अदालत की मुख्य व कड़वी टिप्पणियां
- “लोकतंत्र में वैचारिक विविधता आवश्यक”:न्यायामूर्ति सौगत भट्टाचार्य ने आदेश सुनाते हुए कहा:“विभिन्न राजनीतिक विचारों और विचारधाराओं का प्रसार लोकतंत्र में स्वागत योग्य है क्योंकि यही लोकतंत्र को फलदायी, गहरा और परिपक्व बनाता है। वर्तमान सत्ताधारी व्यवस्था से यह अपेक्षा की जाती है कि वह ऐसा माहौल बनाए जहां अलग-अलग विचारधाराओं से जुड़े लोग अपनी राय व्यक्त करने में संकोच न करें।”
- राज्य सरकार के दोहरे रवैये और पुलिस की मूकदर्शक भूमिका पर सवाल:अदालत ने राज्य सरकार द्वारा केवल CPI(M) के स्टॉल के लिए अनुमति की शर्त लगाने पर तीखा सवाल उठाया:“मुझे दिखाएं कि बनगांव में बिना PWD या BDO की अनुमति के अन्य कौन से स्टॉल लगाए जा रहे हैं? जब दूसरों को बिना रुकावट स्टॉल लगाने दिया जा रहा है, तो केवल याचिकाकर्ताओं को रोकने के लिए अलग-अलग कानूनी तर्क क्यों दिए जा रहे हैं? क्या राज्य का यह रवैया अराजकता पैदा नहीं करेगा कि दूसरे अपना स्टॉल चलाएंगे और याचिकाकर्ता को रोका जाएगा, जबकि पुलिस मूकदर्शक बनी रहेगी?”
विवाद की पृष्ठभूमि और अदालती निर्देश
- घटनाक्रम: CPI(M) कार्यकर्ता दुर्गा पूजा के दौरान वर्षों से अपने कार्यालय के पास अस्थायी बांस का ढांचा बनाकर पुस्तकों की प्रदर्शनी व बिक्री करते आए हैं। इस वर्ष हिंदू जागरण मंच के सदस्यों ने कथित तौर पर इस ढांचे का निर्माण रोक दिया और स्वयं वहां ढांचा खड़ा कर लिया।
- राज्य की दलील: राज्य सरकार ने तर्क दिया कि यह ज़मीन राजमार्ग (Highway) के अंतर्गत आती है और बिना PWD अनुमति के सार्वजनिक भूमि पर व्यावसायिक स्टॉल लगाना गैर-कानूनी है।
- हाईकोर्ट का अंतिम आदेश: हाईकोर्ट ने राज्य के रुख को खारिज करते हुए बनगांव पुलिस जिला अधीक्षक (SP) को निर्देश दिया कि वे पर्याप्त पुलिस बल तैनात करें ताकि CPI(M) सदस्य बिना किसी बाधा के पूजा के दिनों में पार्टी दफ्तर के 100 मीटर के दायरे में अपना बुक स्टॉल लगा सकें।
कोलकाता: भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता), अनुच्छेद 19(1)(b) (शांतिपूर्ण सभा का अधिकार), लोकतंत्र में राजनीतिक बहुलवाद (Political Pluralism & Ideological Diversity), सार्वजनिक उत्सवों (दुर्गा पूजा) के दौरान वैचारिक साहित्य के प्रचार-प्रसार पर प्रशासनिक या दक्षिणपंथी अवरोध, पश्चिम बंगाल राजमार्ग अधिनियम, 1964 (West Bengal Highways Act, 1964) की आड़ में चयनात्मक अनुमति देने की प्रवृत्ति, तथा राज्य द्वारा विरोधी विचारधाराओं के प्रति निष्पक्षता बरतने के संवैधानिक दायित्व पर कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है।
न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य की एकल पीठ ने गुरुवार (15 अक्टूबर 2026) को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) [CPI(M)] द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए पार्टी को बनगांव जेसोर रोड स्थित उसके स्थानीय कार्यालय के 100 मीटर के दायरे में दुर्गा पूजा के दिनों के दौरान बुक स्टॉल लगाने और संचालित करने की पूर्ण अनुमति प्रदान की। अदालत ने हिंदू जागरण मंच द्वारा लगाए गए अवरोधों और राज्य सरकार द्वारा अनुमति न देने के रुख पर गंभीर आपत्ति जताई तथा स्थानीय पुलिस को क्षेत्र में शांति एवं कानून-व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त बल तैनात करने का निर्देश दिया।
उच्च न्यायालय के प्रमुख न्यायिक निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां
1. ‘विभिन्न राजनीतिक विचारों का प्रसार ही लोकतंत्र को परिपक्व बनाता है’
न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य ने लोकतांत्रिक मूल्यों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को रेखांकित करते हुए दर्ज किया: “लोकतंत्र में विभिन्न राजनीतिक विचारों और विचारधाराओं का प्रसार (Dissemination of different political thoughts and ideologies) स्वागत योग्य है, क्योंकि यह लोकतंत्र को फलदायी, गहरी जड़ों वाला और परिपक्व बनाता है। वर्तमान सत्ताधारी व्यवस्था (Ruling dispensation) से यह अपेक्षा की जाती है कि वह ऐसा वातावरण बनाए जिसमें विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं के प्रति निष्ठा रखने वाले लोग अपने विचारों को व्यक्त करने में संकोच न करें।”
2. ‘दूसरों को अनुमति और याचिकाकर्ता को रोक—क्या यह अराजकता नहीं फैलाएगा?’
पीठ ने राज्य सरकार द्वारा लोक निर्माण विभाग (PWD) और राजमार्ग अधिनियम की अनुमति न होने का बहाना बनाकर CPI(M) के स्टॉल का विरोध करने पर कड़ी फटकार लगाई:
- जब अदालत को बताया गया कि उसी क्षेत्र में अन्य लोगों ने बिना किसी पूर्व मंजूरी के अपने स्टॉल खड़े किए हैं और हिंदू जागरण मंच ने वामपंथी स्टॉल को रोककर उसी स्थान पर अपना ढांचा बना लिया, तो न्यायाधीश ने पूछा:“यदि राज्य का यही रुख है, तो क्या इससे अराजकता (Anarchy) पैदा नहीं होगी? अन्य लोग अपने स्टॉल बना रहे हैं और चला रहे हैं, और जब याचिकाकर्ता अपना स्टॉल चलाएगा तो अन्य लोग उसे रोकेंगे और पुलिस केवल एक मूकदर्शक (Mute spectator) बनी रहेगी?”
- न्यायाधीश ने राज्य से पूछा: “मुझे दिखाएं कि बीडीओ या पीडब्ल्यूडी की अनुमति के बिना स्टॉल लगाने वाले अन्य लोग कौन हैं? जब दूसरों को अनुमति की आवश्यकता नहीं है, तो केवल याचिकाकर्ताओं (CPI-M) को ही अनुमति क्यों लेनी पड़ रही है?”
3. पुलिस की विफलता और रिपोर्ट का न आना:
- अदालत ने दर्ज किया कि 14 अक्टूबर 2026 को संबंधित थाने के प्रभारी निरीक्षक (IC) से क्षेत्र में लगाए गए अन्य स्टॉलों की स्थिति पर रिपोर्ट मांगी गई थी, जो पेश नहीं की गई।
- अदालत ने माना कि पुलिस की उदासीनता दर्शाती है कि राज्य जानबूझकर चयनात्मक रवैया अपनाकर याचिकाकर्ताओं को उनके वैधानिक अधिकार से वंचित करने का प्रयास कर रहा था।
विवाद की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं विधिक घटनाक्रम
| विवरण | घटनाक्रम एवं तथ्य |
|---|---|
| याचिकाकर्ता | मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPI-M) और उसकी स्थानीय शाखा। |
| स्थान | बनगांव जेसोर रोड (Bongaon Jessore Road), उत्तर 24 परगना, पश्चिम बंगाल। |
| परंपरा | याचिकाकर्ताओं द्वारा विगत कई वर्षों से दुर्गा पूजा उत्सव के दौरान अपने कार्यालय के पास वैचारिक और प्रगतिशील साहित्य का अस्थाई बांस का बुक स्टॉल लगाया जाता रहा है। |
| विवाद का कारण | धार्मिक संगठन ‘हिंदू जागरण मंच’ के सदस्यों ने कथित तौर पर CPI(M) को अपना बांस का अस्थायी ढांचा खड़ा करने से रोका और बाद में उसी स्थान पर अपना ढांचा स्थापित कर लिया। |
| मांगी गई विधिक राहत | CPI(M) ने हाईकोर्ट से पुलिस को निर्देश देने की मांग की कि वह स्टॉल लगाने के दौरान शांति बनाए रखे और दक्षिणपंथी समूहों के गैर-कानूनी अवरोधों से सुरक्षा प्रदान करे। |
| राज्य का कानूनी विरोध | राज्य के महाधिवक्ता ने तर्क दिया कि: 1. स्टॉल राष्ट्रीय/राज्य राजमार्ग की सार्वजनिक भूमि पर है, जिस हेतु पश्चिम बंगाल हाईवे एक्ट, 1964 के तहत PWD की अनुमति अनिवार्य थी। 2. एकल पीठ को इस मामले की सुनवाई का क्षेत्राधिकार नहीं है। 3. CPI(M) ने स्वयं एसडीओ (SDO) को अनुमति पत्र लिखा था, जिससे सिद्ध होता है कि अनुमति आवश्यक थी। |
| CPI(M) का प्रत्युत्तर | वरिष्ठ अधिवक्ता विकास रंजन भट्टाचार्य ने तर्क दिया कि राजमार्ग पर सैकड़ों अन्य पूजा स्टॉल बिना किसी बाधा के चल रहे हैं; राज्य केवल वामपंथी विचारधारा के साहित्य पर रोक लगाने के लिए पक्षपातपूर्ण बहाने बना रहा है। |
उच्च न्यायालय के प्रभावी निर्देश
- स्टॉल लगाने की पूर्ण अनुमति: CPI(M) के सदस्यों को पूजा के दिनों में पार्टी कार्यालय के 100 मीटर के दायरे में कहीं भी अपना बुक स्टॉल लगाने और शांतिपूर्वक संचालित करने की अनुमति दी जाती है।
- पुलिस सुरक्षा और शांति व्यवस्था: स्थानीय पुलिस प्राधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे स्थल पर पर्याप्त पुलिस बल तैनात करें ताकि असामाजिक तत्व या विरोधी संगठन स्टॉल के संचालन में कोई बाधा उत्पन्न न कर सकें।
- पुलिस अधीक्षक की जवाबदेही: बनगांव पुलिस जिले के पुलिस अधीक्षक (SP) को इस अदालती आदेश के प्रभावी अनुपालन पर एक विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया है।
- अगली सुनवाई: मामले की अगली नियमित सुनवाई 23 नवंबर 2026 को निर्धारित की गई है।
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- अनुच्छेद 19(1)(a) और साहित्यिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता:
- सर्वोच्च न्यायालय ने एस. रंगराजन (1989) और श्रेया सिंघल (2015) में स्पष्ट रूप से स्थापित किया है कि लोकतांत्रिक समाज में विचारों का स्वतंत्र आदान-प्रदान और पुस्तकों की बिक्री अभिव्यक्ति के अधिकार का मुख्य अंग है।
- किसी धार्मिक या राजनीतिक समूह की असहमति या धमकी के आधार पर राज्य किसी नागरिक या राजनीतिक दल के वैधानिक अधिकार को दबा नहीं सकता; कानून के शासन की रक्षा करना और असहिष्णु भीड़ पर नियंत्रण पाना पुलिस का दायित्व है।
- समानता का सिद्धांत (अनुच्छेद 14) और प्रशासनिक मनमानापन:
- जब त्योहारों के दौरान सार्वजनिक सड़कों के किनारे विभिन्न संस्थाओं द्वारा अस्थायी स्टॉल लगाए जाने की सामान्य प्रथा हो, तो किसी एक विशिष्ट राजनीतिक दल पर राजमार्ग नियमों या PWD की कठोर स्वीकृतियों का हवाला देकर रोक लगाना ‘चयनात्मक भेदभाव’ (Selective Discrimination) है।
- अदालत ने राज्य के इस रुख को सीधे तौर पर “अराजकता को बढ़ावा देने वाला” माना, जहां कानून का उपयोग नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के बजाय विरोधी आवाजों को दबाने के लिए किया जा रहा था।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPI-M) व अन्य बनाम पश्चिम बंगाल राज्य व अन्य [WPA / रिट याचिका – कलकत्ता उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य (एकल पीठ)
- आदेश की तिथि: 15 अक्टूबर 2026
- अगली सुनवाई की तिथि: 23 नवंबर 2026
- प्रमुख विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (CPI-M) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता विकास रंजन भट्टाचार्य
- पश्चिम बंगाल राज्य की ओर से: महाधिवक्ता (Advocate General) सुरोजित नाथ मित्रा
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 14 (समानता), अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता), अनुच्छेद 19(1)(b) (शांतिपूर्ण सभा) एवं अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार)
- पश्चिम बंगाल राजमार्ग अधिनियम, 1964 (West Bengal Highways Act, 1964)
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) — लोक शांति और व्यवस्था बनाए रखने हेतु पुलिस के दायित्व
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- वैचारिक बहुलवाद और राज्य की निष्पक्षता: ‘लोकतंत्र विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं के खुले प्रसार से ही परिपक्व होता है; राज्य का संवैधानिक कर्तव्य किसी असंतुष्ट समूह के अवरोध के आगे झुकना नहीं, बल्कि वैचारिक स्वतंत्रता का प्रयोग करने वालों को सुरक्षा प्रदान करना है।’
- अंतिम परिणाम: याचिका स्वीकार; CPI(M) को बनगांव जेसोर रोड स्थित कार्यालय के 100 मीटर के भीतर बुक स्टॉल लगाने की अनुमति; पुलिस को सुरक्षा सुनिश्चित करने और बनगांव SP को अनुपालन रिपोर्ट पेश करने का निर्देश।
West Bengal:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | कलकत्ता उच्च न्यायालय (Calcutta High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य |
| याचिकाकर्ता | मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPI-M) — वरिष्ठ अधिवक्ता विकास रंजन भट्टाचार्य |
| मुख्य विवाद | बनगांव में दुर्गा पूजा के दौरान CPI(M) के पारंपरिक बुक स्टॉल के निर्माण को रोकने/बाधित करने का मामला। |
| राज्य का पक्ष | एडवोकेट जनरल सुरोजित नाथ मित्रा — PWD और वेस्ट बंगाल हाइवे एक्ट के तहत पूर्व अनुमति न होने का तर्क। |
| कोर्ट का कड़ा आदेश | 1. CPI(M) को पार्टी कार्यालय के 100 मीटर के भीतर बुक स्टॉल लगाने की अनुमति। 2. पुलिस को क्षेत्र में शांति और सुरक्षा बनाए रखने के कड़े निर्देश। |
| अगली सुनवाई | 23 नवंबर 2026 |

