विवाद की पृष्ठभूमि और हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणियाँ
- विवाद की वजह:एडवोकेट जनरल अमित कुमार ने एक मामले में टिप्पणी की थी कि राज्य में महिला वकीलों की सुरक्षा और संरक्षण करने में बार एसोसिएशन विफल रही है। इस बयान के विरोध में बार एसोसिएशनों ने 1 अक्टूबर 2026 से राज्य के सभी जिला न्यायालयों और हाईकोर्ट में न्यायिक कार्य का पूरी तरह बहिष्कार करने का आह्वान किया था।
- हड़ताल न्याय प्रशासन में बाधा और आपराधिक अवमानना:हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा:“शिलॉन्ग बार एसोसिएशन और हाईकोर्ट ऑफ मेघालय बार एसोसिएशन द्वारा काम से दूर रहने के दिए गए आह्वान ने न्याय प्रशासन को बाधित किया है। यह अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(c) के तहत आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) की श्रेणी में आता है।”
- बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) और स्टेट बार काउंसिल को नोटिस:अदालत ने बार काउंसिल ऑफ मेघालय के अध्यक्ष और बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को भी नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने मेघालय बार काउंसिल के चेयरमैन को अगली तारीख पर पेश होकर यह बताने का आदेश दिया है कि हड़ताल करने वाले वकीलों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई (Disciplinary Action) क्यों नहीं शुरू की गई।
- अन्य जिला बार एसोसिएशनों को चेतावनी:पीठ ने चेतावनी दी है कि यदि बागमारा जिले को छोड़कर अन्य जिलों के वकीलों ने काम शुरू नहीं किया, तो अदालत जिला बार एसोसिएशनों के अध्यक्षों और सचिवों के खिलाफ भी अवमानना नोटिस जारी करने पर मजबूर होगी।
शिलांग: अधिवक्ताओं द्वारा न्यायिक कार्य से विरत रहने (Abstention from Judicial Work) या हड़ताल पर जाने पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय किए गए सुस्थापित विधिक सिद्धांतों, ‘न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971’ की धारा 2(c) के तहत न्याय प्रशासन में बाधा डालने के विधिक परिणामों, तथा राज्य के महाधिवक्ता (Advocate General) को हटाने की मांग को लेकर बार एसोसिएशनों द्वारा आहूत अनिश्चितकालीन हड़ताल पर मेघालय हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है।
मुख्य न्यायाधीश रेवती मोहिते डेरे और न्यायमूर्ति एच.एस. थंगखिएव की खंडपीठ ने इस मामले में स्वतः संज्ञान जनहित याचिका (PIL) दर्ज करते हुए सभी अवमाननाकर्ताओं को 13 अक्टूबर 2026 को अदालत में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने का सख्त निर्देश दिया है। इसके साथ ही अदालत ने मेघालय स्टेट बार काउंसिल के चेयरमैन को भी तलब किया है कि वे बताएं कि कार्य बहिष्कार करने वाले वकीलों के खिलाफ क्या अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई है। उच्च न्यायालय ने स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेते हुए ‘शिलांग बार एसोसिएशन’ और ‘मेघालय हाईकोर्ट बार एसोसिएशन’ के सभी पदाधिकारियों एवं कार्यकारी सदस्यों के खिलाफ आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) का कारण बताओ नोटिस जारी किया है।
उच्च न्यायालय के प्रमुख न्यायिक निष्कर्ष एवं मौखिक टिप्पणियां
1. ‘हड़ताल या सांकेतिक हड़ताल का वकीलों को कोई अधिकार नहीं’
मुख्य न्यायाधीश रेवती मोहिते डेरे और न्यायमूर्ति एच.एस. थंगखिएव की खंडपीठ ने सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णयों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया: “कानून पूरी तरह से सुस्थापित (Settled Law) है कि अधिवक्ताओं को हड़ताल पर जाने, सांकेतिक हड़ताल करने या हड़ताल का आह्वान करने का कोई विधिक अधिकार नहीं है। बार निकायों द्वारा न्यायिक कार्य से विरत रहने का यह आह्वान सीधे तौर पर न्याय प्रशासन में बाधा (Obstruction of Administration of Justice) डालता है, जो न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(c) के तहत आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) का गठन करता है।”
2. सभी पदाधिकारियों को 13 अक्टूबर को व्यक्तिगत पेशी का आदेश:
- अदालत ने ‘शिलांग बार एसोसिएशन’ और ‘हाईकोर्ट ऑफ मेघालय बार एसोसिएशन’ के पदाधिकारियों और कार्यकारी सदस्यों को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए पूछा है कि उनके खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए।
- खंडपीठ ने निर्देश दिया:“सभी कथित अवमाननाकर्ता सुनवाई की अगली तारीख (13 अक्टूबर 2026) को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित रहेंगे। रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया जाता है कि वे इन नोटिसों की तत्काल तामील सुनिश्चित करें।”
3. जिला बार एसोसिएशनों को चेतावनी और बार काउंसिल को नोटिस:
- अदालत ने नोट किया कि बाघमारा (Baghmara) जिले को छोड़कर राज्य के सभी जिलों में वकीलों की हड़ताल के कारण अदालती कामकाज ठप पड़ा हुआ है।
- पीठ ने चेतावनी दी कि यदि अन्य जिलों में तुरंत न्यायिक कार्य बहाल नहीं किया गया, तो उच्च न्यायालय संबंधित जिला बार एसोसिएशनों के अध्यक्षों और सचिवों के खिलाफ भी अवमानना नोटिस जारी करने के लिए बाध्य होगा।
- इसके अलावा, अदालत ने ‘बार काउंसिल ऑफ मेघालय’ और ‘बार काउंसिल ऑफ इंडिया’ (BCI) को भी नोटिस जारी किया। कोर्ट ने कहा कि हड़ताल करने वाले वकीलों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करना स्टेट बार काउंसिल की वैधानिक जिम्मेदारी है।
- अदालत ने निर्देश दिया कि बार काउंसिल ऑफ मेघालय के चेयरमैन 13 अक्टूबर को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर बताएं कि कार्य बहिष्कार करने वाले वकीलों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई है।
विवाद की पृष्ठभूमि: महाधिवक्ता अमित कुमार का बयान और बार का विरोध
- विवाद की जड़:
- मेघालय के महाधिवक्ता (Advocate General) अमित कुमार ने अदालत में एक मामले की सुनवाई के दौरान टिप्पणी की थी कि बार एसोसिएशन राज्य में महिला वकीलों (Women Lawyers) की सुरक्षा करने में विफल रही हैं।
- बार एसोसिएशनों की आपत्ति और मांग:
- शिलांग बार एसोसिएशन और हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने महाधिवक्ता की इस टिप्पणी पर तीखी आपत्ति जताई और इसे बार की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने वाला बताया।
- बार निकायों ने राज्य सरकार से मांग की कि एजी अमित कुमार को उनके पद से तत्काल हटाया जाए।
- 1 अक्टूबर से अनिश्चितकालीन कार्य बहिष्कार:
- अपनी मांग के समर्थन में बार एसोसिएशनों ने एक प्रस्ताव पारित कर सभी अधिवक्ताओं को 1 अक्टूबर 2026 से तब तक न्यायिक कार्य से पूरी तरह विरत रहने (Abstain from judicial work) का आह्वान किया, जब तक कि राज्य सरकार महाधिवक्ता को हटाने की उनकी मांग स्वीकार नहीं कर लेती।
- इसके चलते वादियों और मुकदमों की सुनवाई पूरी तरह बाधित हो गई, जिसे देखते हुए हाईकोर्ट को स्वतः संज्ञान लेना पड़ा।
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक सिद्धांत (एक्स-कैप्टन हरीश उप्पल बनाम भारत संघ, 2003):
- सुप्रीम कोर्ट की 5-जज संविधान पीठ ने स्पष्ट व्यवस्था दी थी कि वकीलों को हड़ताल पर जाने या अदालती बहिष्कार का कोई मौलिक या विधिक अधिकार नहीं है।
- अदालत ने माना था कि हड़ताल करना वादियों के न्याय पाने के अधिकार (अनुच्छेद 21) पर कुठाराघात है और ऐसा करने वाले वकील पेशेवर कदाचार (Professional Misconduct) तथा अदालत की आपराधिक अवमानना के दोषी होंगे। दुर्लभतम मामलों में केवल सांकेतिक विरोध (जिसमें कार्य बहिष्कार न हो) की अनुमति हो सकती है।
- न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(c):
- आपराधिक अवमानना में कोई भी ऐसा कृत्य शामिल है जो न्याय प्रशासन के सुचारू संचालन में बाधा उत्पन्न करता है या उसमें हस्तक्षेप करता है। न्यायिक कार्य का सामूहिक बहिष्कार कर अदालतों को काम करने से रोकना सीधे तौर पर धारा 2(c) को आकर्षित करता है।
- अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 35:
- स्टेट बार काउंसिल का यह वैधानिक कर्तव्य है कि वह अदालती बहिष्कार करने वाले अधिवक्ताओं के खिलाफ अनुशासनात्मक जांच शुरू करे और उनका लाइसेंस निलंबित करने जैसी कार्रवाई करे।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: इन रे: मेघालय उच्च न्यायालय और अधीनस्थ न्यायालयों में अधिवक्ताओं द्वारा न्यायिक कार्य से बहिष्कार [स्वतः संज्ञान जनहित याचिका (PIL) – मेघालय उच्च न्यायालय]
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश रेवती मोहिते डेरे और न्यायमूर्ति एच.एस. थंगखिएव (खंडपीठ)
- आदेश की तिथि: 1 अक्टूबर 2026
- अगली सुनवाई एवं व्यक्तिगत पेशी की तिथि: 13 अक्टूबर 2026
- पक्षकार/नोटिस प्राप्तकर्ता:
- पदाधिकारी एवं कार्यकारिणी सदस्य, शिलांग बार एसोसिएशन
- पदाधिकारी एवं कार्यकारिणी सदस्य, हाई कोर्ट ऑफ मेघालय बार एसोसिएशन
- चेयरमैन, बार काउंसिल ऑफ मेघालय
- बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI)
- राज्य का प्रतिनिधित्व: अतिरिक्त महाधिवक्ता एन.डी. चुल्लई, वरिष्ठ सरकारी अधिवक्ता ए.एस. डे एवं सरकारी अधिवक्ता एस. लालू
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(c) (आपराधिक अवमानना) एवं धारा 14
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 215 (अभिलेख न्यायालय के रूप में अवमानना शक्ति) एवं अनुच्छेद 226
- अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 35 (व्यावसायिक कदाचार)
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीर:
- एक्स-कैप्टन हरीश उप्पल बनाम भारत संघ (2003) 2 SCC 45 — ‘वकीलों द्वारा हड़ताल या कार्य बहिष्कार पूरी तरह गैर-कानूनी और न्याय प्रशासन की आपराधिक अवमानना है।’
- वर्तमान स्थिति: बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों को आपराधिक अवमानना का कारण बताओ नोटिस; 13 अक्टूबर 2026 को सभी पदाधिकारियों और स्टेट बार काउंसिल चेयरमैन को व्यक्तिगत रूप से अदालत में हाजिर होने का सख्त आदेश।
Meghalaya Bar:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | मेघालय उच्च न्यायालय (मुख्य न्यायाधीश रेवती मोहिते डेरे व जस्टिस एच. एस. थंगख्यू) |
| प्रतिवादी/अवमाननाकर्ता | शिलॉन्ग बार एसोसिएशन और हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के पदाधिकारी |
| संबंधित कानून | अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(c) (Criminal Contempt) |
| विवाद का कारण | एडवोकेट जनरल अमित कुमार को पद से हटाने की मांग पर 1 अक्टूबर से अदालती कार्य का बहिष्कार |
| अगली सुनवाई | 13 अक्टूबर 2026 (सभी पदाधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश) |

