Monday, August 17, 2026
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Judge Case: इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज पर टिप्पणी…सुप्रीम कोर्ट ने कहा- यह आदेश न्याय का मजाक, जज वरिष्ठ संग बैठें

Judge Case: सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज को उनके कार्यकाल तक आपराधिक मामलों की सुनवाई से हटा दिया है।

कंपनी को समन जारी करने की याचिका की थी खारिज

यह फैसला 4 अगस्त को जस्टिस जेबी पारदीवाला और आर. महादेवन की बेंच ने सुनाया था। अब इस मामले की अगली सुनवाई 8 अगस्त को होगी। एक सिविल विवाद में आपराधिक कार्यवाही को सही ठहराने वाले जज पर हुई कार्रवाई। यह मामला शिखर केमिकल्स नाम की कंपनी से जुड़ा है, जिस पर लालिता टेक्सटाइल्स ने 52.34 लाख रुपए के धागे की सप्लाई की थी। इसमें से 47.75 लाख रुपए का भुगतान हो चुका था, लेकिन बाकी रकम नहीं मिली। इस पर लालिता टेक्सटाइल्स ने कंपनी के खिलाफ आपराधिक शिकायत दर्ज कराई। मजिस्ट्रेट कोर्ट ने कंपनी को समन जारी किया। कंपनी ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को बताया सबसे खराब आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को “सबसे खराब और गलत” करार दिया। कोर्ट ने कहा कि यह आदेश न्याय व्यवस्था का मजाक उड़ाता है। बेंच ने कहा, “हमें समझ नहीं आता कि हाईकोर्ट स्तर पर भारतीय न्यायपालिका में क्या गलत हो रहा है। क्या ऐसे आदेश किसी बाहरी दबाव में दिए जाते हैं या यह कानून की अज्ञानता है?”

जज को वरिष्ठ के साथ डिवीजन बेंच में बैठने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से कहा है कि वे इस मामले को किसी अन्य जज को सौंपें और संबंधित जज को आपराधिक मामलों की सुनवाई से तुरंत हटा दें। साथ ही उन्हें एक अनुभवी वरिष्ठ जज के साथ डिवीजन बेंच में बैठने का निर्देश दिया गया है।

हाईकोर्ट ने कहा था- सिविल केस लंबा चलेगा, इसलिए आपराधिक कार्यवाही जायज

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि शिकायतकर्ता को सिविल उपाय अपनाने को कहना अनुचित है क्योंकि इसमें समय ज्यादा लगेगा। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि सिविल विवाद में आपराधिक कार्यवाही की इजाजत देना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।

सुप्रीम कोर्ट ने बिना नोटिस दिए हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में हाईकोर्ट का आदेश इतना गलत था कि उसे बिना किसी नोटिस के ही रद्द करना पड़ा। कोर्ट ने कहा कि यह बेहद दुखद है कि हाईकोर्ट ने ऐसे तर्क दिए जो कानून के खिलाफ हैं।

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