DIVORCE Case: सुप्रीम कोर्ट ने अपने विशेष अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए एक महिला आईपीएस अफसर और उसके पति को तलाक दे दिया।
संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत लिया फैसला
कोर्ट ने दोनों के बीच चल रहे सभी सिविल और क्रिमिनल केस भी खत्म कर दिए। कोर्ट ने यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत लिया, जो किसी भी मामले में “पूर्ण न्याय” के लिए जरूरी आदेश देने का अधिकार देता है।
2015 में हुई शादी 2018 में टूट गई थी
कोर्ट ने कहा कि 2015 में हुई शादी 2018 में टूट गई थी और इसके बाद दोनों पक्षों के बीच लंबी कानूनी लड़ाई चली। अब दोनों पक्ष आपसी सहमति से विवाद खत्म करना चाहते हैं, जिसमें बच्ची की कस्टडी का मामला भी शामिल है। कोर्ट ने बच्ची की कस्टडी मां को दी है। पिता और उनके परिवार को पहले तीन महीने तक निगरानी में मिलने की अनुमति दी गई है। इसके बाद हर महीने के पहले रविवार को सुबह 9 से शाम 5 बजे तक स्कूल में मिलने की इजाजत होगी, जो स्कूल के नियमों के अनुसार होगी।
भत्ते या गुजारा भत्ते की मांग छोड़ दी
महिला अफसर ने पति से किसी भी तरह के भत्ते या गुजारा भत्ते की मांग छोड़ दी है। इसी आधार पर कोर्ट ने हाईकोर्ट का वह आदेश भी रद्द कर दिया, जिसमें पति को हर महीने 1.5 लाख रुपए देने को कहा गया था।
महत्वपूर्ण निर्देश और फैसले:
तलाक के साथ सभी केस खत्म
कोर्ट ने दोनों पक्षों द्वारा एक-दूसरे के खिलाफ देशभर में दर्ज सभी केस खत्म कर दिए हैं। इसमें पति, पत्नी और उनके परिवारों के खिलाफ दर्ज केस शामिल हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि भविष्य में इस मामले से जुड़ा कोई भी केस किसी भी कोर्ट या फोरम में दायर नहीं किया जाएगा।
आईपीएस अफसर को ताकत का गलत इस्तेमाल न करने की चेतावनी
कोर्ट ने महिला अफसर को निर्देश दिया कि वह अपने आईपीएस पद या भविष्य में किसी भी पद का इस्तेमाल पति या उसके परिवार के खिलाफ नहीं करेंगी। न ही अपने किसी जान-पहचान वाले अधिकारी या सीनियर की ताकत का दुरुपयोग करेंगी।
बिना शर्त माफी और सार्वजनिक प्रकाशन
कोर्ट ने माना कि महिला अफसर की शिकायतों के चलते पति और उसके पिता को जेल जाना पड़ा। इसलिए कोर्ट ने महिला अफसर और उसके माता-पिता को पति के परिवार से बिना शर्त माफी मांगने का आदेश दिया है। यह माफी देश के एक प्रमुख अंग्रेजी और हिंदी अखबार के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित की जाएगी।

