फीस बनाम टैक्स (Fee vs Tax) और मुख्य तर्क
- KHCAA की दलील: “बिना कैपिंग के फीस, टैक्स बन जाती है”
- वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर ने दिल्ली हाईकोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि ‘फीस’ (Fee) का उद्देश्य केवल न्याय प्रशासन की लागत वसूलना होता है। यदि मूल्य के प्रतिशत के रूप में बिना किसी ऊपरी सीमा (जैसे ₹5 लाख या ₹10 लाख की अधिकतम सीमा) के असीमित कोर्ट फीस मांगी जाती है, तो वह ‘फीस’ का चरित्र खोकर ‘टैक्स’ (Tax) बन जाता है।
- उन्होंने कहा कि अपराध पीड़ितों के मुआवजे या बड़े मुकदमों में बिना कैपिंग के फीस लेना आम नागरिकों के लिए न्याय के अधिकार (Access to Justice) को छीनने जैसा है।
- अदालत की टिप्पणियां और न्याय प्रशासन की लागत:
- CJI सूर्य कांत:अदालत ने माना कि न्याय प्रशासन के बढ़ते खर्चों को पूरा करने के लिए कोर्ट फीस में समय-समय पर संशोधन जरूरी है। CJI ने पूछा, “क्या आपने न्याय प्रशासन के कुल खर्च और कोर्ट फीस से होने वाली कुल वसूली के बीच के बड़े अंतर को देखा है?”
- जस्टिस जॉयमाल्या बागची:पीठ ने टिप्पणी की कि बड़े व्यावसायिक विवादों (Commercial Suits) में अदालत का काफी समय खर्च होता है, इसलिए ऐसे मुकदमों के लिए ली जाने वाली फीस न्यायिक समय के मूल्य के अनुरूप (Commensurate) होनी चाहिए।
- राज्य सरकार को कोर्ट फीस से छूट पर बहस:
- जब KHCAA ने धारा 73A के तहत केरल सरकार को कोर्ट फीस से पूरी तरह छूट दिए जाने पर सवाल उठाया, तो CJI ने हल्के-फुल्के अंदाज में टिप्पणी की कि राज्य सरकार द्वारा खुद को कोर्ट फीस देना “दाएं हाथ से बाएं हाथ को भुगतान करने जैसा होगा।”
मामले का इतिहास (Litigation History)
- 2025 का संशोधन: केरल सरकार ने Kerala Court Fees and Suits Valuation Act, 1959 में संशोधन कर कोर्ट फीस में भारी बढ़ोतरी की थी, जिससे कुछ मामलों में फीस में 400% से 9,900% तक का इजाफा हो गया।
- हाईकोर्ट का फैसला (अक्टूबर 2025): केरला हाईकोर्ट ने KHCAA की याचिका खारिज कर दी थी, जिसके बाद बार एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
नई दिल्ली: संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता), अनुच्छेद 21 व 39A के तहत न्याय तक पहुंच का मौलिक अधिकार (Right of Access to Justice), ‘शुल्क’ बनाम ‘कर’ (Fee vs. Tax – Quid Pro Quo Theory), केरल कोर्ट फीस और वाद मूल्यांकन अधिनियम, 1959 (Kerala Court Fees and Suits Valuation Act, 1959) के 2025 संशोधनों की वैधानिकता, यथामूल्य (Ad Valorem) कोर्ट फीस पर अधिकतम सीमा (Cap/Ceiling Limit) का अभाव, तथा राज्य सरकार को कोर्ट फीस से पूर्ण छूट देने वाली धारा 73A के प्रावधानों पर सुप्रीम कोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक परीक्षण शुरू किया है।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची की खंडपीठ ने शुक्रवार (16 अक्टूबर 2026) को केरल हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन (KHCAA) द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई करते हुए इस सीमित विधिक प्रश्न पर केरल सरकार को औपचारिक नोटिस जारी किया है कि: क्या बिना किसी ऊपरी सीमा (Capping) के मुकदमा मूल्य के प्रतिशत के रूप में लिया जाने वाला यथामूल्य कोर्ट फीस शुल्क का चरित्र खोकर ‘कर’ (Tax) बन जाता है?
पीठ ने मामले की अगली सुनवाई 2 नवंबर 2026 को तय की है।
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायिक निष्कर्ष एवं मौखिक टिप्पणियां
1. ‘सीमित पहलू पर नोटिस: क्या अनकैप्ड यथामूल्य फीस कर का रूप है?’
अदालत ने याचिकाकर्ता बार एसोसिएशन के इस विशिष्ट तर्क को विचारणीय माना कि यदि कोई शुल्क सेवा के अनुपात से परे अनियंत्रित प्रतिशत पर वसूला जाए तो वह कर बन जाता है। खंडपीठ ने आदेश दिया: “इस सीमित पहलू पर नोटिस जारी किया जाए कि क्या बिना किसी ऊपरी सीमा के यथामूल्य कोर्ट फीस अधिरोपित करना कराधान (Taxation) का रूप माना जाएगा, जिससे ऐसा अधिरोपण विधिक रूप से अस्वीकार्य हो जाता है।”
2. ‘न्याय प्रशासन का खर्च और कोर्ट फीस की वसूली: जमीन-आसमान का अंतर’:
सुनवाई के दौरान जब वकीलों ने 2025 में बढ़ाई गई कोर्ट फीस को अत्यधिक बताया, तो सीजेआई सूर्यकांत ने न्यायिक अधोसंरचना के बढ़ते वित्तीय बोझ को रेखांकित करते हुए कहा: *”न्याय प्रशासन के लिए बढ़ते खर्चों को पूरा करने हेतु समय-समय पर कोर्ट फीस का पुनरीक्षण आवश्यक है। हम सभी राज्यों को अपने कानूनों में उपयुक्त संशोधन करने का निर्देश देने के पक्ष में हैं। क्या आपने न्याय प्रशासन के कुल व्यय और कोर्ट फीस से होने वाली वास्तविक वसूली के बीच के भारी अंतर (Gap) को देखा है?”*
3. ‘वाणिज्यिक मुकदमों में अदालती समय की एक कीमत होनी चाहिए’:
न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची ने वाणिज्यिक वादों (Commercial Suits) में कोर्ट फीस की आवश्यकता को स्पष्ट करते हुए कहा: “व्यापार और मुनाफे के उद्देश्य से लड़े जाने वाले वाणिज्यिक विवादों के निपटारे में न्यायपालिका का काफी न्यायिक समय खर्च होता है। न्यायपालिका को ऐसे मामलों का समाधान करना पड़ता है, और इस न्यायिक समय की एक कीमत होनी चाहिए (It must come at a price)। कोर्ट फीस वाणिज्यिक मुकदमों के मूल्य और उसमें लगने वाले समय के अनुरूप होनी चाहिए।”
4. राज्य को छूट पर कोर्ट की चुटकी: ‘दाहिने हाथ से बाएं हाथ को भुगतान जैसी बात’:
जब याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर ने सवाल उठाया कि एक तरफ नागरिकों पर फीस बढ़ाई गई है और दूसरी तरफ राज्य सरकार ने धारा 73A जोड़कर खुद को पूरी तरह छूट दे दी है, तो सीजेआई ने मुस्कुराते हुए टिप्पणी की: “यदि राज्य सरकार अपने ही खजाने से कोर्ट फीस भरेगी, तो यह ठीक वैसा ही होगा जैसे दाहिना हाथ बाएं हाथ को भुगतान कर रहा हो।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं KHCAA के मुख्य आक्षेप
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│ केरल कोर्ट फीस विवाद: विधिक व संवैधानिक पृष्ठभूमि │
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【2025 संशोधन और फीस वृद्धि】 【यथामूल्य (Ad Valorem) पर कोई कैप नहीं】 【राज्य को छूट (धारा 73A)】
• 400% से 9,900% तक की भारी वृद्धि। • दावे की राशि का निश्चित % लिया जाता है; • राज्य और उसके विभागों को कोर्ट फीस
• अपराध पीड़ितों के मुआवजे के दावों पर चाहे दावा ₹100 करोड़ का हो, कोई ऊपरी देने से पूर्ण छूट; बार का आरोप- यह
भी अत्यधिक कोर्ट फीस की बाध्यता। सीमा नहीं। दिल्ली HC इसे रद्द कर चुका है। नागरिकों के साथ विधिक भेदभाव है।
| विवादित बिंदु | याचिकाकर्ता (KHCAA) के प्रमुख विधिक तर्क |
| यथामूल्य फीस पर कोई कैप न होना | केरल कोर्ट फीस अधिनियम में प्रतिशत के आधार पर फीस वसूली जाती है (जैसे दावे का 8% या 10%)। यदि कोई वाणिज्यिक या संपत्ति का दावा ₹50 करोड़ का है, तो कोर्ट फीस करोड़ों रुपये बन जाती है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि जहां कोई ऊपरी सीमा (Ceiling) नहीं होती, वहां शुल्क सेवा के बदले न होकर राजस्व जुटाने का जरिया बन जाता है। |
| दिल्ली उच्च न्यायालय की नजीर | वरिष्ठ अधिवक्ता परमेश्वर ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया जिसमें दिल्ली में कोर्ट फीस पर ऊपरी सीमा न होने और अत्यधिक दरों को ‘कराधान’ (Taxation in the garb of fee) मानकर रद्द कर दिया गया था। |
| अपराध पीड़ितों पर बोझ | याचिका में विशेष रूप से रेखांकित किया गया कि अपराध के पीड़ितों द्वारा अपनी क्षतिपूर्ति के लिए दायर दावों पर भी अनकैप्ड यथामूल्य फीस लगाई जा रही है, जो न्याय पाने के उनके अधिकार को पूरी तरह निष्फल करती है। |
| धारा 73A की वैधानिकता | अधिनियम की धारा 73A राज्य सरकार और उसके अधिकारियों को मुकदमों में कोर्ट फीस देने से पूर्ण छूट देती है, जबकि आम नागरिकों पर इसका अत्यधिक बोझ डाला गया है। |
| केरल हाईकोर्ट का फैसला (अक्टूबर 2025) | केरल उच्च न्यायालय ने अक्टूबर 2025 में KHCAA की याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि कोर्ट फीस तय करना विधायिका का नीतिगत निर्णय है। इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। |
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘शुल्क’ (Fee) बनाम ‘कर’ (Tax)
- प्रतिदान का सिद्धांत (Doctrine of Quid Pro Quo):
- संविधान पीठ के ऐतिहासिक निर्णयों (द कमिश्नर, हिंदू रिलीजियस एंडाउमेंट्स बनाम लक्ष्मीनारायण (शिरूर मठ केस, 1954) तथा जिंदल स्टेनलेस (2016)) के अनुसार:
- कर (Tax): सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए राज्य द्वारा वसूला जाने वाला अनिवार्य अंशदान है, जिसमें भुगतानकर्ता को किसी प्रत्यक्ष सेवा की कोई गारंटी नहीं होती।
- शुल्क (Fee): किसी विशिष्ट सेवा या प्रशासनिक कार्य के बदले लिया जाने वाला प्रभार है, जिसका सेवा की लागत (Cost of Service) के साथ तार्किक संबंध होना चाहिए।
- संविधान पीठ के ऐतिहासिक निर्णयों (द कमिश्नर, हिंदू रिलीजियस एंडाउमेंट्स बनाम लक्ष्मीनारायण (शिरूर मठ केस, 1954) तथा जिंदल स्टेनलेस (2016)) के अनुसार:
- अनकैप्ड कोर्ट फीस और कर का चरित्र:
- कोर्ट फीस न्याय प्रशासन के खर्च को साझा करने के लिए ली जाती है, न कि राज्य के सामान्य राजस्व (General Revenue) को बढ़ाने के लिए।
- यदि ₹10 लाख के मुकदमे और ₹100 करोड़ के मुकदमे में अदालत का समय और प्रक्रिया लगभग समान हो, किंतु ₹100 करोड़ वाले से बिना किसी अधिकतम सीमा के करोड़ों रुपये कोर्ट फीस वसूली जाए, तो अतिरिक्त वसूली ‘शुल्क’ न रहकर ‘कर’ बन जाती है। राज्य विधायिका के पास न्यायपालिका के माध्यम से अप्रत्यक्ष कर लगाने की विधायी शक्ति नहीं है।
- अनुच्छेद 39A (समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता):
- अत्यधिक और अनियंत्रित कोर्ट फीस आम नागरिकों, MSME और छोटे व्यापारियों को अदालतों का दरवाजा खटखटाने से रोकती है, जिससे संविधान के अनुच्छेद 21 और 39A के तहत प्रदत्त ‘न्याय तक पहुंच’ का मौलिक अधिकार बाधित होता है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: केरल हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन (KHCAA) बनाम केरल राज्य व अन्य [विशेष अनुमति याचिका (सिविल) – सर्वोच्च न्यायालय]
- पीठ: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची (खंडपीठ)
- आदेश की तिथि: 16 अक्टूबर 2026
- अगली सुनवाई की तिथि: 2 नवंबर 2026
- याचिकाकर्ता: केरल हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन (दायरकर्ता अधिवक्ता: ए. कार्तिक)
विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (KHCAA) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर (अधिवक्ता ए. कार्तिक के साथ)।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- केरल कोर्ट फीस और वाद मूल्यांकन अधिनियम, 1959 — 2025 संशोधन (यथामूल्य कोर्ट फीस दरें) एवं धारा 73A (राज्य सरकार को कोर्ट फीस से छूट)
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 14 (समानता), अनुच्छेद 21 (न्याय तक पहुंच), अनुच्छेद 39A (समान न्याय) एवं अनुच्छेद 136 (SLP क्षेत्राधिकार)
- संविधान की सातवीं अनुसूची — राज्य सूची प्रविष्टि 3 (न्याय प्रशासन और कोर्ट फीस)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- कोर्ट फीस का वैधानिक चरित्र: ‘कोर्ट फीस सेवा के बदले लिया जाने वाला शुल्क है; यदि इसे बिना किसी अधिकतम सीमा (Capping) के मुकदमा मूल्य के प्रतिशत के रूप में अनियंत्रित छोड़ दिया जाए, तो क्या यह अपनी प्रकृति बदलकर एक अवैध अप्रत्यक्ष कर बन जाता है, इसका संवैधानिक परीक्षण आवश्यक है।’
- वर्तमान न्यायिक स्थिति: सर्वोच्च न्यायालय ने केरल उच्च न्यायालय के 2025 के निर्णय के विरुद्ध अपील पर सुनवाई करते हुए केरल सरकार को सीमित विधिक बिंदु (Uncapped Ad Valorem Fee) पर नोटिस जारी किया है; 2 नवंबर 2026 को आगे विचार किया जाएगा।
Court Fee: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत एवं न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची |
| याचिकाकर्ता | केरला हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन (KHCAA) |
| मुख्य कानूनी मुद्दा | 1. क्या बिना किसी कैपिंग (Upper Cap) के मूल्य-आधारित कोर्ट फीस लेना असंवैधानिक टैक्स है? 2. केरल सरकार द्वारा 2025 में कोर्ट फीस में की गई 400% से 9,900% की भारी बढ़ोतरी को चुनौती। 3. राज्य सरकार को कोर्ट फीस से दी गई पूर्ण छूट (Section 73A) की संवैधानिकता। |
| कोर्ट का आदेश | सीमित मुद्दे पर नोटिस जारी; अगली सुनवाई 2 नवंबर 2026 को। |

