Saturday, June 20, 2026
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CONTEMPT Case: सिर्फ कानून बनाने से संसद या विधानसभा अवमानना की दोषी नहीं…कानून बनाना विधायिका का काम

CONTEMPT Case: सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि संसद या किसी राज्य विधानसभा द्वारा केवल कानून बना देने से उसे अदालत की अवमानना नहीं माना जा सकता।

छत्तीसगढ़ सरकार के खिलाफ दायर याचिका खारिज

शीर्ष कोर्ट के न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना व सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने वर्ष 2012 में दायर एक अवमानना याचिका को खारिज करते हुए की। यह याचिका समाजशास्त्री और दिल्ली यूनिवर्सिटी की पूर्व प्रोफेसर नंदिनी सुंदर और अन्य ने दायर की थी। याचिका में आरोप था कि छत्तीसगढ़ सरकार ने 2011 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा सलवा जुडूम जैसे विघटनकारी समूहों को समर्थन न देने और विशेष पुलिस अधिकारियों (SPO) को हथियार न देने के निर्देशों का पालन नहीं किया। इसके बजाय राज्य सरकार ने छत्तीसगढ़ सहायक सशस्त्र पुलिस बल अधिनियम, 2011 पारित कर SPO को नियमित कर दिया।

यह था याचिकाकर्ताओं का दावा

याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि राज्य सरकार ने स्कूलों और आश्रमों से सुरक्षा बलों को नहीं हटाया और न ही सलवा जुडूम और SPO से प्रभावित लोगों को मुआवजा दिया। कोर्ट ने 15 मई को दिए फैसले में कहा कि शीर्ष अदालत के आदेश के बाद कोई कानून बनाना अवमानना नहीं माना जा सकता।

कानून बनाने का अधिकार विधायिका का मूल अधिकार

बेंच ने कहा कि हर राज्य विधानसभा को कानून बनाने का पूर्ण अधिकार है। जब तक कोई कानून संविधान के खिलाफ घोषित नहीं किया जाता या किसी संवैधानिक अदालत द्वारा रद्द नहीं किया जाता, तब तक वह कानून वैध माना जाएगा। अगर किसी को लगता है कि कोई कानून असंवैधानिक है, तो उसे उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत चुनौती दी जा सकती है। छत्तीसगढ़ में दशकों से जारी हालात को देखते हुए कोर्ट ने राज्य और केंद्र सरकार से मिलकर प्रभावित इलाकों में शांति और पुनर्वास के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत बताई।

कानून की वैधता को लेकर उठे विवादों का समाधान करने का काम हमारा: कोर्ट

संविधान के अनुच्छेद 315 के तहत राज्य और केंद्र दोनों की जिम्मेदारी है कि वे छत्तीसगढ़ के हिंसा प्रभावित लोगों के लिए शांति और पुनर्वास सुनिश्चित करें। अदालत ने कहा कि संविधान के तहत न्यायपालिका को यह अधिकार है कि वह किसी कानून की वैधता को लेकर उठे विवादों का समाधान करे। लेकिन किसी कानून को बनाना या संशोधित करना अवमानना नहीं हो सकता।

विधायिका को कानून बनाने और संशोधित करने का अधिकार

कोर्ट ने कहा कि विधायिका को यह अधिकार है कि वह किसी फैसले के आधार को हटाने के लिए कानून बनाए या किसी रद्द किए गए कानून को संशोधित कर उसे फिर से लागू करे। यह शक्ति संविधान में शक्ति के पृथक्करण (separation of powers) के सिद्धांत का हिस्सा है, जो लोकतंत्र में संतुलन बनाए रखने के लिए जरूरी है। कोई भी कानून अगर चुनौती दी जानी है, तो उसे केवल दो आधारों पर चुनौती दी जा सकती है—विधायी अधिकार की सीमा और संवैधानिक वैधता।

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