Supreme Court View
Scurrilous Remarks: सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी में कहा कि हाईकोर्ट के जज किसी भी तरह से सुप्रीम कोर्ट के जजों से कम नहीं हैं।
जजों की आलोचना करना एक चलन बन गया
कोर्ट ने तेलंगाना हाईकोर्ट के एक जज पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाले याचिकाकर्ता एन. पेड्डी राजू और उनके वकीलों को बिना शर्त माफी मांगने का निर्देश दिया है। मुख्य न्यायाधीश बीअार गवई की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि हाल के दिनों में वकीलों द्वारा हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के जजों की आलोचना करना एक चलन बन गया है, खासकर तब जब किसी मामले में कोई राजनीतिक व्यक्ति शामिल होता है। कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट के जजों को भी वही संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है जो सुप्रीम कोर्ट के जजों को मिलता है। कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट भले ही हाईकोर्ट के फैसलों में बदलाव कर सकता है, लेकिन उसका हाईकोर्ट के जजों पर कोई प्रशासनिक नियंत्रण नहीं होता।
मामला क्या है
यह मामला तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट के तहत दर्ज एक केस को हाईकोर्ट द्वारा खारिज किए जाने से जुड़ा है। याचिकाकर्ता एन. पेड्डी राजू ने हाईकोर्ट के जज पर पक्षपात और अनुचित व्यवहार का आरोप लगाते हुए केस को ट्रांसफर करने की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने 29 जुलाई को यह याचिका खारिज कर दी थी, लेकिन याचिका में की गई आपत्तिजनक टिप्पणियों को गंभीरता से लेते हुए वकीलों को अवमानना नोटिस जारी किया था।
माफी हाईकोर्ट के जज से ही मांगी जाए
कोर्ट ने कहा कि चूंकि आरोप हाईकोर्ट के जज पर लगाए गए हैं, इसलिए माफी भी उन्हीं से मांगी जानी चाहिए। कोर्ट ने तेलंगाना हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि वह मामला फिर से संबंधित जज के सामने पेश करें। याचिकाकर्ता और वकील एक हफ्ते के भीतर माफी पेश करें और जज एक हफ्ते में इस पर फैसला लें। कोर्ट ने यह भी कहा कि वह वकीलों को सजा देने में कोई खुशी महसूस नहीं करता, लेकिन न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखना जरूरी है। कोर्ट ने वर्चुअल माध्यम से पेश होने की अनुमति भी दी।
पुराने फैसले का हवाला
सीजेआई ने 1954 के एक संविधान पीठ के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि सिर्फ याचिकाकर्ता ही नहीं, बल्कि याचिका पर हस्ताक्षर करने वाले वकील भी जिम्मेदार होते हैं। वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े ने कोर्ट में बिना शर्त माफी दी और कहा कि यह टिप्पणियां किन परिस्थितियों में की गईं, वह स्पष्ट करना चाहते हैं। कोर्ट ने कहा कि वह देखेगा कि माफी सच्चे मन से दी गई है या नहीं। जब कोर्ट ने भाषा पर नाराजगी जताई तो याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी गई, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया।
पृष्ठभूमि में इलाहाबाद हाईकोर्ट का मामला भी
यह टिप्पणी उस समय और भी अहम हो जाती है जब हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक सिविल केस में आए फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने टिप्पणी की थी, जिसे बाद में हटा लिया गया। उस मामले में भी सीजेआई के हस्तक्षेप के बाद बेंच ने अपनी टिप्पणी वापस ली थी।





