अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी की मुख्य टिप्पणियां
अटॉर्नी जनरल ने अपने सहमति पत्र (Consent Letter) में दोनों आरोपियों के बयानों को न्यायपालिका की गरिमा गिराने वाला माना:
- निखिल वागले पर: “निखिल वागले द्वारा किया गया ट्वीट न केवल अभद्र और गाली-गलौज से भरा है, बल्कि इसका स्तर बेहद निम्न है। कोई भी जिम्मेदार व्यक्ति सार्वजनिक मंचों पर ऐसा बयान नहीं दे सकता।”
- संजय राउत पर: “एक माननीय सांसद को इतने गंभीर और अपमानजनक आरोप लगाने से पहले तथ्यों की पुष्टि और सत्यापन (Verification) कर लेना चाहिए था। उनके बयान पूरी तरह से असत्य और तथ्यों से परे हैं।”
निखिल वागले की माफी और SCBA की मांगें
- निखिल वागले की बिना शर्त माफी:मामला तूल पकड़ते ही निखिल वागले ने अपने X अकाउंट से आपत्तिजनक पोस्ट डिलीट कर दी। 15 अक्टूबर को उन्होंने अटॉर्नी जनरल को एक पत्र साझा किया, जिसमें उन्होंने CJI और सुप्रीम कोर्ट से बिना शर्त माफी मांगते हुए अवमानना की कार्रवाई आगे न बढ़ाने का अनुरोध किया।
- SCBA की राहत मांगें:SCBA ने कहा कि वह न्यायपालिका की निष्पक्ष और संतुलित आलोचना के खिलाफ नहीं है, लेकिन गाली-गलौज और असत्य बयानबाजी ‘उचित आलोचना’ के दायरे से बाहर है। SCBA ने सुप्रीम कोर्ट से X Corp, Meta, Google और IANS को संबंधित डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित रखने और मुकदमे के लंबित रहने तक आरोपियों को आगे ऐसे बयान देने से रोकने की मांग की है।
नई दिल्ली: न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971) की धारा 15(1)(b) के तहत भारत के अटॉर्नी जनरल (AG) की पूर्व वैधानिक सहमति, धारा 2(c) के तहत ‘आपराधिक अवमानना’ (Criminal Contempt) और अदालत को कलंकित करने (Scandalising the Court / Lowering the Authority of Judiciary) का दायरा, संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत न्यायपालिका की निष्पक्ष आलोचना (Fair Criticism) बनाम अपमानजनक व मिथ्या आक्षेपों की विधिक सीमा, तथा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर न्यायिक गरिमा के संरक्षण पर भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने एक अत्यंत त्वरित और निर्णायक कदम उठाया है।
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) द्वारा भारत के प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत के विरुद्ध की गई सार्वजनिक टिप्पणियों को लेकर वरिष्ठ पत्रकार निखिल वागले और शिवसेना (UBT) के राज्यसभा सांसद संजय राउत के खिलाफ आपराधिक अवमानना याचिका दायर किए जाने के कुछ ही घंटों के भीतर, अटॉर्नी जनरल ने 15 अक्टूबर 2026 को अपनी औपचारिक सहमति प्रदान कर दी। अटॉर्नी जनरल ने अपने सहमति पत्र में स्पष्ट किया कि दोनों प्रतिवादियों द्वारा की गई टिप्पणियां प्रथम दृष्टया न्यायिक संस्था को कलंकित करने और सर्वोच्च न्यायालय के प्राधिकार को कम करने वाली हैं।
अटॉर्नी जनरल के सहमति पत्र के मुख्य विधिक बिंदु एवं निष्कर्ष
1. ‘प्रथम दृष्टया अदालत और CJI की गरिमा को गिराने का प्रयास’
अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अवमानना कार्यवाही को हरी झंडी देते हुए अपने सहमति पत्र में दर्ज किया: “मेरे सुविचारित दृष्टिकोण में, पत्रकार श्री निखिल वागले और संसद सदस्य श्री संजय राउत द्वारा किए गए ट्वीट्स/टिप्पणियां प्रथम दृष्टया अपमानजनक (Prima-facie scandalous) हैं, जिनका उद्देश्य भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय और विशेष रूप से भारत के मुख्य न्यायाधीश के सम्मान और गरिमा को कम करना (Lower the esteem) है।”
2. निखिल वागले के बयान पर: ‘इतने निचले स्तर का बयान कोई विवेकशील व्यक्ति नहीं देगा’
- अटॉर्नी जनरल ने वागले की टिप्पणी को अत्यंत अमर्यादित करार देते हुए कहा: “श्री वागले द्वारा दिया गया बयान न केवल गाली-गलौज से भरा (Abusive) है, बल्कि निश्चित रूप से अत्यंत निचले स्तर का है। कोई भी विवेकशील व्यक्ति (Right-minded person) सार्वजनिक पटल पर ऐसा बयान कभी नहीं देगा।”
- वागले का रुख: अवमानना की सहमति और याचिका के बाद निखिल वागले ने गुरुवार को ‘X’ पर अपना पिछला पोस्ट डिलीट कर दिया और अटॉर्नी जनरल को पत्र लिखकर सीजेआई और सुप्रीम कोर्ट से बिना शर्त माफी (Unconditional Apology) मांगी तथा मामले को आगे न बढ़ाने का अनुरोध किया।
3. संजय राउत के बयान पर: ‘संसद सदस्य को तथ्य सत्यापित करने चाहिए थे’
- अटॉर्नी जनरल ने संजय राउत द्वारा न्यायाधीशों के राजनीतिक कार्यक्रमों में भाग लेने और मुख्यमंत्रियों द्वारा रात्रिभोज आयोजित करने के आरोपों पर कहा कि ये पूरी तरह आधारहीन हैं: “यह किसी भी तथ्य पर आधारित नहीं है। जहां तक बैडमिंटन वाली तस्वीरों का प्रश्न है, दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश पहले ही आ चुका था। यह अत्यंत आवश्यक था कि माननीय सांसद को ऐसे अपमानजनक आरोप लगाने से पहले तथ्यों का सत्यापन (Verify the facts) करना चाहिए था।”
विवाद की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं अवमानना याचिका के आधार
| पक्षकार / घटना | विवरण एवं संबंधित तथ्य |
| विवाद का मूल कारण | पिछले सप्ताह विपक्षी दलों के एक प्रतिनिधिमंडल ने सीजेआई सूर्यकांत से व्यक्तिगत रूप से मिलने का अनुरोध किया था। सीजेआई ने व्यक्तिगत मुलाकात से इनकार करते हुए कहा कि यदि कोई कानूनी शिकायत है, तो अदालत के समक्ष विधिसम्मत याचिका (Petition) दायर की जा सकती है। |
| निखिल वागले का कृत्य | ‘द हिंदू’ की इस खबर पर प्रतिक्रिया देते हुए पत्रकार निखिल वागले ने अपने आधिकारिक X हैंडल से सीजेआई के विरुद्ध सीधे गाली-गलौज और अत्यधिक अमर्यादित शब्दों (“**** you CJI!”) का प्रयोग किया। |
| संजय राउत का मीडिया बयान | 12 अक्टूबर 2026 को आईएएनएस (IANS) द्वारा प्रसारित बयान में सांसद संजय राउत ने कहा: “हमने भाजपा शासित राज्यों में न्यायाधीशों को राजनीतिक कार्यक्रमों में शामिल होते देखा है और मुख्यमंत्रियों को जजों के स्वागत में डिनर आयोजित करते देखा है…” उन्होंने लंदन में राजनेताओं के साथ जजों के बैडमिंटन खेलने की फर्जी तस्वीरों का भी अप्रत्यक्ष संदर्भ दिया। |
| दिल्ली HC का 19 जून का आदेश | SCBA की याचिका में रेखांकित किया गया कि दिल्ली हाईकोर्ट ने 19 जून के अपने आदेश में पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि लंदन का बताकर फैलाई जा रही तस्वीरें वास्तव में नवंबर 2025 में नई दिल्ली के त्यागराज स्टेडियम (Thyagaraj Stadium) में आयोजित एक खेल कार्यक्रम की थीं, और अदालत ने उन भ्रामक पोस्टों को हटाने का निर्देश दिया था। इसके बावजूद सांसद द्वारा वही झूठा दावा दोहराया गया। |
SCBA द्वारा मांगी गई राहतें एवं कानूनी तर्क
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) ने अपनी याचिका में निम्नलिखित मुख्य कानूनी बिंदु रखे हैं:
- उचित आलोचना बनाम दुर्भावनापूर्ण आक्षेप: बार एसोसिएशन न्यायपालिका की निष्पक्ष, संतुलित और संयमित आलोचना (Fair and temperate criticism) को रोकने का प्रयास नहीं कर रहा है। परंतु, प्रतिवादियों द्वारा जानबूझकर इस्तेमाल किए गए अपमानजनक शब्द निष्पक्ष आलोचना की सीमा को लांघकर अदालत के प्राधिकार को कलंकित करते हैं।
- डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने का निर्देश: SCBA ने शीर्ष अदालत से अनुरोध किया है कि वह X Corp, Meta, Google और IANS को निर्देश दे कि वे संबंधित पोस्ट, वीडियो, डिजिटल यूआरएल और अकाउंट लॉग्स को सुरक्षित (Preserve) रखें।
- अंतरिम निषेधाज्ञा (Injunction): याचिका के लंबित रहने के दौरान निखिल वागले और संजय राउत को सीजेआई या सुप्रीम कोर्ट के जजों के खिलाफ इसी प्रकार के दुर्भावनापूर्ण बयान देने से रोकने के लिए अंतरिम आदेश जारी किया जाए।
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: क्या कहता है अवमानना कानून?
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│ आपराधिक अवमानना (धारा 15 Contempt of Courts Act) │
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【धारा 15(1)(b): AG की सहमति की अनिवार्यता】 【धारा 2(c): आपराधिक अवमानना की परिभाषा】 【धारा 5: निष्पक्ष आलोचना का अपवाद】
• निजी व्यक्ति या बार निकाय द्वारा दायर • कोई भी प्रकाशन जो अदालत को कलंकित • न्यायिक निर्णयों के गुण-दोष पर
याचिका पर अटॉर्नी जनरल की लिखित सहमति करता है, उसके प्राधिकार को कम करता है सभ्य और संयमित टिप्पणी की छूट है,
कानूनी रूप से अनिवार्य (Condition Precedent)। या न्याय प्रशासन में बाधा डालता है। किंतु जजों पर व्यक्तिगत लांछन अवैध।
- अटॉर्नी जनरल की सहमति का विधिक महत्व (Gatekeeper Role of AG):
- प्रशांत भूषण (2020) और कुणाल कामरा (2020) अवमानना मामलों में यह स्थापित हुआ है कि अटॉर्नी जनरल की सहमति कानूनन एक छलनी (Filter) का काम करती है ताकि तुच्छ या राजनीतिक रूप से प्रेरित याचिकाओं से शीर्ष अदालत का समय नष्ट न हो।
- जब अटॉर्नी जनरल सहमति दे देते हैं, तो इसका विधिक अर्थ यह होता है कि प्रथम दृष्टया संज्ञेय अवमानना का गंभीर मामला बनता है और अब शीर्ष अदालत औपचारिक रूप से कारण बताओ नोटिस जारी कर ट्रायल चला सकती है।
- बिना शर्त माफी का प्रभाव (Impact of Unconditional Apology):
- न्यायालय अवमानना अधिनियम की धारा 12 के स्पष्टीकरण के अनुसार, माफी को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जाएगा कि वह सशर्त है, बशर्ते वह सद्भावनापूर्ण हो।
- हालांकि, आपराधिक अवमानना में यदि कृत्य अदालत की गरिमा को सीधे चोट पहुंचाता है, तो माफी से स्वतः बरी होना अधिकार नहीं है; यह पूरी तरह सुप्रीम कोर्ट के विवेकाधिकार पर निर्भर करेगा कि वह वागले की माफी स्वीकार करती है या अनुकरणीय कार्रवाई करती है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) बनाम निखिल वागले, संजय राउत व अन्य [आपराधिक अवमानना याचिका – सर्वोच्च न्यायालय]
- सहमति प्रदाता: आर. वेंकटरमणी (भारत के अटॉर्नी जनरल)
- सहमति की तिथि: 15 अक्टूबर 2026
- याचिकाकर्ता: सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA)
- प्रत्यर्थी (Respondents):
- निखिल वागले (वरिष्ठ पत्रकार)
- संजय राउत (सांसद, राज्यसभा – शिवसेना UBT)
- सोशल मीडिया व समाचार प्लेटफॉर्म (X Corp, Meta, Google, IANS – पक्षकार के रूप में)
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 — धारा 2(c) (आपराधिक अवमानना), धारा 5 (उचित टिप्पणी का बचाव), धारा 12 (दंड व माफी) एवं धारा 15(1)(b) (अटॉर्नी जनरल की सहमति)
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 129 (अभिलेख न्यायालय के रूप में अवमानना के लिए दंडित करने की शक्ति), अनुच्छेद 142 एवं अनुच्छेद 19(1)(a) सहपठित अनुच्छेद 19(2) (उचित निर्बंधन)
- संबद्ध न्यायिक नजीरें:
- सी. रविचंद्रन अय्यर बनाम न्यायमूर्ति ए.एम. भट्टाचार्य (1995, SC) — ‘न्यायिक संस्थाओं पर अनर्गल आरोपों से न्याय प्रशासन की साख को बचाना।’
- दिल्ली हाईकोर्ट आदेश (19 जून 2026) — ‘जजों की खेल गतिविधियों की फर्जी तस्वीरों के प्रसार पर रोक।’
- वर्तमान विधिक स्थिति: अटॉर्नी जनरल की सहमति प्राप्त होने के बाद SCBA की आपराधिक अवमानना याचिका अब औपचारिक रूप से सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक पीठ के समक्ष सुनवाई और कारण बताओ नोटिस जारी करने के लिए सूचीबद्ध की जाएगी।
मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| याचिकाकर्ता | सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) |
| प्रतिवादी (Respondents) | 1. निखिल वागले (वरिष्ठ पत्रकार) 2. संजय राउत (सांसद, राज्यसभा – शिवसेना UBT) |
| संबंधित धारा | अदालती अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 15(1)(b) |
| अनुमतिदाता | भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी |
| मुख्य आरोप | CJI और न्यायपालिका के खिलाफ अभद्र, असत्य और प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने वाले बयान देना। |
| ताजा स्थिति | अटॉर्नी जनरल की सहमति के बाद SCBA द्वारा सुप्रीम कोर्ट में आपराधिक अवमानना याचिका दर्ज। निखिल वागले ने बिना शर्त माफी मांगी। |

