Sunday, September 20, 2026
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MP-HC: हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी…मध्यप्रदेश की न्यायपालिका में आज भी दिखता है जातिवाद-सामंती सोच

MP-HC: मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य की न्यायिक व्यवस्था में व्याप्त जातिवाद और सामंती सोच पर कड़ी टिप्पणी की है।

पूर्व न्यायाधीश जगत मोहन चतुर्वेदी की सेवा समाप्ति को रद्द

कोर्ट ने कहा कि प्रदेश की न्यायपालिका में आज भी हाईकोर्ट के जजों को ‘सवर्ण’ और जिला न्यायाधीशों को ‘शूद्र’ या ‘ले मिजरेबल्स’ (दीन-हीन) समझा जाता है। यह मानसिकता न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंचाती है। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस डीके पालीवाली की डिवीजन बेंच ने यह टिप्पणी 14 जुलाई को एक आदेश में की। यह आदेश विशेष न्यायालय (SC/ST) के पूर्व न्यायाधीश जगत मोहन चतुर्वेदी की सेवा समाप्ति को रद्द करते हुए दिया गया।

झुककर अभिवादन करते हैं, जैसे वे रीढ़विहीन प्राणी हों…

कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट और जिला न्यायपालिका के जजों के बीच संबंध सामंती मालिक और नौकर जैसे हैं। हाईकोर्ट के जज जिला न्यायाधीशों के मन में डर और हीनता की भावना पैदा करते हैं। यह डर इस हद तक है कि जिला न्यायपालिका के जज हाईकोर्ट के जजों से मिलने पर झुककर अभिवादन करते हैं, जैसे वे रीढ़विहीन प्राणी हों।

कुछ लोगों को विशेषाधिकार प्राप्त हैं…

कोर्ट ने कहा कि जिला न्यायपालिका के जजों को रेलवे स्टेशन पर हाईकोर्ट के जजों की अगवानी करते और उन्हें जलपान कराते देखा गया है। यह सब एक औपनिवेशिक मानसिकता को दर्शाता है, जिसमें कुछ लोगों को विशेषाधिकार प्राप्त हैं। कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट की रजिस्ट्री में प्रतिनियुक्त जिला जजों को अक्सर बैठने के लिए कुर्सी तक नहीं दी जाती। अगर कभी दी भी जाती है, तो वे बैठने में हिचकिचाते हैं। यह मानसिक गुलामी की स्थिति है।

जगत मोहन चतुर्वेदी को सेवा से हटाने का आदेश 1 अगस्त 2016 को दिया

जगत मोहन चतुर्वेदी को सेवा से हटाने का आदेश 1 अगस्त 2016 को दिया गया था। उन पर आरोप था कि उन्होंने कुछ मामलों में जमानत दे दी थी। कोर्ट ने कहा कि यह आदेश बिना किसी ठोस सबूत के दिया गया और इससे उन्हें समाज में अपमान झेलना पड़ा। कोर्ट ने राज्य सरकार और हाईकोर्ट रजिस्ट्री पर 5 लाख रुपए का जुर्माना लगाया है। साथ ही चतुर्वेदी को सेवा समाप्ति की तारीख से सेवानिवृत्ति की संभावित तारीख तक का वेतन और पेंशन लाभ 7% ब्याज के साथ देने का आदेश दिया है। यह भुगतान आदेश वेबसाइट पर अपलोड होने के 90 दिन के भीतर करना होगा, अन्यथा अवमानना याचिका दायर की जा सकती है। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के मामलों से जिला न्यायपालिका में यह संदेश जाता है कि अगर वे स्वतंत्र निर्णय लेंगे, तो उन्हें सजा मिल सकती है। इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता खतरे में पड़ती है।

यह है केस के मुख्य बिंदु:

  • हाईकोर्ट ने कहा- राज्य की न्यायपालिका में जातिवाद और सामंती सोच अब भी मौजूद।
  • जिला जजों को ‘शूद्र’ और हाईकोर्ट के जजों को ‘सवर्ण’ समझा जाता है।
  • जिला जजों को हाईकोर्ट के जजों के सामने झुकना पड़ता है, यह मानसिक गुलामी है।
  • विशेष न्यायालय के पूर्व जज की सेवा समाप्ति को कोर्ट ने गलत बताया।
  • राज्य सरकार और हाईकोर्ट रजिस्ट्री पर 5 लाख का जुर्माना।
  • पूर्व जज को वेतन और पेंशन लाभ 7% ब्याज के साथ देने का आदेश।
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