अदालत में हुई तीखी व रोचक बहस
- “हम और एएसजी दोनों मुख्य गेट पर बैठेंगे”:अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) विक्रमजीत बनर्जी को संबोधित करते हुए जस्टिस पारदीवाला ने कहा:“अगर आप अगली तारीख से पहले यह काम पूरा नहीं करते हैं, तो हम दोनों दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य गेट पर पहुंच जाएंगे और तब तक घर नहीं जाएंगे, जब तक काम पूरा न हो जाए। हम वहीं धरने पर बैठेंगे और मिस्टर बनर्जी, आपको भी घर नहीं जाने देंगे।”
- प्रशासनिक लालफीताशाही (Bureaucratic Delays) पर सवाल:ASG बनर्जी ने अदालत को बताया कि इस मुद्दे पर उच्च स्तरीय चर्चा के बाद एक कमेटी (Committee) का गठन किया गया है जो इस पर विचार कर रही है। इस पर पीठ भड़क गई और पूछा: “एक छोटी सी पैदल क्रॉसिंग बनाने के लिए आपको हाई-लेवल कमेटी की क्या जरूरत है? क्या आपको कुछ सिविल इंजीनियर चाहिए? आप एमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) गौरव अग्रवाल को इस कमेटी में शामिल कीजिए, वे आपको मौके पर दिखाएंगे कि असल समस्या क्या है।”
- अदालत द्वारा पहले दिए गए निर्देश:
- 15 सितंबर व 5 अक्टूबर: कोर्ट ने पहले ही चेतावनी दी थी कि केवल रेड लाइट लगाना पर्याप्त नहीं है। एमिकस क्यूरी ने बताया कि लगाया गया सिग्नल अक्सर खराब रहता है, इसलिए गति को नियंत्रित करने के लिए रंबल स्ट्रिप्स (Rumble Strips) और सिग्नलों के सिंक्रोनाइजेशन की जरूरत है।
- मथुरा रोड पर भारी ट्रैफिक रहता है और प्रतिदिन हजारों की संख्या में वकील, मुकदमों से जुड़े नागरिक और नेशनल जूलॉजिकल पार्क (चिड़ियाघर) आने वाले छोटे बच्चे जान जोखिम में डालकर सड़क पार करते हैं।
मोटर वाहन अधिनियम (धारा 164A) और “अघोषित कानून” का मुद्दा
सुनवाई के दौरान एमिकस क्यूरी ने मोटर वाहन अधिनियम की धारा 164A के तहत सड़क दुर्घटना पीड़ितों के लिए अंतरिम राहत योजना का मुद्दा भी उठाया।
- सुप्रीम कोर्ट ने 28 अप्रैल 2025 को केंद्र को 4 महीने के भीतर अंतरिम राहत योजना अधिसूचित करने का निर्देश दिया था।
- केंद्र सरकार की ओर से बताया गया कि यह योजना 23 फरवरी को ही तैयार कर ली गई थी।
- जस्टिस पारदीवाला की कड़ी टिप्पणी: कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए पूछा कि जब योजना 23 फरवरी को बन गई थी, तो जनता और न्याय मित्र को इसकी जानकारी क्यों नहीं दी गई?“क्या यह कोई ‘अघोषित कानून’ (Unannounced Law) है? कानून का जनता तक पहुंचना अनिवार्य है। मोटर वाहन अधिनियम की धारा 212 के तहत इसे तुरंत आधिकारिक राजपत्र (Official Gazette) में प्रकाशित कर व्यापक मीडिया प्रचार किया जाए ताकि पीड़ितों को लाभ मिल सके।”
नई दिल्ली: भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सुरक्षित आवागमन और जीवन का अधिकार (Right to Safe Movement and Life), अदालतों और सार्वजनिक चिड़ियाघर के समीप भारी यातायात वाले उच्च गति गलियारों पर पैदल यात्रियों की सुरक्षा (Pedestrian Infrastructure & Road Safety), दिल्ली के मथुरा रोड और शेरशाह रोड जंक्शन पर बुनियादी ट्रैफिक सुधारों में नौकरशाही की हीलाहवाली, आवश्यकता पड़ने पर मुख्य सचिव (Chief Secretary) की व्यक्तिगत पेशी, तथा मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 212 के तहत वैधानिक नियमों और अंतरिम मुआवजा योजनाओं को आधिकारिक राजपत्र (Official Gazette) में प्रकाशित कर राष्ट्रव्यापी प्रचार करने की अनिवार्यता पर सुप्रीम कोर्ट ने एक असाधारण, तल्ख और मानवीय रुख अपनाया है।
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की खंडपीठ ने शुक्रवार (16 अक्टूबर 2026) को दिल्ली उच्च न्यायालय के बाहर मथुरा रोड पर सुरक्षित पैदल पारपथ (Pedestrian Crossing) के निर्माण और सड़क सुरक्षा से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार के टालमटोल भरे रवैये पर तीव्र नाराजगी व्यक्त की। खंडपीठ ने मौखिक रूप से बेहद कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि 25 नवंबर 2026 तक वहां पैदल पारपथ का निर्माण पूरा नहीं किया गया, तो दोनों न्यायाधीश स्वयं दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य द्वार पर धरने पर बैठ जाएंगे। अदालत ने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि प्रशासनिक गति में सुधार नहीं हुआ, तो वह दिल्ली के मुख्य सचिव को व्यक्तिगत रूप से अदालत में तलब करने से नहीं हिचकिचाएगी।
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायिक निष्कर्ष एवं तल्ख मौखिक टिप्पणियां
1. ’25 नवंबर 2026 तक काम न हुआ तो हम दोनों जज धरने पर बैठेंगे’
पीठ ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) विक्रमजीत बनर्जी को संबोधित करते हुए हालांकि हल्के-फुल्के अंदाज में, किंतु बेहद गंभीर संदेश देते हुए कहा: *”यदि आप अगली सुनवाई (25 नवंबर) से पहले यह काम पूरा नहीं करवाते हैं, तो हम दोनों (न्यायाधीश) दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य द्वार पर उपस्थित होंगे। जब तक यह काम पूरा नहीं हो जाता, हम घर नहीं जाएंगे। हम वहीं धरने पर बैठेंगे और श्री बनर्जी (ASG) को भी घर नहीं जाने देंगे।”*
2. ‘हजारों वकीलों, मुकदमों के पक्षकारों और चिड़ियाघर आने वाले बच्चों की जान जोखिम में’:
खंडपीठ ने जमीनी खतरे का ब्योरा देते हुए दर्ज किया:
- दिल्ली हाईकोर्ट जंक्शन और नेशनल जूलॉजिकल पार्क (चिड़ियाघर) के पास मथुरा रोड को पार करना बेहद जोखिम भरा और जानलेवा है।
- यहां दैनिक आधार पर हजारों वकील, दूर-दराज से आने वाले वादी, बुजुर्ग और चिड़ियाघर जाने वाले छोटे बच्चे सड़क पार करते हैं।
- अदालत ने भारी यातायात के बावजूद सुरक्षित पैदल क्रॉसिंग, टेबल-टॉप स्पीड ब्रेकर और रंबल स्ट्रिप्स न बनाए जाने पर गहरी चिंता जताई।
3. बुनियादी सुधार के लिए समितियों के गठन पर सवाल:
- जब एएसजी बनर्जी ने दलील दी कि उच्च स्तरीय चर्चा के बाद गठित एक समिति इस मुद्दे पर सक्रियता से विचार कर रही है, तो पीठ ने एक साधारण जेब्रा/पैदल पारपथ बनाने में महीनों की नौकरशाही देरी पर सवाल उठाया:“एक बुनियादी यातायात समस्या और पैदल पारपथ के निर्माण के लिए भी क्या महीनों तक कमेटियों की बैठकों की औपचारिकता चलेगी? यदि स्थिति में सुधार नहीं हुआ, तो हम सीधे मुख्य सचिव को तलब करेंगे।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं सुरक्षा उपायों का कालक्रम
| तिथि / संदर्भ | घटनाक्रम एवं अदालती कार्यवाही |
| स्थल की संवेदनशीलता | मथुरा रोड (मथुरा-दिल्ली कॉरिडोर), दिल्ली हाईकोर्ट मुख्य प्रवेश द्वार, पुराना किला और राष्ट्रीय प्राणी उद्यान (चिड़ियाघर) का संगम। |
| 15 सितंबर 2026 | न्यायमित्र वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव अग्रवाल ने अदालत को सूचित किया कि प्रशासन ने वहां एक ट्रैफिक सिग्नल (रेड लाइट) चालू किया है। अदालत ने कहा कि केवल लाल बत्ती पर्याप्त नहीं है; तेज गति से आते वाहनों को रोकने के लिए गति अवरोधक (Speed Breakers) और रंबल स्ट्रिप्स आवश्यक हैं। |
| 5 अक्टूबर 2026 | शीर्ष अदालत ने केंद्र व लोक निर्माण विभाग (PWD) को अविलंब सुरक्षित पैदल पारपथ तैयार करने का निर्देश दिया था। |
| 16 अक्टूबर 2026 | प्रशासनिक सुस्ती पर नाराजगी; 25 नवंबर 2026 तक कार्य पूरा करने की अंतिम समय-सीमा निर्धारित; विफलता पर धरने की प्रतीकात्मक चेतावनी और मुख्य सचिव को समन का संकेत। |
मोटर दुर्घटना अंतरिम राहत योजना (धारा 164A) के ‘अघोषित क्रियान्वयन’ पर पुनः फटकार
इसी सुनवाई के दौरान पीठ ने मोटर वाहन अधिनियम की धारा 164A के तहत दुर्घटना पीड़ितों को अंतरिम राहत देने वाली योजना के मुद्दे पर केंद्र सरकार को आड़े हाथों लिया:
- 28 अप्रैल 2025 का आदेश और 4 महीने की मियाद: सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2025 में केंद्र को चार महीने के भीतर धारा 164A के तहत वैधानिक योजना अधिसूचित करने का आदेश दिया था।
- फरवरी 2026 की गुपचुप फाइलिंग: केंद्र ने बताया कि 23 फरवरी 2026 को योजना तैयार कर राज्यों को भेजी जा चुकी है। इस पर न्यायमित्र और याचिकाकर्ता दोनों ने अनभिज्ञता जताई।
- ‘अघोषित कानून’ (Unannounced Law) पर आपत्ति:
- न्यायमूर्ति पारदीवाला ने सवाल उठाया: “कानून सार्वजनिक होना चाहिए। क्या यह कोई गुप्त या अघोषित कानून है जिसकी जानकारी न्यायमित्र और आम जनता को ही नहीं है?”
- धारा 212 के तहत राजपत्र में अनिवार्य प्रकाशन:
- पीठ ने निर्देश दिया कि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 212 के तहत किसी भी नियम या योजना को केवल मंत्रालयों की फाइलों में रखने के बजाय आधिकारिक राजपत्र (Official Gazette) में प्रकाशित किया जाना और उसका राष्ट्रव्यापी प्रचार-प्रसार करना अनिवार्य है, ताकि वास्तविक पीड़ित इसका लाभ उठा सकें।
विधिक एवं सांविधिक विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- संविधान का अनुच्छेद 21 और पैदल यात्रियों का अधिकार (Pedestrian Rights):
- सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न फैसलों में स्थापित किया है कि सड़कों पर चलने का अधिकार केवल मोटर वाहनों तक सीमित नहीं है। पैदल चलने वाले नागरिक सड़क नेटवर्क के सबसे कमजोर हितधारक (Vulnerable Road Users – VRUs) हैं।
- अदालतों, स्कूलों, अस्पतालों और सार्वजनिक पार्कों के बाहर सुरक्षित क्रॉसिंग की सुविधा उपलब्ध कराना राज्य का संवैधानिक दायित्व है; इसका अभाव नागरिकों के जीवन के अधिकार (Right to Life) का उल्लंघन है।
- सड़क सुरक्षा पर सर्वोच्च न्यायालय समिति (CoRS) के मानक:
- भारतीय सड़क कांग्रेस (IRC) के विनिर्देशों (IRC:103-2012) के अनुसार, उच्च पैदल यात्री घनत्व वाले क्षेत्रों में गति को नियंत्रित करने के लिए ‘टेबल-टॉप पेडेस्ट्रियन क्रॉसिंग’ और ‘उचित संकेतकों’ का होना विधिक रूप से अनिवार्य है।
- मोटर वाहन अधिनियम की धारा 212 (प्रकाशन की पूर्व शर्त):
- धारा 212 स्पष्ट रूप से यह व्यवस्था देती है कि केंद्र या राज्य सरकार द्वारा इस अधिनियम के तहत बनाए गए नियम या योजनाएं तब तक कानूनी रूप से प्रभावी नहीं मानी जा सकतीं जब तक कि उनका पूर्व-प्रकाशन और आधिकारिक राजपत्र में अंतिम प्रकाशन न हो जाए। बिना गजट नोटिफिकेशन के किसी योजना को राज्यों के मुख्य सचिवों को भेज देना सांविधिक प्रक्रिया की दृष्टि से अधूरा है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: इन री: सड़क सुरक्षा एवं मोटर दुर्घटना अंतरिम मुआवजा योजना [सर्वोच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन (खंडपीठ)
- आदेश की तिथि: 16 अक्टूबर 2026
- अगली सुनवाई की तिथि: 25 नवंबर 2026
विधिक प्रतिनिधित्व:
- न्यायालय सहायता (Amicus Curiae): वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव अग्रवाल
- केंद्र सरकार (भारत संघ) की ओर से: अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) विक्रमजीत बनर्जी
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (जीवन और सुरक्षित आवागमन का अधिकार) एवं अनुच्छेद 142
- मोटर वाहन अधिनियम, 1988 — धारा 164A (दुर्घटना पीड़ितों को अंतरिम वित्तीय राहत योजना), धारा 212 (नियमों/योजनाओं के गजट प्रकाशन की अनिवार्यता) एवं धारा 138 (पैदल यात्रियों के विनियमन हेतु राज्य की शक्ति)
- भारतीय सड़क कांग्रेस (IRC) दिशानिर्देश — IRC:103 (पैदल यात्री सुविधाओं के मानक)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- सड़क सुरक्षा में प्रशासनिक जवाबदेही: ‘अदालतों और सार्वजनिक स्थलों के बाहर पैदल यात्रियों की सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता; बुनियादी ढांचे के निर्माण में प्रशासनिक हीलाहवाली बर्दाश्त नहीं की जाएगी और जन-कल्याणकारी नियमों को आधिकारिक गजट में प्रकाशित कर सार्वजनिक करना सांविधिक रूप से अनिवार्य है।’
- अंतिम निर्देश: मथुरा रोड पर दिल्ली हाईकोर्ट और चिड़ियाघर के सामने सुरक्षित पैदल पारपथ, रंबल स्ट्रिप्स और गति अवरोधक का कार्य 25 नवंबर 2026 से पहले अनिवार्य रूप से पूरा करने का अल्टीमेटम; विफलता पर मुख्य सचिव को समन करने की चेतावनी; मोटर वाहन अधिनियम की धारा 164A के तहत अंतरिम राहत योजना को आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित कर व्यापक सार्वजनिक प्रचार करने का आदेश।
Pedestrian Crossing: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला एवं न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन |
| मामले का संदर्भ | सड़क सुरक्षा याचिका (S. Rajaseekaran v. Union of India) |
| मुख्य विवाद स्थान | दिल्ली हाईकोर्ट जंक्शन एवं नेशनल जूलॉजिकल पार्क के पास, मथुरा रोड (नई दिल्ली)। |
| अदालत का अल्टीमेटम | 25 नवंबर 2026 तक ठोस निर्माण न होने पर जजों द्वारा धरना देने की चेतावनी; आवश्यकता पड़ने पर मुख्य सचिव (Chief Secretary) को समन करने का निर्देश। |

