिक प्रक्रिया एवं घटनाक्रम: जस्टिस मनोज मिश्रा का हटना (Recusal)
- न्यायिक मर्यादा और निष्पक्षता:
- यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायिक परंपरा के तहत स्वयं को अलग करने का विशिष्ट कारण सार्वजनिक रूप से प्रकट नहीं करते, परंतु यह आमतौर पर किसी पूर्व जुड़ाव, व्यक्तिगत/व्यावसायिक संबंधों अथवा संभावित हितों के टकराव (Conflict of Interest) से बचने और न्याय प्रशासन की शुचिता बनाए रखने के लिए किया जाता है।
- प्रक्रियागत विलंब और नई पीठ की आवश्यकता:
- जस्टिस मिश्रा के हटने से इस पहले से ही लंबी कानूनी लड़ाई के अंतिम निस्तारण में और देरी होना तय है।
- अब भारत के मुख्य न्यायाधीश के प्रशासनिक निर्देशों के तहत एक नई पीठ का गठन किया जाएगा, जिसके समक्ष इन पुनर्विचार याचिकाओं को नए सिरे से सूचीबद्ध किया जाएगा।
कानूनी विवाद की पृष्ठभूमि: दो दशकों की लंबी अदालती जंग
| चरण / वर्ष | न्यायिक मंच | निर्णय / घटनाक्रम का स्वरूप |
| मूल दावा | सिविल कोर्ट / सोसाइटी विवाद | इस्कॉन मुंबई का दावा था कि बेंगलुरु सोसाइटी केवल उसकी अधीनस्थ शाखा (Branch Unit) है। वहीं, इस्कॉन बेंगलुरु का तर्क था कि वह ‘कर्नाटक सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1960’ के तहत विधिवत पंजीकृत एक पूर्णतः स्वतंत्र और स्वायत्त निकाय है। |
| वर्ष 2011 | कर्नाटक उच्च न्यायालय | हाईकोर्ट ने इस्कॉन मुंबई के पक्ष में फैसला सुनाते हुए माना था कि बेंगलुरु सोसाइटी केवल एक शाखा मात्र है और स्वतंत्र संपत्ति का दावा नहीं कर सकती। |
| 16 मई 2025 | सर्वोच्च न्यायालय (ऐतिहासिक निर्णय) | तत्कालीन न्यायमूर्ति अभय एस. ओका की अध्यक्षता वाली पीठ ने हाईकोर्ट का फैसला पलट दिया। कोर्ट ने दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर व्यवस्था दी कि इस्कॉन बेंगलुरु एक अलग विधिक व्यक्तित्व रखता है और बेंगलुरु का प्रसिद्ध हरे कृष्णा मंदिर परिसर उसी का है। |
| नवंबर 2025 | सुप्रीम कोर्ट (रिव्यू बेंच) | पुनर्विचार याचिकाओं पर दो-जजों की पीठ (जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस ए.जी. मसीह) ने खंडित फैसला (Split Verdict) दिया। |
| अक्टूबर 2026 | सुप्रीम कोर्ट (नई पीठ) | नई पीठ के सदस्य न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा ने सुनवाई से खुद को अलग कर लिया; मामला पुनः सीजेआई के समक्ष नई पीठ गठन हेतु प्रेषित। |
मई 2025 का ऐतिहासिक निर्णय: सुप्रीम कोर्ट के स्थापित सिद्धांत
16 मई 2025 को न्यायमूर्ति अभय एस. ओका की अगुवाई वाली पीठ द्वारा दिए गए सर्वसम्मत निर्णय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष:
- सांविधिक पंजीकरण ही निर्णायक: किसी विशिष्ट राज्य कानून (कर्नाटक सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम, 1960) के तहत औपचारिक पंजीकरण, स्वतंत्र उप-नियम (By-laws) और स्वायत्त वित्तीय प्रबंधन किसी संस्था को एक अलग विधिक पहचान (Distinct Legal Entity) प्रदान करते हैं।
- समान आध्यात्मिक परंपरा से ‘प्रिंसिपल-एजेंट’ संबंध नहीं बनता: अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल एक समान आध्यात्मिक परंपरा (Spiritual Lineage) साझा करने या समान नाम होने से कानूनन ‘प्रधान और एजेंट’ (Principal and Agent) का संबंध स्वतः उत्पन्न नहीं होता।
- भूमि और मंदिर निर्माण का स्वामित्व: अभिलेखों से सिद्ध हुआ कि बेंगलुरु सोसाइटी ने अपने प्रयासों और फंड से मंदिर की जमीन अर्जित की थी और निर्माण कराया था, अतः मुंबई सोसाइटी की ऐतिहासिक भूमिका उसे मालिकाना हक नहीं दे सकती।
नवंबर 2025 का खंडित फैसला (Split Verdict) और कानूनी गतिरोध
जब इस्कॉन मुंबई ने इस निर्णय के विरुद्ध ‘अभिलेख पर प्रकट त्रुटि’ (Error Apparent on the Face of the Record) का हवाला देकर पुनर्विचार याचिकाएं दायर कीं, तो पीठ में मतभेद उत्पन्न हो गया:
- न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी का दृष्टिकोण: उन्होंने पुनर्विचार याचिकाओं को स्वीकार करते हुए खुले न्यायालय (Open Court) में दोबारा सुनवाई का समर्थन किया। उनका मानना था कि दोनों समाजों के ऐतिहासिक संबंधों और कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं पर विस्तृत पुनर्विचार आवश्यक है।
- न्यायमूर्ति ए.जी. मसीह का दृष्टिकोण: उन्होंने याचिकाओं को सीधे खारिज कर दिया। उन्होंने व्यवस्था दी कि मूल निर्णय में कोई प्रकट त्रुटि नहीं है और पुनर्विचार याचिका अपील का रूप नहीं ले सकती—याचिकाकर्ता केवल वही पुराने तर्क दोबारा नहीं उठा सकते।
- परिणाम: जब दो न्यायाधीश समान रूप से विभाजित हो जाते हैं, तो सुप्रीम कोर्ट नियमों के अनुसार मामला मुख्य न्यायाधीश को भेजा जाता है ताकि बड़ी पीठ (Larger Bench) अथवा नई पीठ गठित की जा सके।
विधिक प्रभाव एवं आगामी प्रक्रिया
- सीजेआई द्वारा नई पीठ का गठन: मुख्य न्यायाधीश अब यह तय करेंगे कि मामले को दो जजों की नई पीठ को सौंपा जाए या गतिरोध को स्थायी रूप से समाप्त करने के लिए तीन जजों की वृहद पीठ (Larger Bench) को संदर्भित किया जाए।
- मंदिर परिसर पर वर्तमान स्थिति: जब तक पुनर्विचार याचिकाओं पर कोई अंतिम विपरीत आदेश पारित नहीं होता, तब तक मई 2025 के निर्णय के अनुसार बेंगलुरु के हरे कृष्णा मंदिर परिसर पर इस्कॉन बेंगलुरु का वैध स्वामित्व और प्रशासनिक नियंत्रण बदस्तूर जारी रहेगा।
- धार्मिक व धर्मार्थ ट्रस्टों के लिए नजीर: यह मामला भारत में धार्मिक, धर्मार्थ और सांस्कृतिक ट्रस्टों के बीच शाखा बनाम स्वतंत्र सोसाइटी के विवादों में दस्तावेजी साक्ष्यों की महत्ता को स्थापित करने वाला प्रमुख उदाहरण बना हुआ है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: इस्कॉन मुंबई बनाम इस्कॉन बेंगलुरु व अन्य [पुनरीक्षण याचिकाएं (सिविल) – सर्वोच्च न्यायालय]
- संबंधित मूल निर्णय: 16 मई 2025 (न्यायमूर्ति अभय एस. ओका की अध्यक्षता वाली पीठ)
- खंडित आदेश की तिथि: नवंबर 2025 (न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी एवं न्यायमूर्ति ए.जी. मसीह)
- ताजा आदेश: अक्टूबर 2026 (न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा द्वारा सुनवाई से स्वयं को अलग करना)
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- कर्नाटक सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम, 1960
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 137 (सर्वोच्च न्यायालय की निर्णयों के पुनर्विचार की शक्ति)
- सुप्रीम कोर्ट नियम, 2013 — आदेश XLVII (पुनरीक्षण प्रक्रिया एवं खंडित फैसलों का निस्तारण)
- वर्तमान स्थिति: न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा के हटने के बाद फाइल भारत के मुख्य न्यायाधीश को भेजी गई; नई पीठ के गठन के बाद ही पुनर्विचार याचिकाओं पर अगली सुनवाई होगी।
Judge Recusal-I:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| मुख्य पक्षकार | इस्कॉन मुंबई बनाम इस्कॉन बेंगलुरु |
| विवाद का केंद्र | बेंगलुरु स्थित हरे कृष्णा मंदिर परिसर का स्वामित्व और संस्थागत स्वतंत्रता |
| ताज़ा घटनाक्रम | जस्टिस मनोज मिश्रा का सुनवाई से हटना; मामला अब भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को नई पीठ के गठन के लिए भेजा जाएगा। |
| पिछला विभाजित फैसला | नवंबर 2025 में दो जजों की पीठ ने रिव्यू पिटीशन पर विभाजित फैसला (Split Verdict) दिया था। |

