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Passport vs Criminal Cases: छोटी-मोटी FIR या लंबित मामले चल रहे हैं आप पर…राइट टू ट्रैवल पर कोर्ट का नया दिशानिर्देश जरूर पढ़ लें

Passport vs Criminal Cases: बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस ए.एस. गडकरी और जस्टिस रंजितसिंह राजा भोसले की खंडपीठ ने पासपोर्ट नवीनीकरण (Renewal) और पुन: जारी (Re-issue) करने के संबंध में विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

दिशा-निर्देशों का सारांश (Quick Summary of Guidelines)

स्थितिकोर्ट का निर्देश
सामान्य लंबित मामलेहलफनामा/अंडरटेकिंग के आधार पर रिन्यूअल, हर बार NOC जरूरी नहीं।
गंभीर अपराध (Financial Fraud/State)कोर्ट अपनी न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर NOC तय करेगा।
नया पासपोर्ट आवेदनपासपोर्ट अथॉरिटी अधिनियम के अनुसार खुद जांच करे, कोर्ट न भेजे।
पासपोर्ट के पन्ने भरनाबिना किसी नई अनुमति के पासपोर्ट दोबारा जारी किया जाएगा।
पुलिस वेरिफिकेशनसरकारी वकील और पुलिस पुराने रिकॉर्ड और नए FIR की जानकारी देंगे।

छोटी-मोटी FIR या लंबित मामले को लेकर फंसता है पेच

दरअसल, यह दिशानिर्देश उन नागरिकों के लिए अहम हैं, जिनके खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 21 के तहत विदेश यात्रा का अधिकार एक मौलिक अधिकार है और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को इसे बाधित करने वाली ‘अभेद्य बाधा’ नहीं बनना चाहिए। अदालत ने माना कि अक्सर पुलिस और पासपोर्ट अधिकारी उन मामलों में भी कोर्ट की एनओसी (NOC) मांगते हैं जहाँ अभी तक कोर्ट ने संज्ञान (Cognizance) भी नहीं लिया होता है।यह फैसला उन याचिकाओं के जवाब में आया है जहाँ आवेदकों को केवल इसलिए पासपोर्ट देने से मना किया जा रहा था क्योंकि उनके खिलाफ कोई छोटी-मोटी FIR या लंबित मामला था।

संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 21 और व्यक्तिगत स्वतंत्रता

  • कोर्ट ने महेश कुमार अग्रवाल बनाम भारत संघ (2025) मामले का हवाला दिया।
  • उपहार नहीं, कर्तव्य है: “स्वतंत्रता राज्य द्वारा दिया गया उपहार नहीं, बल्कि उसका पहला कर्तव्य है। विदेश यात्रा करना और आजीविका की तलाश करना जीवन के अधिकार का हिस्सा है।”
  • आनुपातिक प्रतिबंध: राज्य द्वारा लगाया गया कोई भी प्रतिबंध कानून के दायरे में और ‘आनुपातिक’ (Proportionate) होना चाहिए, न कि मनमाना।

प्रमुख दिशा-निर्देश (Major Guidelines Issued)

  • कोर्ट ने प्रशासनिक विसंगतियों को दूर करने के लिए नियम तय किए हैं।
  • बिना NOC के रिन्यूअल: यदि आवेदक ने कोर्ट द्वारा सत्यापित शपथ पत्र (Affidavit) और अंडरटेकिंग जमा कर दी है, तो पासपोर्ट अधिकारी केवल इसलिए आपत्ति नहीं कर सकते कि “कोर्ट का आदेश पेश नहीं किया गया”।
  • नया पासपोर्ट (Fresh Application): पहली बार पासपोर्ट बनवाने वालों के लिए पासपोर्ट अथॉरिटी को कोर्ट की NOC की जिद नहीं करनी चाहिए और ‘पासपोर्ट अधिनियम’ की सामान्य प्रक्रिया का पालन करना चाहिए।
  • पेज खत्म होने पर: यदि पासपोर्ट के पन्ने खत्म हो गए हैं, तो पासपोर्ट अथॉरिटी को बिना कोर्ट की अनुमति के नया पासपोर्ट जारी करना चाहिए।
  • NOC में विस्तृत जानकारी: यदि मामला गंभीर है और कोर्ट से NOC मांगी जाती है, तो उस NOC में केस की वर्तमान स्थिति, गवाहों की संख्या और लगाए गए आरोपों का स्पष्ट विवरण होना चाहिए।
  • गंभीर अपराधों के लिए कड़े नियम: वित्तीय धोखाधड़ी, देश के खिलाफ अपराध या समाज को प्रभावित करने वाले गंभीर मामलों (Serious Offences) में कोर्ट ‘न्यायिक विवेक’ (Judicial Side) का उपयोग करके ही फैसला लेगा।

देरी और असुविधा पर कोर्ट की टिप्पणी

  • अदालत ने कहा कि कई बार केवल FIR दर्ज होने पर, बिना समन जारी हुए भी, आवेदकों को कोर्ट के चक्कर लगाने पड़ते हैं। इससे आवेदक को अनावश्यक असुविधा होती है। अदालतों का कीमती समय बर्बाद होता है। पासपोर्ट नियम 12 के तहत, यदि कोर्ट ने कोई विशिष्ट समय सीमा तय नहीं की है, तो पासपोर्ट निर्धारित अवधि के लिए जारी किया जाना चाहिए।

प्रक्रियात्मक बाधाओं का अंत

बॉम्बे हाई कोर्ट का यह फैसला उन लोगों के लिए बड़ी राहत है जो वर्षों से लंबित छोटे-मोटे आपराधिक मामलों के कारण यात्रा नहीं कर पा रहे थे। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि ‘प्रक्रिया’ को ‘सजा’ नहीं बनना चाहिए। अब पासपोर्ट अधिकारियों को केवल कानून की धाराओं को देखने के बजाय मामले की गंभीरता और कोर्ट के मौजूदा आदेशों को प्राथमिकता देनी होगी।

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