अदालत की मुख्य व कड़ी टिप्पणियां
- “अदालतों की उदारता ने वकीलों को दुस्साहसी बनाया”:पीठ ने वकीलों द्वारा अदालती आदेशों की अवहेलना के बढ़ते चलन पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा:“हाल के दिनों में हमने वकीलों के बीच इस अदालत के आदेशों की जानबूझकर अवहेलना करने, उन्हें ना मानने या गुमराह करने और इसके जरिए अदालत के अधिकार को कमजोर करने की बढ़ती प्रवृत्ति देखी है… वकीलों में यह धारणा बन गई है कि वे आदेशों को अनदेखा कर देंगे और पकड़े जाने पर बिन शर्त माफी मांगकर बच निकलेंगे। अदालतें अब तक बड़े दिल वाली रही हैं, लेकिन इस उदारता ने ऐसे वकीलों को दुस्साहसी बना दिया है।”
- “इस गिरावट को रोकना ही होगा”:न्यायाधीशों ने रेखांकित किया कि अदालती कार्यवाही का सम्मान न करने वाले बेईमान मुकदमों और वकीलों द्वारा अदालती गरिमा को रौंदे जाने की इस प्रवृत्ति पर तुरंत रोक लगाना बेहद जरूरी है।
- अदालत में पेश न होने का बहाना खारिज:जब हाईकोर्ट ने वकील लालसारे को बैंक के वरिष्ठ अधिकारी के साथ दोपहर के सत्र में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का आदेश दिया, तो उन्होंने खुद आने के बजाय एक नए जूनियर वकील और डिप्टी ब्रांच मैनेजर को भेज दिया तथा औरंगाबाद बेंच में मामला होने का बहाना बनाया। कोर्ट ने इस रवैये पर सख्त नाराजगी जताई।
मुंबई: अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (Advocates Act, 1961) की धारा 35 के तहत व्यावसायिक कदाचार (Professional Misconduct), न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971) की धारा 2(c) के तहत आपराधिक अवमानना, न्यायिक आदेशों व समन की जानबूझकर अवहेलना करने की बढ़ती प्रवृत्ति (Willful Disobedience of Court Orders), तथा अदालतों द्वारा दिखाई जाने वाली उदारता (Judicial Leniency) का अनुचित लाभ उठाकर बिना शर्त माफी (Unconditional Apology) को ढाल बनाने की परिपाटी पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने कड़ा प्रहार किया है।
न्यायमूर्ति ए.एस. गडकरी और न्यायमूर्ति कमल खाता की खंडपीठ ने ₹1.4 करोड़ की साइबर धोखाधड़ी से जुड़ी याचिका (धीरेन रॉय बनाम साइबर पुलिस व अन्य) की सुनवाई के दौरान कोटक महिंद्रा बैंक का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ता मंदार लालसरे के आचरण पर गंभीर आपत्ति जताई। अदालत ने अधिवक्ता के विरुद्ध अपने पूर्व आदेश में दर्ज की गई प्रतिकूल टिप्पणियों (Adverse Remarks) को रिकॉर्ड से हटाने से साफ इनकार कर दिया और बार काउंसिल ऑफ महाराष्ट्र एंड गोवा को निर्देश दिया कि वह संबंधित वकील के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई करे ताकि अदालत की अवमानना करने वाले वकीलों को कड़ा संदेश दिया जा सके।
उच्च न्यायालय के प्रमुख न्यायिक निष्कर्ष एवं तीखी टिप्पणियां
1. ‘अदालती उदारता ने वकीलों को लापरवाह और ढीठ बना दिया है’
खंडपीठ ने वकीलों द्वारा अदालती आदेशों को हल्के में लेने की परिपाटी पर चिंता व्यक्त करते हुए दर्ज किया: “हाल के दिनों में हमने वकीलों के बीच इस न्यायालय के आदेशों की जानबूझकर और हठधर्मिता से उपेक्षा करने, खुल्लम-खुल्ला अवज्ञा करने या अदालत को गुमराह करने और इसके माध्यम से अदालत के अधिकार को कमजोर करने की एक बढ़ती प्रवृत्ति देखी है। हमें ऐसा प्रतीत होता है कि वकीलों के मन में यह धारणा बन गई है कि वे अदालती आदेशों की जानबूझकर अवहेलना कर सकते हैं, कोई न कोई बहाना बनाकर बच सकते हैं और यदि पकड़े जाएं या अदालत के गुस्से का सामना करना पड़े, तो वे स्वयं या किसी वरिष्ठ वकील के माध्यम से बिना शर्त माफी मांगकर निकल सकते हैं। अदालतें अब तक बार-बार बड़ा दिल दिखाते हुए ऐसे कृत्यों को माफ करती रही हैं। वर्षों से चली आ रही इस न्यायिक उदारता (Leniency) ने ऐसे वकीलों के हौसले इतने बढ़ा दिए हैं कि वे अदालती आदेशों को पूरी तरह से आकस्मिक (Casually) मानने लगे हैं, जिससे अदालत की गरिमा और अधिकार पूरी तरह से तार-तार हो रहे हैं।”
2. ‘अदालत के अधिकार को कुचलने की इस गिरावट को रोकना अनिवार्य’:
न्यायाधीशों ने स्पष्ट किया कि न्यायिक प्रक्रिया का अनादर करने वालों को अब बख्शा नहीं जाएगा: “अदालतों के अधिकार को बेईमान वादियों और अदालती कार्यवाहियों के प्रति नाममात्र का सम्मान रखने वाले वकीलों द्वारा कुचले जाने से रोकने के लिए इस गिरावट को तुरंत थामना (Imperative to arrest this decline) अनिवार्य हो गया है।”
3. प्रतिकूल टिप्पणियां हटाने (Expunging Remarks) से दो टूक इनकार:
- 30 सितंबर को हुई सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता गिरीश कुलकर्णी ने पीठ से आग्रह किया कि अधिवक्ता मंदार लालसरे को माफ कर दिया जाए और आधिकारिक अदालती रिकॉर्ड से उनके खिलाफ की गई कड़ी आलोचनात्मक टिप्पणियों को हटा दिया जाए।
- खंडपीठ ने इस अनुरोध को सिरे से खारिज कर दिया और कहा कि ऐसे मामलों में रियायत देना अनुशासनहीनता को और बढ़ावा देना होगा।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं विवाद का घटनाक्रम
| तिथि / चरण | घटनाक्रम एवं तथ्य |
| मूल मामला | एक साइबर धोखाधड़ी पीड़ित धीरेन रॉय द्वारा दायर याचिका, जिसने ऑनलाइन साइबर ठगी में अपनी जीवन भर की गाढ़ी कमाई के ₹1.4 करोड़ गंवा दिए थे। ठगी की यह रकम निजी बैंक खातों के जरिए स्थानांतरित की गई थी। |
| 28 सितंबर की सुनवाई (सुबह का सत्र) | कोटक बैंक की ओर से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) के जरिए पेश हुए अधिवक्ता मंदार लालसरे से पीठ ने सवाल पूछे, जिस पर वे टालमटोल भरे जवाब देते नजर आए। |
| अदालत का व्यक्तिगत उपस्थिति का समन | पीठ ने नाराजगी जताते हुए अधिवक्ता लालसरे को दोपहर के सत्र में बैंक के एक वरिष्ठ अधिकारी के साथ व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होने का स्पष्ट निर्देश दिया। |
| 28 सितंबर (दोपहर का सत्र: आदेश की अवहेलना) | अधिवक्ता लालसरे स्वयं उपस्थित नहीं हुए। इसके बजाय उन्होंने एक नवनियुक्त जूनियर प्रॉक्सी वकील और बैंक के एक डिप्टी ब्रांच मैनेजर को भेज दिया। |
| वकील का बहाना | अधिवक्ता ने बहाना बनाया कि वे औरंगाबाद पीठ में किसी अन्य मामले में व्यस्त थे; हाईकोर्ट ने इस बहाने को पूरी तरह अस्वीकार्य और भ्रामक माना। |
| आपराधिक अवमानना का अधिकार सुरक्षित | पीठ ने अदालत के आदेश की सीधी अवहेलना पर गहरा असंतोष जताया और न्यायालय अवमानना अधिनियम की धारा 2(c) के तहत आपराधिक अवमानना शुरू करने का अधिकार सुरक्षित रखा। बाद में जूनियर वकील द्वारा बिना शर्त लिखित माफी मांगने पर उसे छोड़ दिया गया। |
| 30 सितंबर (अंतिम निर्देश) | वरिष्ठ वकील की माफी की अर्जी खारिज; बार काउंसिल ऑफ महाराष्ट्र एंड गोवा को अनुशासनात्मक जांच और कार्रवाई का आदेश। |
विधिक एवं विनियामक विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 35 (व्यावसायिक कदाचार):
- राज्य बार काउंसिल की अनुशासनात्मक समिति (Disciplinary Committee) के पास यह जांचने का वैधानिक अधिकार है कि क्या किसी अधिवक्ता ने न्यायालय के साथ छल किया है या अपने व्यावसायिक कर्तव्यों की जानबूझकर उपेक्षा की है।
- यदि कदाचार सिद्ध होता है, तो बार काउंसिल अधिवक्ता को फटकार लगा सकती है, एक निश्चित अवधि के लिए वकालत करने से निलंबित कर सकती है या उसका नाम अधिवक्ताओं के रोल से हटा सकती है।
- अदालती आदेश की अवज्ञा और आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt under Section 2(c)):
- जब कोई वकील अदालत द्वारा व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के विशिष्ट न्यायिक निर्देश के बावजूद जानबूझकर अनुपस्थित रहता है और प्रॉक्सी काउंसिल भेजकर झूठा बहाना बनाता है, तो यह कृत्य न्यायालय के प्राधिकार को कम आंकने (Scandalises or lowers the authority of the court) और न्याय प्रशासन में बाधा डालने की श्रेणी में आता है।
- बिना शर्त माफी की विधिक सीमाएं (Apology cannot be used as a weapon of defence):
- सर्वोच्च न्यायालय ने एम.वाई. शरीफ (1955) और टी.एन. गोदवर्मन (2006) के मामलों में दोहराया है कि बिना शर्त माफी कोई ऐसा ‘सुरक्षा कवच’ नहीं है जिसे गलती पकड़े जाने पर अदालत के चेहरे पर फेंक दिया जाए।
- माफी वास्तविक पश्चाताप पर आधारित होनी चाहिए, न कि केवल कानूनी परिणामों से बचने के लिए तैयार किया गया एक औपचारिक फॉर्मूला।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: धीरेन रॉय बनाम साइबर पुलिस स्टेशन व अन्य [आपराधिक रिट याचिका – बॉम्बे उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति ए.एस. गडकरी और न्यायमूर्ति कमल खाता (खंडपीठ)
- आदेश की तिथि: 30 सितंबर 2026 (निर्णय प्रति सार्वजनिक: अक्टूबर 2026)
- संबद्ध पक्षकार:
- याचिकाकर्ता: धीरेन रॉय (साइबर ठगी पीड़ित)
- प्रतिवादी बैंक: कोटक महिंद्रा बैंक (प्रतिनिधित्व: अधिवक्ता मंदार लालसरे)
- बार निकाय: बार काउंसिल ऑफ महाराष्ट्र एंड गोवा
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- अधिवक्ता अधिनियम, 1961 — धारा 35 (व्यावसायिक या अन्य कदाचार के लिए अधिवक्ताओं को दंड)
- न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 — धारा 2(c) (आपराधिक अवमानना) एवं धारा 12
- बार काउंसिल ऑफ इंडिया नियम — अध्याय II (न्यायालय के प्रति अधिवक्ता का कर्तव्य)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- न्यायिक उदारता बनाम व्यावसायिक अनुशासन: ‘अदालत की उदारता का अनुचित लाभ उठाकर बार-बार आदेशों का उल्लंघन करना और माफी मांगकर बच निकलने की परिपाटी स्वीकार्य नहीं है; न्यायालय के प्राधिकार की रक्षा हेतु ऐसे अधिवक्ताओं के विरुद्ध विनियामक कार्रवाई अनिवार्य है।’
- अंतिम निर्देश: बार काउंसिल ऑफ महाराष्ट्र एंड गोवा को अधिवक्ता मंदार लालसरे के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही करने का निर्देश; वकील के विरुद्ध पारित प्रतिकूल टिप्पणियों को रिकॉर्ड से हटाने की प्रार्थना पूरी तरह खारिज।
Willful Disobedience: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | बॉम्बे उच्च न्यायालय (Bombay High Court) |
| पीठ | न्यायमूर्ति ए.एस. गडकरी एवं न्यायमूर्ति कमल खाता |
| अनुशासनहीनता का आरोप | कोटक महिंद्रा बैंक की ओर से पेश वकील द्वारा आदेशों की अवहेलना, व्यक्तिगत पेशी से बचना और टालमटोल भरे जवाब देना। |
| शिकायतकर्ता का मामला | साइबर धोखाधड़ी में अपनी जीवन भर की गाढ़ी कमाई (₹1.4 करोड़) गंवाने वाले व्यक्ति की याचिका। |
| हाईकोर्ट का कड़ा आदेश | 1. बार काउंसिल को अनुशासनात्मक कार्रवाई का निर्देश। 2. प्रतिकूल टिप्पणियों को हटाने और माफी मांगने की याचिका खारिज। |
| संभावित कार्रवाई | अदालत ने अवमानना अधिनियम की धारा 2(c) के तहत आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) शुरू करने का अधिकार सुरक्षित रखा। |

