Thursday, November 5, 2026
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ED ARTICLE 226: क्या ED एक ‘कानूनी व्यक्ति’ के तौर पर हाई कोर्ट जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट करेगा समीक्षा

ED ARTICLE 226: सुप्रीम कोर्ट इस कानूनी सवाल की जांच करने के लिए सहमत हो गया कि क्या ED एक ‘कानूनी व्यक्ति’ के तौर पर हाई कोर्ट जा सकता है?

हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर कर सकता है?

क्या प्रवर्तन निदेशालय (ED), संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत एक ‘जूरिस्टिक पर्सन’ (Juristic Person) के रूप में अपने अधिकारों को लागू करने के लिए हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर कर सकता है।

क्या होता है ‘जूरिस्टिक पर्सन’ (Juristic Person)?

कानून की भाषा में ‘जूरिस्टिक पर्सन’ एक ऐसी संस्था या इकाई (जैसे कोई कंपनी या सरकारी एजेंसी) होती है, जो इंसान नहीं है लेकिन कानून उसे एक इंसान की तरह अधिकार और कर्तव्य देता है। वह अपने नाम से केस कर सकती है और उस पर केस किया जा सकता है।

मामले की पृष्ठभूमि: केरल और तमिलनाडु बनाम ED

-केरल हाई कोर्ट का फैसला: पिछले साल सितंबर में केरल हाई कोर्ट ने ED को ‘रिट याचिका’ दायर करने के योग्य माना था। कोर्ट ने उस न्यायिक जांच (Judicial Inquiry) पर रोक लगा दी थी, जिसे केरल सरकार ने ED अधिकारियों के खिलाफ शुरू किया था।

  • विवाद की जड़: केरल सरकार ने 2020 के सोना तस्करी मामले (Gold Smuggling Case) में ED की जांच के खिलाफ एक न्यायिक आयोग का गठन किया था। आरोप था कि ED अधिकारी आरोपियों पर मुख्यमंत्री और अन्य नेताओं को फंसाने का दबाव बना रहे हैं।
  • ED की चुनौती: ED के डिप्टी डायरेक्टर ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर राज्य सरकार के इस आयोग (जस्टिस वी.के. मोहनन आयोग) के गठन को चुनौती दी थी।

सुप्रीम कोर्ट में अब क्या होगा?

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने केरल और तमिलनाडु सरकारों की अपीलों पर ED को नोटिस जारी किया है। राज्य सरकारों का तर्क है कि ED एक केंद्रीय एजेंसी है और उसे अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दायर करने का वैसा अधिकार नहीं है जैसा कि किसी नागरिक या कानूनी व्यक्ति को होता है। अगर सुप्रीम कोर्ट का फैसला ED के खिलाफ आता है, तो भविष्य में केंद्रीय एजेंसियों के लिए राज्य सरकारों द्वारा की जाने वाली जांचों या कार्रवाइयों के खिलाफ हाई कोर्ट जाना मुश्किल हो सकता है।

प्रमुख बिंदु: क्यों अहम है अनुच्छेद 226?

संविधान का अनुच्छेद 226 हाई कोर्ट को यह शक्ति देता है कि वह किसी व्यक्ति या संस्था के मौलिक अधिकारों या अन्य कानूनी अधिकारों की रक्षा के लिए ‘रिट’ (जैसे बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश आदि) जारी कर सके।

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