अदालत की मुख्य टिप्पणियाँ
- सोशल मीडिया पर विकृत वीडियो का बढ़ता चलन:पीठ ने अनधिकृत रिकॉर्डिंग के सोशल मीडिया पर दुरुपयोग पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा:“इन रिकॉर्डिंग्स को अकल्पनीय तरीकों से मैनिपुलेट किया जाता है और फिर सोशल मीडिया पर इनके विकृत (Distorted) रूप पोस्ट किए जाते हैं।”
- सरकारी कर्मचारी होने के नाते अधिक जिम्मेदारी:कोर्ट ने टिप्पणी की कि वाघ का कोई अपना केस उस समय कोर्ट में नहीं चल रहा था। एक सरकारी कर्मचारी होने के नाते नियमों का पालन करने की जिम्मेदारी उन पर आम जनता से अधिक थी।
- अदालत की मर्यादा का पालन अनिवार्य:पीठ ने स्पष्ट किया कि यद्यपि अदालती कार्यवाही आम जनता के लिए खुली (Open Proceedings) होती है, लेकिन कोर्ट रूम के भीतर अनुशासन और नियमों का अक्षरशः पालन करना अनिवार्य है। यह कृत्य लाइव-स्ट्रीमिंग और कोर्ट रिकॉर्डिंग से जुड़े हाईकोर्ट के नियमों का प्रत्यक्ष उल्लंघन है।
मुंबई: अदालती कार्यवाही की खुली प्रकृति (Open Court Proceedings) बनाम कोर्ट रूम की आंतरिक मर्यादा और अनुशासन, मोबाइल फोन कैमरों से न्यायिक कार्यवाही की छिपकर अनधिकृत रिकॉर्डिंग (Unauthorised Recording), और सोशल मीडिया पर अदालती वीडियोज को सनसनीखेज व विकृत रूप (Distorted/Manipulated Clips) में प्रसारित करने के बढ़ते प्रचलन पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है।
सरकारी कर्मचारी (दिलीप वाघ) के विरुद्ध दर्ज स्वतः संज्ञान अवमानना मामले
न्यायमूर्ति जी.एस. कुलकर्णी और न्यायमूर्ति नीला गोखले की खंडपीठ ने कोर्ट रूम के भीतर मोबाइल कैमरे से चोरी-छिपे वीडियो रिकॉर्डिंग कर रहे एक सरकारी कर्मचारी (दिलीप वाघ) के विरुद्ध दर्ज स्वतः संज्ञान अवमानना मामले (Suo Motu Contempt Case) की सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। खंडपीठ ने वाघ द्वारा मांगी गई बिना शर्त माफी को स्वीकार करते हुए औपचारिक अवमानना की कठोर सजा से तो राहत दे दी, परंतु संस्थागत अनुशासन बनाए रखने के लिए उस पर ₹10,000 का आर्थिक जुर्माना लगाया और रिकॉर्डिंग में प्रयुक्त मोबाइल फोन को स्थायी रूप से जब्त (Confiscate) कर नष्ट/निस्तारित करने का आदेश दिया। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि आम जनता को अदालत में उपस्थित होकर कार्यवाही देखने की पूरी स्वतंत्रता है, परंतु कोर्ट रूम के भीतर लागू नियमों, विनियमों और मर्यादा का अक्षरशः (in letter and spirit) पालन करना प्रत्येक नागरिक का अनिवार्य दायित्व है।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘ओपन कोर्ट का अर्थ कोर्ट रूम नियमों की अवहेलना का लाइसेंस नहीं’ न्यायमूर्ति जी.एस. कुलकर्णी और न्यायमूर्ति नीला गोखले की खंडपीठ ने खुली अदालत की अवधारणा और कोर्ट रूम अनुशासन के संबंध को स्पष्ट करते हुए कहा: “जनता के किसी भी सदस्य द्वारा न्यायालय में उपस्थित होने और अदालती कार्यवाही को देखने पर कोई आपत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि ये खुली कार्यवाहियां (Open proceedings) हैं। तथापि, न्यायालय कक्ष के भीतर होने पर अदालती कार्यवाही को नियंत्रित करने वाले नियमों और विनियमों का पालन करने के संबंध में जनता पर लागू प्रतिबंधों का अक्षरशः पालन (Need to be followed in letter and spirit) किया जाना अनिवार्य है।”
2. अनधिकृत रिकॉर्डिंग और सोशल मीडिया पर तोड़-मरोड़ कर पेश करने पर गंभीर चिंता: उच्च न्यायालय ने कोर्ट रूम रिकॉर्डिंग के सोशल मीडिया पर दुरुपयोग के खतरनाक चलन पर गहरी न्यायिक चिंता व्यक्त की:
- अदालत ने रेखांकित किया कि आम लोगों द्वारा बिना अनुमति के इस तरह छिपकर फुटेज रिकॉर्ड की जाती है।
- पीठ ने आदेश में दर्ज किया:“इन रिकॉर्डिंग्स को फिर अकल्पनीय तरीकों से तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया जाता है और इसके बाद इनके विकृत संस्करण (Distorted versions) सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिए जाते हैं।”
- अदालत ने दोहराया कि इस प्रकार की अनाधिकृत वीडियो रिकॉर्डिंग बॉम्बे हाईकोर्ट के ‘अदालती कार्यवाहियों की लाइव-स्ट्रीमिंग एवं रिकॉर्डिंग नियम’ का सीधा और खुला उल्लंघन है।
3. सरकारी कर्मचारी होने के नाते जिम्मेदारी अधिक गंभीर:
- अदालत ने इस बात पर विशेष ध्यान दिया कि दिलीप वाघ से संबंधित कोई भी मुकदमा उस दिन अदालत के समक्ष सूचीबद्ध नहीं था।
- इसके अलावा, वह एक सरकारी विभाग में कार्यरत कर्मचारी था।
- खंडपीठ ने टिप्पणी की:“वाघ न्यायालय कक्ष में ऐसे समय बैठे थे जब उनसे संबंधित कोई भी मामला अदालत द्वारा नहीं सुना जा रहा था। चूंकि वे एक सरकारी विभाग में कार्यरत हैं, इसलिए उन पर ऐसी गतिविधियों में लिप्त न होने की जिम्मेदारी कहीं अधिक गंभीर (More onerous) थी।हमें नहीं पता कि ऐसे कृत्यों में शामिल होने के पीछे उनका क्या मकसद या इरादा था, क्योंकि उनकी ओर से कोई वैध या स्वीकार्य कारण सामने नहीं रखा गया है।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: कोर्ट रूम में फ्लैशलाइट और आईटी जांच
- घटना का खुलासा:
- बॉम्बे हाईकोर्ट की खंडपीठ में सामान्य न्यायिक सुनवाई चल रही थी, तभी जजों की नजर अदालत कक्ष में बैठे दिलीप वाघ पर पड़ी, जिनके मोबाइल फोन का कैमरा फ्लैश चालू था और वे गुप्त रूप से पीठ की कार्यवाहियों की वीडियो रिकॉर्डिंग कर रहे थे।
- मोबाइल की जब्ती और आईटी विभाग की कार्रवाई:
- अदालत के कर्मचारियों ने तुरंत हस्तक्षेप करते हुए उपकरण (Mobile Handset) को अपने कब्जे में ले लिया।
- पकड़े जाने पर आरोपी ने फोन से वीडियो डिलीट करने की कोशिश की थी, परंतु हाईकोर्ट के आईटी विभाग (IT Department) ने त्वरित फॉरेंसिक जांच कर हाल ही में हटाई गई वीडियो फाइलों (Recently Deleted Video Files) को सफलतापूर्वक रिकवर कर लिया।
- स्वतः संज्ञान और पश्चाताप:
- पीठ ने न्यायिक गरिमा की रक्षा हेतु स्वतः संज्ञान अवमानना कार्यवाही दर्ज की।
- आरोपी द्वारा बिना शर्त लिखित माफी मांगने और भविष्य में ऐसा न करने का वचन देने पर पीठ ने जेल भेजने जैसी दंडात्मक अवमानना सजा के बजाय अनुशासनात्मक जुर्माना लगाने का निर्णय लिया।
उच्च न्यायालय द्वारा जारी दंडात्मक निर्देश
- ₹10,000 का आर्थिक जुर्माना:
- दिलीप वाघ को दो सप्ताह के भीतर ₹10,000 की राशि हाईकोर्ट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (HCLSA) के खाते में जमा करने का आदेश दिया गया है।
- मोबाइल फोन की स्थायी जब्ती और निस्तारण:
- जब्त किए गए मोबाइल हैंडसेट को स्थायी रूप से जब्त (Permanent Confiscation) करने का आदेश दिया गया।
- अदालत ने निर्देश दिया कि फोन से आरोपी का निजी व्यक्तिगत डेटा (Personal Data) सावधानीपूर्वक हटाने के उपरांत उस हैंडसेट का अंतिम निस्तारण (Disposal) कर दिया जाए; उपकरण वापस नहीं किया जाएगा।
- चेतावनी: अदालत ने भविष्य के लिए आगाह किया कि अदालती मर्यादा और रिकॉर्डिंग नियमों का उल्लंघन किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
विधिक एवं सांविधिक विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- अदालती कार्यवाही की लाइव-स्ट्रीमिंग एवं रिकॉर्डिंग नियम (Rules on Live-Streaming and Recording of Court Proceedings):
- सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्वप्निल त्रिपाठी बनाम सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया (2018) में दिए गए ऐतिहासिक फैसले के बाद देश भर के उच्च न्यायालयों ने लाइव-स्ट्रीमिंग नियम बनाए हैं।
- इन नियमों के तहत केवल अदालत के अधिकृत कैमरों द्वारा ही आधिकारिक स्ट्रीमिंग की जा सकती है।
- किसी भी वकील, मुवक्किल, मीडियाकर्मी या आम दर्शक द्वारा निजी मोबाइल, कैमरे या वॉयस रिकॉर्डर से कार्यवाही की रिकॉर्डिंग करना सख्त रूप से प्रतिबंधित और दंडनीय है।
- आधिकारिक फीड को रिकॉर्ड करके बिना अनुमति सोशल मीडिया, यूट्यूब या रील्स (Reels) के रूप में शेयर करना, मीम्स बनाना या एडिट करना कानूनी अपराध है।
- न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971):
- धारा 2(c) (आपराधिक अवमानना): कोर्ट रूम के भीतर न्यायाधीशों की अनुमति के बिना रिकॉर्डिंग करना और न्याय प्रशासन के सुचारू संचालन में व्यवधान डालना आपराधिक अवमानना का गठन करता है।
- संविधान का अनुच्छेद 215: उच्च न्यायालय को अपनी अवमानना के लिए दंडित करने की व्यापक अंतर्निहित संवैधानिक शक्तियां प्राप्त हैं।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: हाईकोर्ट ऑन इट्स ओन मोशन (स्वतः संज्ञान) बनाम दिलीप वाघ [आपराधिक अवमानना याचिका – बॉम्बे उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति जी.एस. कुलकर्णी और न्यायमूर्ति नीला गोखले (खंडपीठ)
- आदेश की तिथि: 6 अक्टूबर 2026
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- राज्य सरकार की ओर से: अतिरिक्त सरकारी वकील (AGP) बी.वी. सामंत एवं ए.आर. देवलेकर
- अवमाननाकर्ता (Contemnor): दिलीप वाघ (व्यक्तिगत रूप से उपस्थित)
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक नियम:
- बॉम्बे उच्च न्यायालय लाइव-स्ट्रीमिंग एवं अदालती कार्यवाही रिकॉर्डिंग नियम
- न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(c) एवं धारा 12
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 215 (अभिलेख न्यायालय एवं अवमानना शक्तियां)
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- स्वप्निल त्रिपाठी बनाम भारत का सर्वोच्च न्यायालय (2018, 3-जज पीठ) — ‘पारदर्शिता के लिए लाइव-स्ट्रीमिंग आवश्यक है, परंतु कोर्ट रूम रिकॉर्डिंग का पूर्ण नियंत्रण केवल न्यायपालिका के हाथ में रहेगा; अनधिकृत रिकॉर्डिंग और उसका व्यावसायिक या दुर्भावनापूर्ण उपयोग पूर्णतः वर्जित है।’
- अंतिम परिणाम: बिना शर्त माफी स्वीकार; औपचारिक अवमानना से राहत; ₹10,000 का जुर्माना और मोबाइल फोन स्थायी रूप से जब्त करने का सख्त आदेश।
Mobile Recording: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | बॉम्बे उच्च न्यायालय (न्यायमूर्ति जी. एस. कुलकर्णी एवं न्यायमूर्ति नीला गोखले) |
| अवमाननाकर्ता (Contemnor) | दिलीप वाघ (Dilip Wagh – सरकारी कर्मचारी) |
| मामला प्रकार | स्वतः संज्ञान अवमानना याचिका (Suo Motu Contempt Case) |
| मुख्य कार्रवाई | ₹10,000 का जुर्माना, फोन की स्थायी जब्ती और माफ़ी स्वीकार। |

